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भारत में बढ़ रही मधुमेह और मोटापे की बढ़ती महामारी

The ICMR-INDIAB study, published in Nature Medicine on September 30, 2025, reveals India’s carb-dominated diets as a key driver of surging diabetes and obesity. Drawing from 15 years of data on 121,000+ adults across 36 states, it shows 62% of calories from low-quality carbs like white rice, refined grains, and added sugars—far exceeding global norms. This fuels 15-30% higher risks of type 2 diabetes, prediabetes, general obesity, and abdominal obesity. Protein intake remains low, while saturated fats rise. Regional variations highlight rice-heavy South/East vs. wheat-based North. Urgent dietary shifts to whole grains and proteins are recommended to curb the epidemic.–JSR

जयसिंह रावत –

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के ताज़ा आईसीएमआर-इंडियाब अध्ययन ने भारत में मधुमेह और मोटापे के तेज़ी से बढ़ते मामलों के पीछे खानपान की अस्वास्थ्यकर आदतों को मुख्य कारण बताया है। नेचर मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, भारतीय आहार में कार्बोहाइड्रेट (62 प्रतिशत ऊर्जा) का अत्यधिक प्रभुत्व और प्रोटीन की कमी (केवल 12 प्रतिशत) चयापचय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह “मधुमेह महामारी” और गहरी हो सकती है, लेकिन आहार में छोटे-छोटे बदलाव लाकर इसे रोका जा सकता है।

आईसीएमआर-इंडियाब अध्ययन, जो 15 वर्षों में देशभर के 1,13,043 वयस्कों पर आधारित है, से पता चला कि भारतीय भोजन मुख्यतः चावल, गेहूं और चीनी पर टिका है। दक्षिण, पूर्व और उत्तर-पूर्वी भारत में सफेद चावल प्रमुख है, जबकि उत्तर और मध्य भारत गेहूं की रोटी पर निर्भर हैं। अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. आर.एम. अंजना, अध्यक्ष, मद्रास मधुमेह अनुसंधान संस्थान (एमडीआरएफ),  के अनुसार, “हमारे निष्कर्ष साफ बताते हैं कि सफेद चावल या गेहूं के आटे से बने भोजन पर आधारित कार्बोहाइड्रेट-प्रधान आहार लाखों लोगों को जोखिम में डाल रहा है। सिर्फ चावल की जगह गेहूं या बाजरा लेना पर्याप्त नहीं है; ज़रूरी है कि कुल कार्बोहाइड्रेट घटाए जाएं और पौधों अथवा दुग्ध-प्रोटीन से ऊर्जा की मात्रा बढ़ाई जाए।”

अध्ययन में सामने आया कि 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अतिरिक्त चीनी का सेवन राष्ट्रीय सिफ़ारिश (कुल ऊर्जा का 5 प्रतिशत से कम) से कहीं अधिक है, जो मधुमेह, पूर्व-मधुमेह और मोटापे को बढ़ा रहा है। प्रोटीन का औसत सेवन केवल 12 प्रतिशत पाया गया, जबकि उत्तर-पूर्व में यह थोड़ा अधिक (14 प्रतिशत) है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यह आहार पैटर्न चुपचाप “बीमारियों का समय बम” बनता जा रहा है।

पिछले आँकड़ों से तुलना करें तो आईसीएमआर के पहले के सर्वेक्षणों में मधुमेह की दर 9.3 प्रतिशत थी, लेकिन इंडियाब अध्ययन के अनुसार अब यह 11.4 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। इसके साथ ही 13.6 करोड़ लोग पूर्व-मधुमेह की स्थिति में हैं। चिंताजनक यह है कि यह समस्या अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेज़ी से फैल रही है, जहाँ वृद्धि दर शहरों से दोगुनी है।

समस्या समाधान के लिए विशेषज्ञों ने बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण की मांग की है, जिसमें स्वास्थ्य, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और कल्याण मंत्रालयों की संयुक्त भूमिका हो। खाद्य सब्सिडी में बदलाव और जन-जागरूकता अभियान तेज़ करने की सिफ़ारिश की गई है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि  “यह अध्ययन भारत की स्वास्थ्य नीति के लिए एक मील का पत्थर है। 2025 तक मधुमेह को रोकने का लक्ष्य अब आहार सुधार पर केंद्रित होगा।” चिकित्सकों ने लोगों को सलाह दी है कि वे दालें, अंडे, दुग्ध उत्पाद और मेवे अपने भोजन में शामिल करें तथा नियमित व्यायाम को जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।

यह अध्ययन न केवल समस्या को उजागर करता है, बल्कि समाधान का रास्ता भी सुझाता है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2030 तक मधुमेह के रोगियों की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो सकती है। आईसीएमआर ने सभी राज्यों से आहार शिक्षा कार्यक्रमों को मज़बूत करने का आह्वान किया है।

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