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*गढ़*गढ़ देवा* की यादें —-!

 

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा
सन 1960-61 में, मैं 11वें दर्जे में पढ़ रहा था तो, उस जमाने में पौड़ी जनपद के अंतर्गत सभी विद्यालयों के लिए एक जिला स्तरीय सांस्कृतिक और खेल कूद प्रतियोगिता का आयोजन इन्हीं सितंबर-अक्टूबर के महिनों में होता था, यह खेल उत्सव “गढ़देवा* के नाम से प्रसिद्ध था। उस साल यह आयोजन जयहरीखाल, लैंसडौन में संपन्न हुआ था। मैं अपने विद्यालय GIC, रुद्रप्रयाग की वाद-विवाद प्रतियोगिता की टीम में शामिल था। हमारी टीम ने वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान तो प्राप्त किया ही, साथ ही व्यक्तिगत प्रतिभागियों में मुझे सर्वश्रेष्ठ स्थान भी मिला था और पुरस्कार में एक शील्ड भी प्रदान की गई थी -जब एक बार १९८२ -८३ में सरकारी दौरे पर मेरा रुद्रप्रयाग जाना हुआ था, तो मेरा मन किया कि यहां आया हूं तो, अपना कॉलेज भी देख आऊं l -मुझे ख़ुशी हुई जब मैंने प्रधानाचार्य जी के कक्ष में वही शील्ड प्रदर्शित देखी जिसमें मेरा नाम अंकित था और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा की मेरिट सूची में भी मेरा नाम सबसे ऊपर दर्ज था –खैर यह प्रसंग मैने बीच में ऐसे ही आपके ध्यानाकर्षण के लिए घुसा दिया – वापस लौटते हैं गढ़देवा के प्रसंग पर –
वाद विवाद प्रतियोगिता का topic था –
” क्या प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था आदर्श शासन व्यवस्था है?” मैंने इस विषय के पक्ष में बोला था। डिबेट की तैयारी मेरे अपने चाचा जी स्व० सुंदरलाल जी बहुगुणा के निर्देशन में हुई थी ,जो उस समय कालेज में इतिहास के प्राध्यापक नियुक्त थे। इस प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ पंत जी , GIC श्रीनगर के प्रधानाचार्य श्रीवास्तव साहब और कर्णप्रयाग के हिंदी प्राध्यापक थे ।
इस बहस में मैने ये उदाहरण दिए थे –
“बड अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब सुनआवा॥
नहिं कोउ अस जनमेहु जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।
फिर तानाशाही के विरोध में एक टिप्पणी यह भी जोड़ी थी कि
“Power corrupts and absolute power corrupts absolutely “.
आगे मैंने राजतंत्रीय व्यवस्था पर अपनी टिहरी रियासत का जिक्र किया जहाँ किसी होनहार विद्यार्थी को आगे की पढ़ाई करने के लिए हतोत्साहित कर उसको छोटी मोटी नौकरी का लालच देते थे -बहुसंख्य जनता अनपढ़ थी –आखिरी उद्धरण जर्मन के तानाशाह हिटलर के प्रोपेगंडा मिनिस्टर Joseph Goebbels का था जब उसने लोकतंत्र का यह कहते हुए मजाक उड़ाया था कि :”लोकतन्त्र के बारे में यह स्थाई मजाक हमेशा नया रहेगा कि वही अपने शत्रु तानाशाह को शासन करने का मौका देता है , जिसने उसको ही नष्ट करने का काम किया।”
…. इस वक्तव्य पर मैने खूब तालियां बटोरी । DIOS साहब ने अपनी कुर्सी से उठकर मेरा कंधा थपथपाया “शाबास बेटा “….*
GPB देवा* की यादें-

 

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा
सन 1960-61 में, मैं 11वें दर्जे में पढ़ रहा था तो, उस जमाने में पौड़ी जनपद के अंतर्गत सभी विद्यालयों के लिए एक जिला स्तरीय सांस्कृतिक और खेल कूद प्रतियोगिता का आयोजन इन्हीं सितंबर-अक्टूबर के महिनों में होता था, यह खेल उत्सव “गढ़देवा* के नाम से प्रसिद्ध था। उस साल यह आयोजन जयहरीखाल, लैंसडौन में संपन्न हुआ था। मैं अपने विद्यालय GIC, रुद्रप्रयाग की वाद-विवाद प्रतियोगिता की टीम में शामिल था। हमारी टीम ने वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान तो प्राप्त किया ही, साथ ही व्यक्तिगत प्रतिभागियों में मुझे सर्वश्रेष्ठ स्थान भी मिला था और पुरस्कार में एक शील्ड भी प्रदान की गई थी -जब एक बार १९८२ -८३ में सरकारी दौरे पर मेरा रुद्रप्रयाग जाना हुआ था, तो मेरा मन किया कि यहां आया हूं तो, अपना कॉलेज भी देख आऊं l -मुझे ख़ुशी हुई जब मैंने प्रधानाचार्य जी के कक्ष में वही शील्ड प्रदर्शित देखी जिसमें मेरा नाम अंकित था और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा की मेरिट सूची में भी मेरा नाम सबसे ऊपर दर्ज था –खैर यह प्रसंग मैने बीच में ऐसे ही आपके ध्यानाकर्षण के लिए घुसा दिया – वापस लौटते हैं गढ़देवा के प्रसंग पर –
वाद विवाद प्रतियोगिता का topic था –
” क्या प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था आदर्श शासन व्यवस्था है?” मैंने इस विषय के पक्ष में बोला था। डिबेट की तैयारी मेरे अपने चाचा जी स्व० सुंदरलाल जी बहुगुणा के निर्देशन में हुई थी ,जो उस समय कालेज में इतिहास के प्राध्यापक नियुक्त थे। इस प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ पंत जी , GIC श्रीनगर के प्रधानाचार्य श्रीवास्तव साहब और कर्णप्रयाग के हिंदी प्राध्यापक थे ।
इस बहस में मैने ये उदाहरण दिए थे –
“बड अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब सुनआवा॥
नहिं कोउ अस जनमेहु जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।
फिर तानाशाही के विरोध में एक टिप्पणी यह भी जोड़ी थी कि
“Power corrupts and absolute power corrupts absolutely “.
आगे मैंने राजतंत्रीय व्यवस्था पर अपनी टिहरी रियासत का जिक्र किया जहाँ किसी होनहार विद्यार्थी को आगे की पढ़ाई करने के लिए हतोत्साहित कर उसको छोटी मोटी नौकरी का लालच देते थे -बहुसंख्य जनता अनपढ़ थी –आखिरी उद्धरण जर्मन के तानाशाह हिटलर के प्रोपेगंडा मिनिस्टर Joseph Goebbels का था जब उसने लोकतंत्र का यह कहते हुए मजाक उड़ाया था कि :”लोकतन्त्र के बारे में यह स्थाई मजाक हमेशा नया रहेगा कि वही अपने शत्रु तानाशाह को शासन करने का मौका देता है , जिसने उसको ही नष्ट करने का काम किया।”
…. इस वक्तव्य पर मैने खूब तालियां बटोरी । DIOS साहब ने अपनी कुर्सी से उठकर मेरा कंधा थपथपाया “शाबास बेटा “….*
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