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भारत की बाढ़: प्राचीन सामंजस्य से आधुनिक बाढ़ संकट तक

HISTORICALLY, ALL RIVER VALLEY CIVILIZATIONS – FROM ANCIENT EGYPT ALONG THE NILE TO MESOPOTAMIA BETWEEN THE TIGRIS AND EUPHRATES, THE INDUS VALLEY CIVILIZATION, AND EARLY CHINESE SOCIETIES ALONG THE YELLOW RIVER – DID NOT JUST ENDURE FLOODS; THEY THRIVED ON THEIR BOUNTY. RIVERS WERE THE ARTERIES OF LIFE, PROVIDING NOT ONLY ESSENTIAL DRINKING WATER AND MEANS OF TRANSPORT BUT ALSO STRATEGIC SAFETY. CRUCIALLY, ANNUAL FLOODS DELIVERED NUTRIENT-RICH SILT, REPLENISHING THE FERTILITY OF AGRICULTURAL LANDS YEAR AFTER YEAR, FORMING THE BEDROCK OF THEIR SUSTENANCE. THESE ANCIENT SOCIETIES LARGELY VIEWED FLOODS NOT AS A CURSE, BUT AS A VITAL, CYCLICAL EVENT. THE EGYPTIANS, FOR INSTANCE, BASED THEIR EARLY CALENDARS ON THE NILE‘S INUNDATION, AN EVENT OFTEN WELCOMED WITH FEASTING AND FESTIVITIES, MARKING THE PASSAGE OF TIME AND THE PROMISE OF RENEWED FERTILITY. THEY LEARNED TO LIVE IN HARMONY WITH NATURE.

 

Risk Prevention, Mitigation, and Management Forum – Because your safety comes first

 

By- PIYOOSH RAUTELA

भारत का जल के साथ संबंध हमेशा से एक वरदान और चुनौती दोनों रहा है, जो इसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत में गूंथा हुआ है। प्राचीन सभ्यताएँ, जैसे हड़प्पा, जल प्रबंधन में निपुण थीं, जिनके पास परिष्कृत जल निकासी प्रणालियाँ और जलाशय थे जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते थे। फिर भी, 21वीं सदी में, भारत एक आधुनिक बाढ़ संकट का सामना कर रहा है, जो जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण और अपर्याप्त आपदा प्रबंधन के कारण और गंभीर हो गया है। यह लेख प्राचीन सामंजस्य से वर्तमान बाढ़ संकट तक के बदलाव की पड़ताल करता है, इसके कारणों, प्रभावों और लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक तत्काल शमन रणनीतियों पर प्रकाश डालता है।

प्राचीन सामंजस्य: प्रारंभिक भारत में जल प्रबंधन

सिंधु घाटी सभ्यता (2600–1900 ईसा पूर्व) ने जल प्रबंधन में उल्लेखनीय कौशल दिखाया। धोलावीरा जैसे पुरातात्विक स्थलों से मिले साक्ष्य जटिल वर्षा जल संचयन प्रणालियों, जलाशयों और शहरी जल निकासी नेटवर्क को दर्शाते हैं, जो मौसमी बाढ़ और सूखे को प्रबंधित करने के लिए डिज़ाइन किए गए थे। इसी तरह, अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों में जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए तटबंधों और नहरों के निर्माण की नीतियों का विवरण मिलता है। ये प्रणालियाँ मानसून की लय के गहन समझ को दर्शाती थीं, जो प्राकृतिक परिवर्तनशीलता के खिलाफ लचीलापन सुनिश्चित करती थीं।

दक्षिण भारत में, चोल वंश (9वीं–13वीं शताब्दी) ने व्यापक सिंचाई नेटवर्क बनाए, जैसे कि कल्लनई बांध, जो न केवल बाढ़ को रोकता था बल्कि कृषि को भी समर्थन देता था। इन ऐतिहासिक प्रथाओं में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व को प्राथमिकता दी गई थी, जिसमें बाढ़ नियंत्रण और जल संरक्षण के बीच संतुलन बनाया गया था।

आधुनिक बाढ़ संकट

आज, भारत विश्व के सबसे बाढ़-प्रवण देशों में से एक है, जहाँ लगभग 49.15 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ की चपेट में है। मानसून, जो भारत की वार्षिक वर्षा का 75% लाता है, अक्सर असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में विनाशकारी बाढ़ का कारण बनता है। हाल की घटनाएँ, जैसे जुलाई 2023 की उत्तर भारत बाढ़, जिसमें 105 से अधिक लोग मारे गए और हजारों विस्थापित हुए, इस संकट की बढ़ती गंभीरता को रेखांकित करती हैं।

संकट के प्रमुख कारण :

जलवायु परिवर्तन: वैश्विक तापमान में वृद्धि ने मानसून की वर्षा को तीव्र किया और चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति को बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, 2023 की उत्तर भारत ब Synapse MLाड़ एक मानसून उछाल और पश्चिमी विक्षोभ के संयोजन से जुड़ी थी, जिसके परिणामस्वरूप अभूतपूर्व वर्षा हुई। जलवायु परिवर्तन ने मानसून के पैटर्न को भी बदल दिया है, जिसमें मई में प्री-मानसून तूफानों ने 2025 में असम में महत्वपूर्ण बाढ़ का कारण बना।

अनियोजित शहरीकरण: तेजी से शहरी विस्तार ने बुनियादी ढांचे के विकास को पीछे छोड़ दिया है, जिससे बाढ़ की संवेदनशीलता बढ़ गई है। 1985 से 2015 के बीच, उच्च बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्र 102% बढ़े, जबकि सुरक्षित क्षेत्रों में 82% की वृद्धि हुई। मुंबई जैसे शहरों में, जल निकायों पर अतिक्रमण और अपर्याप्त जल निकासी प्रणालियों ने शहरी बाढ़ को बढ़ाया, जैसा कि 2025 के मानसून में देखा गया।

खराब बुनियादी ढांचा और बांध प्रबंधन: अप्रभावी बांध प्रबंधन ने बाढ़ के प्रभाव को और खराब किया है। 2018 की केरल बाढ़ आंशिक रूप से खराब जलाशय प्रबंधन के लिए जिम्मेदार थी, जिसमें बांध बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने में विफल रहे। इसी तरह, 2025 में रंगनदी जलविद्युत परियोजना से अचानक पानी छोड़े जाने से असम में व्यापक बाढ़ आई, जिसने समुदायों को अप्रस्तुत पकड़ा।

वनों की कटाई और भूमि उपयोग में परिवर्तन: वनों की कटाई और असंतुलित खनन मिट्टी की जल धारण क्षमता को कम करते हैं, जिससे अपवाह और बाढ़ का जोखिम बढ़ता है। ये मानव-प्रेरित कारक प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को बढ़ाते हैं।

बाढ़ के प्रभाव

बाढ़ भारत में व्यापक विनाश का कारण बनती है:

मानवीय नुकसान: भारत वैश्विक बाढ़-संबंधी मौतों का पांचवां हिस्सा वहन करता है। 2025 की असम बाढ़ ने 500,000 से अधिक लोगों को प्रभावित किया, जिसमें महत्वपूर्ण जनहानि और विस्थापन हुआ।

आर्थिक नुकसान: शहरी बाढ़ से प्रतिवर्ष 4 बिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान होता है, और 2070 तक 14–30 बिलियन डॉलर का अनुमान है। असम में 2025 में 12,610.27 हेक्टेयर फसलों का विनाश जैसे कृषि नुकसान अर्थव्यवस्था पर और दबाव डालते हैं।

पर्यावरणीय क्षति: बाढ़ मिट्टी के कटाव, तलछट जमाव और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण का कारण बनती है, जो जैव विविधता और कृषि उत्पादकता को प्रभावित करती है।

शमन और प्रबंधन रणनीतियाँ

भारत के बाढ़ संकट को संबोधित करने के लिए एक व्यापक और एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है। निम्नलिखित रणनीतियाँ, हाल के विश्लेषणों से ली गईं, लचीलापन बढ़ा सकती हैं:

बेहतर प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने डॉपलर रडार और उपग्रह चित्रों का उपयोग करके बाढ़ पूर्वानुमान को उन्नत किया है। वर्षा, मिट्टी की नमी और नदी के स्तर पर वास्तविक समय डेटा तैयारियों को बेहतर बना सकता है, जैसा कि ओडिशा के सफल चक्रवात प्रबंधन में देखा गया है।

संरचनात्मक उपाय: यद्यपि तटबंध और जलाशय सामान्य हैं, लेकिन अभूतपूर्व बाढ़ के खिलाफ उनकी प्रभावशीलता सीमित है। चरम घटनाओं का सामना करने के लिए बुनियादी ढांचे को उन्नत करना और बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में भूमि-उपयोग नियमों को लागू करना महत्वपूर्ण है।

गैरसंरचनात्मक उपाय: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसे बाढ़ बीमा योजनाएँ आर्थिक बोझ को कम कर सकती हैं, जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा जागरूकता अभियान समुदाय की लचीलापन को बढ़ावा देते हैं।

पारिस्थितिकी आधारित समाधान: वनों की पुनर्स्थापना और आर्द्रभूमि पुनर्जनन जल अवशोषण को बढ़ा सकते हैं और अपवाह को कम कर सकते हैं। विश्व बैंक का EPIC Response ढांचा, जिसे असम में पायलट किया गया, बाढ़ और सूखे के जोखिमों को संतुलित करने के लिए एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन पर जोर देता है।

नीति और शासन: आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम 2024 भारत की प्रतिक्रिया क्षमताओं को मजबूत करता है, लेकिन दीर्घकालिक जोखिम शमन में कमियों को उजागर करता है। बाध्यकारी वित्तीय आवंटन और एजेंसियों के बीच वैधानिक डेटा-साझाकरण इन कमियों को दूर कर सकते हैं।

बाढ़ भारत के भविष्य को परिभाषित करे

भारत का प्राचीन जल प्रबंधन से आधुनिक बाढ़ संकट तक का सफर प्राकृतिक और मानव-प्रेरित कारकों के परस्पर क्रिया को दर्शाता है। जहाँ ऐतिहासिक प्रणालियाँ प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाती थीं, वहीं आज की चुनौतियाँ प्रौद्योगिकी, नीति और सामुदायिक सहभागिता को एकीकृत करने वाले नवीन समाधानों की मांग करती हैं। अतीत की सफलताओं से सीखकर और वर्तमान की कमियों को संबोधित करके, भारत एक लचीला भविष्य बना सकता है जहाँ सुरक्षा सर्वोपरि हो। जोखिम निवारण, शमन और प्रबंधन मंच आपदा प्रबंधन को सक्रिय जोखिम न्यूनीकरण में बदलने के लिए तत्काल कार्रवाई का आह्वान करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि बाढ़ भारत के भविष्य को परिभाषित न करे।

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संदर्भ: उद्धृत स्रोतों में विश्व बैंक की रिपोर्ट, डाउन टू अर्थ, द हिंदू बिजनेसलाइन, और भारत में बाढ़ प्रबंधन पर शैक्षणिक अध्ययन शामिल हैं।

 

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