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हिमालय के गर्म कोख से ऊर्जा क्रांति की शुरुआत

This article discusses Uttarakhand’s pioneering step of launching India’s first geothermal energy pilot project at Tapovan in Chamoli district, marking a significant move towards clean and reliable energy. It highlights India’s geothermal potential—estimated at over 10,000 MW—with hot water springs across Uttarakhand, Ladakh, Himachal Pradesh, Chhattisgarh, and Gujarat identified as priority sites. Unlike solar and wind, geothermal energy provides constant, weather-independent power with zero carbon emissions. The article emphasizes the broader applications of geothermal energy in electricity generation, greenhouse farming, tourism, and healthcare, particularly in remote Himalayan villages. It also notes challenges such as geological instability and lack of technical expertise but points to global examples like Iceland and Kenya as models. Overall, Uttarakhand’s initiative is portrayed as a possible turning point in India’s clean energy transition, with the potential to produce at least 1,000 MW in the next decade if supported by strong policy, investment, and technology.

 

–जयसिंह रावत

उत्तराखंड सरकार ने भू-तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व करते हुए सीमान्त चमोली जिले के तपोवन में राज्य का पहला भू-तापीय ऊर्जा पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है। यह परियोजना, जहाँ गर्म जल स्रोत 90-100 डिग्री सेल्सियस तापमान देते हैं, ऊर्जा स्वावलंबन और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यूकॉस्ट, आइआइटी और एनजीआर आइ के सहयोग से वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हो चुके हैं। यह न केवल विद्युत उत्पादन, बल्कि पर्यटन, जल उपचार, और कृषि के लिए नए द्वार खोलेगा। भू-तापीय ऊर्जा, जो पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा से प्राप्त होती है, निरंतर उपलब्ध, पर्यावरण-सहज, और कम कार्बन उत्सर्जन वाला स्रोत है। भारत में लद्दाख (पूगा घाटी, 2022 में ONGC का पायलट संयंत्र), हिमाचल प्रदेश (मणिकरण, जहाँ अभी व्यावसायिक संयंत्र नहीं है), छत्तीसगढ़ (तत्तापानी), और अन्य क्षेत्रों में इसकी संभावनाएँ मौजूद हैं। यह ऊर्जा सौर और पवन ऊर्जा से अलग, मौसम पर निर्भर नहीं, और जीवाश्म ईंधन की तुलना में स्थायी है। भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए भू-तापीय ऊर्जा एक छोटा किंतु महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है, बशर्ते नीतिगत सहायता और तकनीकी उन्नति हो।

 

पांच स्थानों पर केंद्र की प्राथमिकता

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की बात करें तो भारत सरकार ने देश के जिन पांच स्थलों को भू-तापीय ऊर्जा विकास के लिए प्राथमिकता पर रखा है, उनमें हिमाचल प्रदेश का पग्घी, उत्तराखंड का तपोवन, लद्दाख के मानसरोवर और पामयांग क्षेत्र, छत्तीसगढ़ का तत्तापानी और गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित गरमपानी शामिल हैं। ये सभी क्षेत्र पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की हलचलों से प्रभावित हैं और यहां की सतह के नीचे मौजूद मैग्मा के कारण प्राकृतिक गर्म जल स्रोत उपलब्ध हैं। इन स्थलों का चयन वैज्ञानिकों और ऊर्जा मंत्रालय के संयुक्त सर्वेक्षण के आधार पर किया गया है। भूगर्भ विशेषज्ञों के अनुसार भारत में भू-तापीय ऊर्जा की कुल अनुमानित क्षमता 10,000 मेगावाट से अधिक है, जबकि वर्तमान में इस क्षेत्र में कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं हो रहा है।

 

उत्तराखंड के गर्म झरनों की अपार क्षमता

उत्तराखंड में कुल 60 से अधिक प्राकृतिक गर्म जल स्रोत हैं, जिनमें से कई में पानी का तापमान 70 से 100 डिग्री सेल्सियस के बीच है। इनमें से प्रमुख स्थल हैं तपोवन (उत्तरकाशी), सूर्यकुंड और तप्तकुंड (बद्रीनाथ, चमोली), यमुनोत्री, नारदकुंड, गौचर, फूलचट्टी, हनुमानचट्टी, कुंड (टिहरी), और झूलाघाट (पिथौरागढ़)। इनमें तपोवन और बद्रीनाथ के निकट के जल स्रोत न केवल तीर्थ और स्नान के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से उच्च तापीय संभावनाओं वाले स्थल हैं। तपोवन में प्रस्तावित 2 मेगावाट क्षमता का पायलट प्लांट सफल हुआ तो इसे अन्य स्थलों पर 3 से 5 मेगावाट क्षमता तक विस्तारित करने की योजना है।

 

लद्दाख और हिमाचल की सक्रिय भूगर्भीय धरती

हिमाचल प्रदेश में कुल्लू और किन्नौर के पग्घी और मणिकर्ण क्षेत्र वर्षों से गर्म जलस्रोतों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। यहां तापमान भी 80 से 95 डिग्री के बीच दर्ज होता है और राज्य सरकार ने इन स्थलों पर मिनी भू-तापीय परियोजनाएं स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की है। लद्दाख का भूगर्भीय परिदृश्य भारत में सबसे सक्रिय क्षेत्रों में से एक है। वहां के मानसरोवर और पामयांग क्षेत्रों में तापमान 90 से 110 डिग्री सेल्सियस तक पाया गया है। लद्दाख प्रशासन ने सौर और जल विद्युत के साथ-साथ भू-तापीय ऊर्जा को तीसरे स्तंभ के रूप में स्थापित करने की रणनीति बनाई है, जिससे वहां की कठोर जलवायु में निरंतर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।

 

धामी सरकार की अनोखी पहल

उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार की वर्तमान पहल इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि यह राज्य पहले से ही जल विद्युत उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, परंतु भू-तापीय ऊर्जा इसका एक नया, नवाचार-आधारित अध्याय हो सकता है। यह ऊर्जा स्रोत जलवायु और मौसम पर निर्भर नहीं करता, इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में यह सौर और जल विद्युत की तुलना में अधिक निरंतर और विश्वसनीय हो सकता है। इसके अलावा यह पूरी तरह से हरित और शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा है, जो भारत के जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप है।

भू-तापीय ऊर्जा का उपयोग न केवल बिजली उत्पादन के लिए सीमित है, बल्कि इसे ग्रीनहाउस खेती, औद्योगिक प्रसंस्करण, दूध उत्पादन इकाइयों, होटलिंग, बर्फबारी वाले क्षेत्रों में सड़क की बर्फ हटाने, और जल चिकित्सा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां अनेक दूरस्थ गांव आज भी स्थायी और भरोसेमंद बिजली से वंचित हैं, वहां उत्साही युवा मुख्यमंत्री धामी की यह पहल ऊर्जा विकेन्द्रीकृत मिनी-ग्रिड सिस्टम के रूप में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।

 

भविष्य की राह : 1000 मेगावाट उत्पादन की संभावना

भारत सरकार द्वारा 2022 में प्रस्तावित नेशनल जियोथर्मल एनर्जी मिशन अभी तक लागू नहीं हो सका है, परंतु राज्यों की पहल इस दिशा में केंद्र को भी जागरूक कर रही है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि उचित नीति, निवेश और तकनीकी सहयोग दिया जाए, तो भारत अगले 10 वर्षों में कम से कम 1000 मेगावाट भू-तापीय ऊर्जा उत्पादन प्रारंभ कर सकता है। इससे देश के कई दूरवर्ती और सीमावर्ती क्षेत्रों को स्थायी बिजली आपूर्ति मिल सकती है, जिन तक बड़े ग्रिड पहुंचाने में भारी लागत और समय लगता है। उत्तराखंड सरकार ने इस दिशा में यूकॉस्ट, आइआइटी और एनजीआर आइ जैसे संस्थानों को जोड़कर एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक मॉडल की आधारशिला रखी है। इसके साथ ही पर्यटन, जैविक खेती, और स्वास्थ्य क्षेत्र को भी इससे जोड़ा जा सकता है। यदि बद्रीनाथ, यमुनोत्री और तपोवन जैसे धार्मिक स्थलों पर भू-तापीय ऊर्जा आधारित स्नानगृह, वेलनेस सेंटर और ग्रीनहाउस प्रकल्प विकसित किए जाएं तो यह धार्मिक पर्यटन को आधुनिक, टिकाऊ और आय-सृजनकारी रूप दे सकता है।

चुनौतियों के बावजूद संभावनाओं की नई दिशा

हालांकि कुछ चुनौतियां भी इस मार्ग में हैं, जैसे हिमालयी क्षेत्रों की भूगर्भीय अस्थिरता, भूस्खलन, और तकनीकी अनुभव की कमी। लेकिन ये समस्याएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय अनुभव से हल की जा सकती हैं। आइसलैंड, केन्या और फिलीपींस जैसे देशों ने भू-तापीय ऊर्जा को अपने ऊर्जा मिश्रण में सफलतापूर्वक शामिल किया है। भारत के पास भी वही क्षमता है, यदि इच्छाशक्ति, निवेश और योजना-निर्माण में निरंतरता बनी रहे।

इस संदर्भ में उत्तराखंड की यह पहल केवल एक राज्यीय परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा क्रांति की संभावित दिशा है। यदि धामी सरकार का यह प्रयोग सफल होता है तो यह अन्य राज्यों को भी प्रेरित करेगा और भारत को स्वच्छ ऊर्जा नेतृत्व के मार्ग पर अग्रसर करेगा। पर्वतों की गोद से निकलती यह गर्मी अब केवल स्नान तक सीमित नहीं रहेगी—यह ऊर्जा में बदलेगी, गांवों को रोशन करेगी, और विकास की उस लौ को जलाएगी जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने की ताकत रखती है।

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