गांधी जयंती : स्वच्छ भारत दिवस
–वी. श्रीनिवासन
सार्वजनिक स्वच्छता एक ऐसा विषय था, जिसके बारे में महात्मा गांधीजी की जीवन पर्यन्त गहरी दिलचस्पी रही। गांधीजी ने भारतीयों को स्वच्छता के महत्व के बारे में प्रेरित करने के लिए अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय समर्पित किया और इस महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर राष्ट्र की चेतना को जगाने का प्रयास किया। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि गांधीजी के प्रकाशित साहित्य सार्वजनिक स्वच्छता के मुद्दे की ओर महत्वपूर्ण ध्यान देने के लिए समर्पित है,जिनमें सत्याग्रह, अहिंसा और खादी पर समान रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया है।
गांधीजी का आदर्श गांव का दर्शन गांवों में पूर्ण स्वच्छता, गांव की गलियां और सड़कें धूल और गंदगी से मुक्त होने पर केन्द्रित था। अपनी पुस्तक ‘आश्रम अब्ज़र्वन्स इन एक्शन’ में गांधीजी ने लिखा है कि स्वच्छता सेवा एक आवश्यक और बहुत पवित्र सेवा है, फिर भी समाज में इसे नीची दृष्टि से देखा जाता है। इस कारण सामान्य रूप से इसे नजर अंदाज किया जाता है और इसमें सुधार की व्यापक संभावनाएं हैं। आश्रम में साफ-सफाई के इस कार्य के लिए बाहर से श्रम नहीं लेने पर जोर दिया गया है। आश्रम के सदस्य बारी-बारी से अपने आप पूरी साफ-सफाई करते हैं। आश्रम में सामान्य और उपयोग करने में आसान शौचालयों को तैयार किया गया है और उनकी सफाई के लिए किसी सफाई कर्मी की जरूरत नहीं है। सेवा ग्राम आश्रम के नियमों में यह उल्लेख है कि आश्रम के निवासियों को अपने हाथ साफ मिट्टी और शुद्ध पानी से धोने चाहिए और उसके बाद हाथों को साफ कपड़े से पोंछा जाए।
दक्षिण अफ्रीका में भी गांधीजी ने जीवन में साफ-सफाई को बहुत महत्व दिया है। अपनी पुस्तक ‘सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका’ में टॉल्स्टॉय फार्म में अपने जीवन के बारे में उन्होंने यह वर्णन किया है कि, ‘वहां पर एक झरना हमारे क्वार्टरों से लगभग 500 गज दूर था और वहां से पानी लाद कर लाना पड़ता था। वहां हमने इस बात पर जोर दिया कि हमें कोई नौकर नहीं रखना चाहिए। खाना पकाने से लेकर साफ-सफाई तक सारा काम हम अपने हाथों से करते थे। शेर की तरह सख्त थंबी नायडू साफ-सफाई का प्रभारी था। बड़ी संख्या में लोगों के रहने के बावजूद फार्म में कहीं भी किसी किस्म की कोई गंदगी नहीं रहती थी। सारे कचरे को एक बड़े गड्ढे में डाल दिया जाता था। इस प्रकार एक छोटी सी कुदाल एक बड़ी परेशानी से निजात पाने का साधन है।’
अपनी पुस्तक ‘माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ’ में गांधीजी ने लिखा है कि 1897 में बम्बई में प्लेग का प्रकोप हुआ और चारों ओर डर का माहौल था। गांधीजी ने राज्य के स्वच्छता विभाग को अपनी सेवाएं देने की पेशकश की। गांधीजी ने शौचालयों का निरीक्षण करने और उनमें सुधार लाने के बारे में विशेष जोर दिया। अछूतों के क्वार्टरों के निरीक्षण में गांधीजी ने यह देखा कि उनके क्वार्टर गाय के गोबर से खूबसूरती के साथ लिपे-पुते हैं और उनके बर्तन भी साफ-सुथरे हैं तथा सफाई के कारण चमक रहे हैं। उन क्वार्टरों में प्लेग फैलने का कोई डर नहीं था। गांधीजी ने यह भी लिखा है कि जब उन्होंने वैष्णव हवेली का दौरा किया, तो वे पूजा स्थल में फैली गंदगी को देखकर बहुत दु:खी हुए। वे जानते थे कि ‘स्मृतियों’ में लेखकों ने घर के अंदर और बाहर साफ-सफाई पर बहुत जोर दिया है। गांधीजी ने यह भी लिखा है कि स्वच्छता के बारे में भारत के गांवों तक पहुंच बनाने का काम बहुत मुश्किल है। लोग अपने घर के कचरे की भी साफ-सफाई करने के लिए तैयार नहीं थे। गांधीवादी स्वयंसेवकों ने गांवों को आदर्श रूप से स्वच्छ बनाने के बारे में अपनी ऊर्जा केन्द्रित की और उन्होंने सड़कों, आंगनों और कुओं और तालाबों की साफ-सफाई की तथा ग्रामीणों को अपने आपमें से ही स्वयंसेवक तैयार करने के लिए राजी किया।
गांधीजी ने साफ-सफाई की कमजोर स्थिति और अस्पृश्यता की प्रथा के बीच के संबंध को अच्छी तरह पहचाना। लोग साफ-सफाई को इसलिए नजर अंदाज करते हैं क्योंकि यह अछूत लोगों की जिम्मेदारी माना गया था। गांधीजी ने अनुभव किया कि छुआछूत को समाप्त किया जाना चाहिए और साथ-साथ ही सार्वजनिक स्वच्छता की स्थितियां भी सुधारी जानी चाहिए। गांधीजी ने अपने अनुयायियों को साफ-सफाई के कार्यों के लिए तथाकथित निचली जातियों के किसी भी व्यक्ति को भर्ती करने से मना किया। गांधीजी ने महसूस किया कि उन्होंने जिन लोगों को भगवान के बालक अर्थात हरिजन का नाम दिया है, उन्हें साफ-सफाई के पेशे से मुक्त होने पर ही समाज में अन्य वर्गों के साथ समानता की स्थिति में लाने में मदद मिलेगी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अस्पृश्यता को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया था। गांधीजी का दर्शन मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 17 में सुशोभित है, जिसमें छुआछूत के उन्मूलन की घोषणा की गई है यह छुआछूत की किसी भी प्रथा को रोकता है। अस्पृश्यता के कारण पैदा होने वाली कोई भी विकलांगता कानून के अनुसार दण्डनीय होगी। अनुच्छेद 17 का मुख्य उद्देश्य किसी भी रूप में अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाना है।
