ब्लॉग

लड़कियां बस… लड़कियों के साथ रहना चाहती हैं ?

 

महिलाओं में यौन लचीलापन अधिक: कारण जैविक, सामाजिक दबाव या पुरुषों से निराशा?

 

रेणुका बिष्ट-

जब भी केटी पेरी का 2008 का मशहूर गाना I Kissed a Girl बजता है, कई महिलाएं अनायास ही उसकी ओर खिंच जाती हैं, मानो कोई अदृश्य ऊर्जा उन्हें जोड़ रही हो। यह आकर्षण अक्सर अनकहे और अनछुए भावों का प्रतीक होता है। हो सकता है यह वही कल्पना हो जिसे महिलाओं ने केवल सोचा हो या गुप्त रूप से आज़माया हो। गाने की पंक्तियां इस भाव को सहजता से दर्शाती हैं—एक लड़की दूसरी को सिर्फ आज़माने के लिए चूमती है, उसे अच्छा लगता है, और वह चाहती है कि उसका बॉयफ्रेंड इसे बुरा न माने। पेरी को इस गाने के लिए आलोचना भी झेलनी पड़ी कि यह महिलाओं की ‘क्वीयर कामुकता’ को पुरुष दृष्टि के मनोरंजन का साधन बना रहा है, लेकिन यह गाना आज भी महिलाओं के बीच रोमांच जगाता है।

यौन पहचान के पिंजरे से बाहर कदम

21वीं सदी में दुनिया के कई हिस्सों में सामाजिक सोच बदली है। कैलिफ़ोर्निया से लेकर कुआलालंपुर और एम्सटर्डम से भारत तक, अब युवा पीढ़ी अपनी यौन पहचान को कठोर लेबल्स में बांधकर देखने से इनकार करती है। वे इस विषय को ज्यादा खुलकर स्वीकार रहे हैं और यौन लचीलेपन (Sexual Fluidity) को मान्यता दे रहे हैं।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लिसा डायमंड इस क्षेत्र में अग्रणी शोध कर चुकी हैं। उनका कहना है कि महिलाएं अक्सर ‘स्ट्रेट’ या ‘गे’ की कठोर परिभाषाओं से परे अनुभव करने की क्षमता रखती हैं। यह लचीलापन जीवन के अलग-अलग चरणों और परिस्थितियों में प्रकट हो सकता है। कोई कॉलेज में इसे आज़मा सकती है, तो कोई असंतुष्ट वैवाहिक जीवन में।

समाज में असहजता का कारण

यह विचार समाज के लिए अब भी असहज करने वाला है। 1998 में दीप मेहता की फिल्म फायर इसी मुद्दे को लेकर विवादों में घिर गई थी। फिल्म ने दिखाया था कि एक ही घर की दो बहुएं आपसी आकर्षण महसूस कर सकती हैं। इस विषय पर तब से बहस जारी है।

यह सोच न केवल पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती है बल्कि यह धारणा भी तोड़ती है कि यौनिकता जन्म से तय और स्थिर होती है। यह एक नए मानवीय अनुभव का खाका है। आज यह विषय कम गुप्त और ज्यादा स्वाभाविक होता जा रहा है।

अमेरिका, ब्रिटेन और नीदरलैंड में हुए अध्ययनों से साबित हुआ है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में यौन लचीलापन अधिक अपनाती हैं। हालांकि भारत, चीन और अफ्रीका जैसे देशों में इस पर शोध अभी भी अनुभवजन्य और कथात्मक साक्ष्यों पर आधारित है।

महिलाओं में यह प्रवृत्ति क्यों?

शोधकर्ताओं के मुताबिक इसके दो प्रमुख कारण हैं।
पहला, कई महिलाएं पुरुषों से निराश हैं। जब वे ऐसे पुरुषों को देखती हैं जो महिलाओं से भावनात्मक श्रम करवाते हैं, सड़क किनारे पेशाब करते हैं, लड़कियों के स्कूलों में तोड़फोड़ करते हैं या यौन हिंसा करते हैं, तो महिलाओं का महिलाओं की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक लगता है।
दूसरा, आकर्षण को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। महिलाएं अक्सर किसी अनुभव पर प्रतिक्रिया देती हैं, उसे पहले से चुनती नहीं हैं।

संस्कृति का असर

लिसा डायमंड का मानना है कि यह प्रवृत्ति आंशिक रूप से संस्कृति का भी परिणाम है। कई समाजों में महिलाएं समान-लिंग वाले संबंधों को अधिक सहजता से अपनाती हैं। भारत में कई लेस्बियन कार्यकर्ता इस विषय पर इसलिए भी जोर देती हैं क्योंकि यह महिला-मित्रता के उस सुरक्षित दायरे को चुनौती दे सकता है, जो हमारे लिंग-भेद वाले समाज में महिलाओं को अपेक्षाकृत स्वतंत्रता देता है।

पुरुष पहचान का संकट

मनोवैज्ञानिक एलिज़ाबेथ मॉर्गन के अनुसार, पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुरुषों को अपनी पुरुषत्व की पहचान को बचाए रखना पड़ता है। विषमलैंगिकता (heterosexuality) इस पुरुषत्व का एक अहम हिस्सा है। इसके विपरीत महिलाएं अपनी स्वतंत्रता तलाश रही हैं।

सोशल मीडिया का योगदान

सोशल मीडिया एल्गोरिद्म भी इस बदलाव में योगदान दे रहे हैं। महामारी के दौरान ‘लेस्बियन टिक टॉक और स्ट्रेट महिलाएं’ ट्रेंड चर्चा का विषय बना। कई महिलाओं ने पाया कि वे खुद को ‘क्वीयर’ पहचानती हैं, जबकि उन्होंने यह पहले कभी महसूस नहीं किया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे बागवानी या गृह सुधार से जुड़े वीडियो देख रही थीं और धीरे-धीरे लेस्बियन कंटेंट उनकी स्क्रीन पर आने लगा।

मानव मस्तिष्क की लचीलापन

मस्तिष्क की लचीलापन इंसान की खासियत है। भारत जैसे देशों में जहां शादी लगभग सार्वभौमिक है और ‘अरेंज मैरिज’ सामाजिक संस्था है, वहां यह बदलाव व्यक्तिगत इच्छाओं और सामाजिक दबावों का मिश्रण है। नई संभावनाओं से परिचय या सामाजिक वर्जनाओं का कम होना हमें अपने अंदर छिपी लचीलापन को सामने लाने का अवसर देता है।

अंततः यह बदलाव हमें यह सिखाता है कि मानवीय संबंध पहचान के बंधनों में नहीं, बल्कि आत्मीय जुड़ाव में बसे होते हैं। और हर व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह अपनी पहचान और रिश्तों को अपनी शर्तों पर परिभाषित करे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!