आपदा/दुर्घटनाब्लॉग

धराली के बाद थराली: असुरक्षित हो गया हिमालय पर रहना

The devastating disaster of August 5, 2025, in Dharali, Uttarkashi, where massive landslides buried dozens under tons of debris, is still posing challenges to ongoing relief operations. Even as those wounds remain fresh, another calamity struck Chamoli district’s Tharali region on the night of August 22-23, 2025, once again highlighting the fragility of the Himalayas. Around 1:00–1:30 AM, a cloudburst triggered flash floods in the Pindar and Pranmati rivers, sweeping away homes, shops, and vehicles. One young woman lost her life, and another person is reported missing. The floods in the Tunri Gadera stream wreaked havoc in Tharali Bazaar, Tehsil premises, Kotdeep, Radibagar, Chepado, and Sagwada. Roads, including Tharali–Gwaldam and Tharali–Sagwada were blocked by debris, cutting off transportation across the region.

-जयसिंह रावत

उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त 2025 को आई भयावह आपदा, जिसमें लाखों टन मलबे में कई लोग दब गए, आज भी राहत कार्यों के लिए चुनौती बनी हुई है। इस त्रासदी के घाव अभी भरे भी नहीं थे कि चमोली जिले के थराली में 22-23 अगस्त 2025 की रात आसमानी आफत ने एक बार फिर हिमालय की नाजुकता को उजागर कर दिया। थराली तहसील में रात करीब 1:00 से 1:30 बजे के बीच बादल फटने से पिंडर और प्रणमति नदियां उफान पर आ गईं। देखते ही देखते कई घर, दुकानें और वाहन मलबे में दब गए। इस आपदा में एक युवती की मौत हो गई, जबकि एक व्यक्ति अभी भी लापता है। टूनरी गधेरे में आई बाढ़ ने थराली बाजार, तहसील परिसर, कोटदीप, राड़ीबगड़, चेपडो और सागवाड़ा जैसे क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई। थराली-ग्वालदम और थराली-सागवाड़ा मार्ग मलबे से पूरी तरह अवरुद्ध हो गए, जिससे पूरे क्षेत्र का यातायात ठप हो गया।

उत्तरकाशी में भागीरथी नदी में बनी अस्थाई झील को खाली करने के प्रयास जारी थे, तभी स्यानाचट्टी में बरसाती नाले से लाए गए मलबे ने यमुना नदी पर एक और विशाल झील बना दी, जो जनजीवन के लिए नया खतरा बन गई है। उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे हिमालयी राज्य आज प्राकृतिक आपदाओं—बादल फटने, त्वरित बाढ़ और भूस्खलन—की बार-बार चपेट में आ रहे हैं। हाल के वर्षों में इन घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में स्पष्ट वृद्धि हुई है।

 

8 जुलाई के सुबह 4बजे कों सेरा गांव के मोक्ष नदी के उपर बादल फटना था

हिमालय में प्राकृतिक आपदाओं का भूगर्भीय संदर्भ

हिमालय दुनिया की सबसे युवा और भूगर्भीय दृष्टि से अस्थिर पर्वत श्रृंखला है। इसकी ऊँची खड़ी ढलानें, सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र और विशाल ग्लेशियर इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। बादल फटने की घटनाएं अक्सर अचानक और अत्यधिक बारिश लाती हैं, जिससे त्वरित बाढ़ और भूस्खलन होते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नमी लेकर बने क्यूम्युलोनिंबस बादल हिमालयी इलाकों में 15 किलोमीटर तक की ऊँचाई पर जाकर मूसलाधार बारिश करते हैं।

2013 की केदारनाथ त्रासदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसमें मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों में आई विनाशकारी बाढ़ से 6,000 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लापता हुए। इसी प्रकार, 14 अगस्त 2025 को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में मचैल माता यात्रा मार्ग पर बादल फटने से चसोती गांव तबाह हो गया, जिसमें कम से कम 60 लोग मारे गए और सैकड़ों लापता हो गए। उत्तराखंड के धराली क्षेत्र में 5 अगस्त को आई त्वरित बाढ़ ने भी नदी के बहाव को बदल दिया और 20 हेक्टेयर क्षेत्र में मलबा जमा कर दिया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सैटेलाइट तस्वीरों में इस आपदा के भयावह दृश्य साफ देखे जा सकते हैं।

 

जलवायु परिवर्तन की भूमिका

जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदाओं की तीव्रता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले सौ वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जबकि हिमालयी क्षेत्र का तापमान वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। इसका सीधा असर ग्लेशियरों के क्षरण और उच्च ऊँचाई पर बनी ग्लेशियल झीलों पर पड़ रहा है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में 2020 में 7, 2021 में 11, 2022 में 14, 2023 में 16 और 2024 में 15 बादल फटने की घटनाएं दर्ज की गईं। 2025 में अब तक 12 घटनाएं हो चुकी हैं। उत्तराखंड में भी पिछले आठ वर्षों में 67 से अधिक बड़ी घटनाएं दर्ज की गई हैं। WIHG की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, चमोली आपदा का मुख्य कारण चट्टान-बर्फ भूस्खलन और ग्लेशियल झील का फटना (GLOF) था, जिसने ऋषिगंगा में बाढ़ लाई और दो जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया। विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो 2030 तक हिमालयी ग्लेशियर अपनी कुल मात्रा का 30-50% खो सकते हैं।

 

मानवीय हस्तक्षेप और पर्यावरणीय संकट

प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानवीय हस्तक्षेप भी आपदाओं को और घातक बना रहा है। अंधाधुंध सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पहाड़ों की खुदाई, जंगलों की कटाई और अनियोजित शहरीकरण ने पहाड़ों को कमजोर कर दिया है। धराली और हर्षिल में आई बाढ़ के बाद विशेषज्ञों ने पाया कि नदियों के किनारे बिना योजना के हुए निर्माण और वन कटाई से मलबा जमा होने की गति बढ़ गई, जिससे अस्थाई झीलें बनीं और नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आई।

इसी प्रकार, बद्रीनाथ-माणा मार्ग, गंगोत्री और केदारनाथ मार्ग पर बार-बार होने वाले भूस्खलन भी अंधाधुंध निर्माण और भारी मशीनरी के उपयोग का नतीजा हैं। 2011 में भारतीय पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट ने पहले ही चेताया था कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण की अधिकतम सीमा से अधिक दबाव बढ़ रहा है, जो आने वाले समय में बड़े संकट को जन्म दे सकता है।

 

हाल की आपदाओं की सूची

  • धराली, उत्तरकाशी (5 अगस्त 2025): बादल फटने और त्वरित बाढ़ ने कई घरों और दुकानों को मलबे में दबा दिया। अब तक 5 मौतों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 100 से अधिक लोग लापता हैं, जिनमें 11 सैनिक और केरल के 28 पर्यटक शामिल हैं।
  • थराली, चमोली (22-23 अगस्त 2025): रात के समय बादल फटने से पिंडर और प्रणमति नदियों ने रौद्र रूप धारण कर लिया। कई वाहन बह गए, सड़कें ध्वस्त हो गईं, एक युवती की मौत हुई और एक व्यक्ति लापता है।
  • किश्तवाड़, जम्मूकश्मीर (14 अगस्त 2025): मचैल माता यात्रा मार्ग पर बादल फटने से चसोती गांव में 60 लोगों की मौत और सैकड़ों के लापता होने की खबर है।

 

इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में रहना दिन-ब-दिन जोखिमभरा होता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि विकास योजनाएं वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप नहीं बनीं, तो उत्तराखंड और पूरे हिमालय क्षेत्र में आपदाएं और भयावह होंगी। पर्वतीय राज्यों के लिए अब यह समय है कि वे पर्यटन और विकास के नाम पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बंद करें, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा बनाएं और जलवायु परिवर्तन की चुनौती को गंभीरता से लें।

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