धामी जी! बहुत देर कर दी हजूर आते-आते…
-दिनेश शास्त्री-
उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) द्वारा 21 सितम्बर को कराई गई स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा में नकल और पेपर लीक के आरोपों ने राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आंदोलनरत युवाओं के दबाव में आखिरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सीबीआई जांच की घोषणा कर दी। हालांकि यह घोषणा आठ दिन बाद आई, जब तक सरकार की छवि को गहरा आघात पहुंच चुका था।
इन आठ दिनों में सरकार, आयोग और पुलिस बार-बार तर्क गढ़ते रहे—कभी कहा गया कि नकल हुई ही नहीं, कभी इसे महज़ एक अभ्यर्थी तक सीमित बताया गया और कभी यह दलील दी गई कि पेपर लीक नहीं हुआ, सिर्फ तीन पेज बाहर आए। लेकिन ये तर्क जनता के गले नहीं उतरे। आनन-फानन में एसआईटी गठित भी की गई, पर उसकी दिशा शुरू से ही संदिग्ध रही।
दरअसल, युवाओं का गुस्सा केवल परीक्षा में धांधली पर नहीं था, बल्कि अपने सपनों के टूटने पर भी था। देहरादून, हल्द्वानी और अन्य स्थानों पर आंदोलन ने तेजी पकड़ी, तो सरकार को भी अहसास हुआ कि मामला हाथ से निकल रहा है। हल्द्वानी में भूख हड़ताल पर बैठे भूपेंद्र कोरंगा को मनाने की सीएम की कोशिश नाकाम रही। अंततः परेड ग्राउंड, देहरादून में आंदोलनरत युवाओं के बीच जाकर मुख्यमंत्री ने सीबीआई जांच की घोषणा की, लेकिन तब तक उनकी धवल छवि पर धब्बा लग चुका था।
कहा जाता है कि किसी भी सरकार की ताकत उसके फैसलों की तात्कालिकता और पारदर्शिता में होती है। यदि सीएम ने आंदोलन के दूसरे या तीसरे दिन ही जांच की घोषणा कर दी होती, तो यह एक मिसाल बन जाती और उनकी छवि और मजबूत होती। लेकिन सलाहकारों की गलत सलाह और मीडिया मैनेजमेंट की कमजोरियों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया।
रामचरित मानस में तुलसीदास का यह सूत्रवाक्य आज भी सामयिक लगता है—
“सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस,
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥”
यानी, यदि सचिव, वैद्य और गुरु भय या लाभ की आशंका से ही बात करें, तो राज, धर्म और तन तीनों का शीघ्र नाश निश्चित है।
धामी सरकार को यह बात समझनी होगी। इस परीक्षा कांड में जिस तरह से बार-बार फैसलों में देरी हुई, उससे सरकार की फजीहत हुई। यहां तक कि अपनी ही बनाई एसआईटी के चेयरमैन पूर्व जस्टिस वर्मा को बदलकर जस्टिस ध्यानी को जिम्मेदारी सौंपनी पड़ी। यह कदम भी मजबूरी से उठाया गया और इससे सरकार की विश्वसनीयता और कमजोर हुई।
जनता अब सीबीआई जांच से उम्मीद लगाए बैठी है, हालांकि एजेंसी का रिकॉर्ड बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं रहा है। लेकिन यह भरोसा तो है कि सीबीआई दूध का दूध और पानी का पानी कर सकती है। दुर्भाग्य से राज्य की अपनी जांच एजेंसियां ऐसा विश्वास अर्जित नहीं कर पाई हैं।
पिथौरागढ़ की नन्हीं परी और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मामलों में न्याय न मिल पाने से लोगों का भरोसा पहले ही डगमगाया हुआ है। यह भरोसा बहाल करना आसान नहीं होगा।
मुख्यमंत्री धामी के बारे में आम धारणा है कि वे भले और ईमानदार व्यक्ति हैं, लेकिन उनके आसपास बैठे लोग उन्हें गलत सलाह देकर उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अब समय है कि वे ऐसे लोगों की पहचान करें और उन्हें किनारे करें। क्योंकि 2027 के चुनावों तक कोई भी गलती सरकार को भारी पड़ सकती है।
सीबीआई जांच से युवाओं को कितना न्याय मिलेगा, यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन धामी के लिए यह आखिरी मौका है कि वे लोगों का भरोसा वापस अर्जित करें।
