राजनीतिक प्रपंच से ज्यादा कुछ नहीं उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी
-उषा रावत
गैरसैण (भराड़ीसैंण) को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की मांग किसने की? यह मांग उत्तराखंड की जनता ने की, राज्य आंदोलन के दौरान पहाड़ी लोगों ने की, और सबसे पहले 1960 के दशक में स्वतंत्रता सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने इसे उठाया। लेकिन 2020 में भाजपा सरकार ने इसे घोषित कर दिया, तो क्या ऐसी होती है राजधानी जहां विधानसभा सत्र हफ्तेभर भी न टिकें, ग्रीष्मकाल में तो दूर की बात? भराड़ीसैंण या गैरसैण राजनीतिक प्रपंच और जनता को मूर्ख बनाने का सबसे ज्वलंत उदाहरण बन गया है।जहां पार्टियां चुनाव में वादे करती हैं, लेकिन सत्ता में आने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास को भूल जाती हैं।
यह जगह पहाड़ी इलाके का केंद्र है, जहां राज्य की सांस्कृतिक, भौगोलिक और भावनात्मक पहचान जुड़ी हुई है। 1992 में उत्तराखंड क्रांति दल ने इसे ‘चंद्रनगर’ नाम से राजधानी घोषित किया था, और 1994 की रामशंकर कौशिक समिति ने भी इसकी सिफारिश की। राज्य बनने के बाद 2000 में देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया, लेकिन जनता की मांग जारी रही। गैरसैण के पक्ष में तर्क मजबूत हैं:- यह पहाड़ी विकास को बढ़ावा देगी, प्रवास रोकगी, और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। अगर गैरसैण को पूर्ण राजधानी बनाया जाए, तो राज्य की असमानता कम होगी। देहरादून में विकास केंद्रित होने से पहाड़ खाली हो रहे हैं। जनता की भावनाएं गैरसैण से जुड़ी हैं, और इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी कहकर धोखा दिया जा रहा है।
गैरसैण की ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व
गैरसैण उत्तराखंड के सपनों का प्रतीक है। राज्य आंदोलन के दौरान पहाड़ी लोग देहरादून की बजाय गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग करते थे, क्योंकि यह मैदान और पहाड़ के बीच संतुलन बनाता है। 2008 के दीक्षित आयोग ने देहरादून को स्थायी बनाने की सिफारिश की, जो विवादास्पद थी, क्योंकि गैरसैण भूकंप क्षेत्र होने के बावजूद राज्य की आत्मा है। यहां विधानसभा भवन बन चुका है, लेकिन उपयोग सिर्फ नाममात्र का है। जनता की भावनाएं गैरसैण से जुड़ी हैं, और इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी कहकर धोखा दिया जा रहा है।
2014 का सत्र: भाजपा का हंगामा और सत्र का स्थगन
2014 में गैरसैण में पहला विधानसभा सत्र 9-12 जून को आयोजित हुआ, जब कांग्रेस की हरीश रावत सरकार सत्ता में थी। यह सत्र गैरसैण को राजधानी बनाने की दिशा में एक कदम था, लेकिन विपक्षी भाजपा ने भारी हंगामा मचाया। उस समय नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट थे। हंगामे के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि वह गैरसैण के बारे में अति महत्वपूर्ण घोषणा सदन में करने जा रहे थे, जिसे भाजपाईयों ने भाँप लिया और उससे पहले कुर्सियां फेंकनी और अराजकता शुरू कर दी। उस दिन वास्तव में भाजपा सदस्यों ने सदन में कोहराम मचाया, कुर्सियां फेंकीं, और विभिन्न मुद्दों पर विरोध जताया। नतीजा? सत्र स्थगित हो गया, और महत्वपूर्ण चर्चाएं अधर में रह गईं। उस समय भाजपा का तर्क था कि सरकार जन मुद्दों पर ध्यान नहीं दे रही, लेकिन असल में यह राजनीतिक स्टंट था। गैरसैण जैसे संवेदनशील जगह पर सत्र आयोजित करने का उद्देश्य राज्य विकास था, लेकिन हंगामे ने इसे बर्बाद कर दिया। यह घटना दिखाती है कि पार्टियां सत्ता से बाहर होने पर गैरसैण को मुद्दा बनाती हैं, लेकिन सत्ता में आने पर भूल जाती हैं।
2025 का सत्र: कांग्रेस का हंगामा और फिर स्थगन
इतिहास खुद को दोहराता है। 2025 के मानसून सत्र (19-22 अगस्त) में भाजपा सरकार के समय कांग्रेस विपक्ष में थी। सत्र शुरू होते ही कांग्रेस सदस्यों ने हंगामा शुरू कर दिया—पंचायत चुनावों में हिंसा, कानून-व्यवस्था और नैनीताल गोलीबारी जैसे मुद्दों पर। सदन में कोहराम मचा, सदस्यों ने सचिव की मेज पलटी, कागज फाड़े, और प्रदर्शन किया। नतीजा? चार दिवसीय सत्र मात्र डेढ़-दो दिन चला, कुल 2 घंटे 40 मिनट की कार्यवाही हुई, और अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस बीच 9 विधेयक (जैसे यूनिफॉर्म सिविल कोड संशोधन, धर्मांतरण विरोधी कानून) और 5315 करोड़ का अनुपूरक बजट पास हुआ, लेकिन बिना चर्चा के। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार चर्चा से भाग रही है, जबकि भाजपा ने कहा कि विपक्ष सदन को ‘लॉज’ बना रहा है। यह सत्र गैरसैण की क्षमता को फिर से उजागर करता है—अगर सही तरीके से उपयोग हो, तो यहां लंबे सत्र हो सकते हैं। लेकिन हंगामा राजनीतिक नाटक का हिस्सा है, जो जन मुद्दों को दबाता है।
डेढ़-दो दिन के हंगामे से क्या ग्रीष्मकालीन राजधानी बन जाती है?
नहीं! गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना एक छलावा है। यहां सत्र साल में मुश्किल से कुछ दिन चलते हैं, और वो भी हंगामे से भरे। ग्रीष्मकाल में तो सत्र होते ही नहीं ।इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी (रेल/एयर कनेक्टिविटी न होना), विधायकों की अनिच्छा (देहरादून से दूर), और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी कारण हैं। औसतन विधानसभा साल में सिर्फ 16 दिन बैठती है, और गैरसैण में तो हफ्तेभर भी नहीं। ऐसे में कैसे यह राजधानी है? यह राजनीतिक नाटक जनता को धोखा देता है। पार्टियां चुनाव में गैरसैण का नाम लेती हैं, लेकिन सत्ता में विकास पर ध्यान नहीं देतीं। भाजपा और कांग्रेस दोनों दोषी हैं: 2014 में भाजपा ने हंगामा किया, 2025 में कांग्रेस ने। यह चक्रव्यूह है, जहां गैरसैण पीड़ित है।
गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाएं, नाटक बंद करें
गैरसैण उत्तराखंड की सच्ची राजधानी बनने की हकदार है। यहां पूर्ण सत्र आयोजित करें, इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें, और जन मुद्दों पर चर्चा करें। राजनीतिक हंगामे राज्य को पीछे धकेलते हैं—जनता को विकास चाहिए, न कि नाटक। अगर पार्टियां सच्ची हैं, तो गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाएं, वरना यह धोखा जारी रहेगा। उत्तराखंड की जनता जागरूक है; अब समय है सच्चे कदम उठाने का। 0

