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नई शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से समाज का डी-स्कूलिंग

 


-देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी-

साल 1971 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Deschooling Society में इवान इलिच ने ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहाँ शिक्षा आत्म-निर्देशित हो, सभी के लिए सुलभ हो और जीवन के दैनिक अनुभवों में अंतर्निहित हो। उन्होंने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि स्कूलों ने शिक्षा पर एकाधिकार कर लिया है, जो धन और मानव संसाधनों का अत्यधिक उपभोग करते हैं। इससे पहले पाउलो फ्रेरे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Pedagogy of the Oppressed (1968) में पारंपरिक शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हुए लिखा था कि यह पद्धति रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को दबाती है तथा सामाजिक असमानताओं को और गहरा करती है।

भारत में भी इन विचारों की गूंज सुनाई देती रही है। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा में रचनात्मकता, समग्र विकास और प्रकृति के साथ जुड़ाव पर बल दिया। प्राचीन भारत की गुरुकुल प्रणाली भी इसी सोच पर आधारित थी, जहाँ प्राकृतिक परिवेश में शिक्षक और शिष्य के बीच आवासीय शिक्षा दी जाती थी। लेकिन औपनिवेशिक काल में इस व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया गया। लॉर्ड मैकॉले की 1835 की शिक्षा संहिता का उद्देश्य था ऐसी भारतीय श्रेणी तैयार करना जो “रंग और खून से भारतीय लेकिन सोच और बुद्धि से अंग्रेज़” हो। इस सोच ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव रखी, जो आज भी हमारे शैक्षिक ढांचे को प्रभावित करती है।

इसी संदर्भ में नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 एक महत्वपूर्ण बदलाव की पहल करती है। कई मायनों में यह नीति इलिच की “डी-स्कूलिंग” की अवधारणा के निकट दिखाई देती है। यह नीति शिक्षा को “अनुभवजन्य, समग्र, एकीकृत, खोज-आधारित, जिज्ञासु, लचीली और आनंददायक” बनाने पर जोर देती है। इसमें विज्ञान और गणित के साथ-साथ कला, शिल्प, मानविकी, खेल, भाषा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों को समान महत्व देने की बात कही गई है।

शिक्षा को व्यवहारिक और समग्र बनाने के लिए हमें इसे केवल तीन “आर”—रीडिंग, राइटिंग और अरिथमैटिक तक सीमित नहीं रखना चाहिए। प्रारंभिक स्तर से ही बच्चों को नृत्य, नाटक, कठपुतली, कहानी कहने, संगीत और चित्रकला जैसी रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ा जाना चाहिए। उच्च कक्षाओं में उन्हें इलेक्ट्रिशियन, वेल्डिंग, प्लंबिंग, कंप्यूटर हार्डवेयर, बढ़ईगिरी और संगीत वादन जैसे व्यावसायिक कौशल सिखाना आवश्यक है। खेल-कूद को भी शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए और इन्हें मूल्यांकन प्रणाली में सम्मिलित करना चाहिए। एनसीसी, एनएसएस और स्काउट्स जैसी गतिविधियों को भी मुख्यधारा में शामिल करना होगा।

कक्षा दसवीं के बाद विषयों का विभाजन (विज्ञान, वाणिज्य, कला) अक्सर छात्रों में हीनता की भावना पैदा करता है। कुछ शिक्षकों द्वारा छात्रों का अपमान या उपेक्षा उनकी आत्म-विश्वास और रचनात्मकता को गहरी चोट पहुँचा सकती है, जिससे आगे चलकर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए शिक्षकों और अभिभावकों को सदैव सहानुभूति और प्रोत्साहन की भावना से कार्य करना चाहिए।

एक समान पाठ्यक्रम भी समय की आवश्यकता है। चाहे विज्ञान हो, वाणिज्य हो या सामाजिक विज्ञान—सभी छात्रों को समान अवसर मिलने चाहिए। राज्य अपनी स्थानीय संस्कृति, इतिहास और भूगोल को शामिल कर सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्रव्यापी पाठ्यक्रम और एकल राष्ट्रीय बोर्ड (जैसे Indian Board of School Education) की दिशा में कदम बढ़ाना जरूरी है।

नई शिक्षा नीति को वैकल्पिक शिक्षा पद्धतियों जैसे गुरुकुल और होम-स्कूलिंग को भी मान्यता और प्रोत्साहन देना चाहिए। किसी भी 17 वर्षीय छात्र को पारंपरिक स्कूलिंग किए बिना भी किसी भी राज्य या केंद्रीय बोर्ड से सीधे कक्षा 12 की परीक्षा देने का अधिकार होना चाहिए।

डिजिटलीकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा जैसे नए विषयों के आगमन के साथ पाठ्यक्रम में बदलाव अवश्य होंगे, लेकिन शिक्षण की पद्धति को हमेशा संवेदनशील और मानवीय बनाए रखना होगा। खासकर प्राथमिक शिक्षा में शिक्षक की भूमिका सबसे अहम है, क्योंकि वही समाज और राष्ट्र के भविष्य की नींव रखता है।

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