उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मॉडल का अध्ययन करने पहुंचे श्रीलंका के 40 अधिकारी

देहरादून, 17 मार्च । नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस (एनसीजीजी) के तत्वावधान में श्रीलंका के 40 सिविल सेवा अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) का भ्रमण कर राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था, तकनीकी नवाचारों और सामुदायिक भागीदारी आधारित मॉडल का अध्ययन किया। प्रतिनिधिमंडल ने राज्य में आपदा जोखिम न्यूनीकरण, त्वरित राहत एवं बचाव तंत्र, पूर्व चेतावनी प्रणाली और भूस्खलन प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्थाओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की।
आपदा प्रबंधन की जमीनी कार्यप्रणाली से कराया अवगत
अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) एवं डीआईजी राजकुमार नेगी ने प्रतिनिधिमंडल को यूएसडीएमए द्वारा संचालित कार्यों की जानकारी देते हुए बताया कि आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्य किस प्रकार त्वरित रूप से धरातल पर संचालित किए जाते हैं। उन्होंने राज्य एवं जिला आपातकालीन परिचालन केंद्रों की भूमिका, चेतावनी प्रसारण प्रणाली, अलर्ट जारी करने की प्रक्रिया और तकनीक के प्रभावी उपयोग पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने यह भी बताया कि उत्तराखण्ड में आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए समुदाय की भागीदारी को किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है और सूचना का आदान-प्रदान अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से कैसे पहुंचाया जाता है। प्रतिनिधिमंडल को आपदा प्रबंधन विभाग की कार्यप्रणाली, इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम की अवधारणा एवं संरचना, आपदा पूर्व तैयारी, आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया तथा आपदा उपरांत पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण की प्रक्रियाओं की भी जानकारी दी गई। साथ ही यूएसडीएमए और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के बीच समन्वय व्यवस्था से भी अवगत कराया गया।
मौसम पूर्वानुमान और बहु–स्तरीय चेतावनी प्रणाली पर प्रस्तुति
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक डॉ. रोहित थपलियाल ने मौसम पूर्वानुमान और बहु-स्तरीय चेतावनी प्रणाली पर विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया। उन्होंने बताया कि मौसम संबंधी आंकड़े उपग्रह आधारित अवलोकन प्रणाली, डॉप्लर वेदर रडार, स्वचालित मौसम केंद्र, स्वचालित वर्षामापी यंत्र और मौसम पूर्वानुमान मॉडलों जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से एकत्र किए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों का रियल-टाइम एकीकरण कर उच्च स्तरीय विश्लेषण किया जाता है, जिसके आधार पर अलग-अलग स्तर के पूर्वानुमान तैयार किए जाते हैं। डॉ. थपलियाल ने विशेष रूप से पर्वतीय राज्यों में लोकेशन-स्पेसिफिक पूर्वानुमानों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यहां मौसम की परिस्थितियां अत्यधिक परिवर्तनशील होने के कारण सटीक और स्थानीय स्तर के पूर्वानुमान अत्यंत आवश्यक हैं।
भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण के वैज्ञानिक उपायों में दिखाई खास दिलचस्पी
यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार ने उत्तराखण्ड में भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण के लिए किए जा रहे वैज्ञानिक और संस्थागत प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखण्ड में भूस्खलन एक प्रमुख आपदा है और इसके प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि राज्य में भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए विस्तृत भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रण और जोखिम क्षेत्र निर्धारण किया जा रहा है। रिमोट सेंसिंग, जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम, ड्रोन सर्वेक्षण, लिडार तकनीक और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों की निरंतर निगरानी की जा रही है। चयनित स्थलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम भी स्थापित किए जा रहे हैं, जो वर्षा, मिट्टी की नमी और ढलान की गति जैसे मानकों के आधार पर भूस्खलन की आशंका का पूर्व संकेत देते हैं।
चूंकि श्रीलंका भी भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा से उत्पन्न आपदाओं का सामना करता है, इसलिए वहां से आए अधिकारियों ने इन विषयों में विशेष रुचि दिखाई। उन्होंने उत्तराखण्ड में अपनाए जा रहे तकनीकी मॉडल, अर्ली वार्निंग सिस्टम, जोखिम आकलन पद्धतियों और सामुदायिक आधारित दृष्टिकोण के बारे में विस्तार से जानकारी ली तथा इन्हें अपने देश में लागू करने की संभावनाओं पर भी चर्चा की।
अंतरराष्ट्रीय संवाद से बनता है साझा दृष्टिकोण
सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने कहा कि इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय संवाद और अध्ययन भ्रमण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये विभिन्न देशों के बीच ज्ञान, अनुभव और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान का प्रभावी माध्यम बनते हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड जैसे आपदा-संवेदनशील राज्य में विकसित व्यवस्थाएं और तकनीकी पहलें अन्य देशों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, वहीं राज्य को भी वैश्विक अनुभवों से सीखने का अवसर मिलता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे संवाद न केवल संस्थागत क्षमता को मजबूत करते हैं, बल्कि आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में समन्वित और साझा दृष्टिकोण विकसित करने में भी सहायक होते हैं, जिससे जन-जीवन की सुरक्षा और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रयास अधिक प्रभावी बनते हैं।
52 देशों के अधिकारियों को प्रशिक्षित कर चुका है एनसीजीजी
एनसीजीजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एपी सिंह ने बताया कि नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस भारत सरकार द्वारा वर्ष 2014 में स्थापित एक प्रमुख संस्थान है, जो सुशासन, नीतिगत सुधार, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में कार्य करता है। यह संस्थान भारत के सिविल सेवकों के साथ-साथ विभिन्न देशों के अधिकारियों के लिए भी प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है।
उन्होंने बताया कि एनसीजीजी अब तक 52 देशों के सिविल सेवकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित कर चुका है और 5500 से अधिक अधिकारियों को प्रशिक्षित कर चुका है। श्रीलंका सरकार के साथ हुए समझौते के तहत श्रीलंकाई सिविल सेवकों के लिए आपदा प्रबंधन विषय पर विशेष क्षमता निर्माण कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत यह अध्ययन भ्रमण आयोजित किया गया।
इस अवसर पर संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी मो. ओबैदुल्लाह अंसारी, डॉ. पी.डी. माथुर, डॉ. पूजा राणा सहित अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।
