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प्राकृत भाषा में शोध की असीम संभावनाएं : प्रो. जय कुमार

 

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र एवम् सेंटर फॉर जैन स्टडीज के संयुक्त
तत्वावधान में गोलमेज संवाद

मुरादाबाद, 9 अक्टूबर : प्राकृत भाषा में शोध की अपार संभावनाओं को रेखांकित करते हुए बाहुबली प्राकृत विद्यापीठ, कर्नाटक के पूर्व निदेशक प्रो. जय कुमार एन. उपाध्याय ने कहा कि प्राचीनतम उपलब्ध सामग्री अर्धमागधी और मध्य-इंडो आर्य भाषा में लिखे गए प्रामाणिक जैन आगमों में निहित है। ये ग्रंथ जैन मुनियों द्वारा लिखित विभिन्न टीकाओं के साथ-साथ संस्कृत और महाराष्ट्री प्राकृत जैसी भाषाओं में रचित रचनाओं का समृद्ध भंडार हैं। प्रो. जय तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (टीएमयू), मुरादाबाद में भारतीय ज्ञान परंपरा में जैन धर्म के योगदान पर आयोजित गोलमेज संवाद में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. जय कुमार ने पंडित रवि शंकर के राग अहिर भैरवी के मंगलाचरण के साथ की। यह आयोजन टीएमयू के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र (आईकेएस) और सेंटर फॉर जैन स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। कार्यक्रम का संचालन आईकेएस केंद्र की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने किया, जबकि अंत में मुख्य वक्ता को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

प्राकृत भाषा और जैन ग्रंथों की महत्ता प्रो. उपाध्याय ने प्राकृत भाषा की पहचान, उसकी सभ्यता, संस्कृत से संबंध, और भद्रबाहु संहिता व आचार्य कुंदकुंद जैसे प्रमुख जैन ग्रंथों की भारतीय परंपरा में भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने जैन शोधार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए प्राकृत भाषा में उपलब्ध जैन ग्रंथों के संकलन और इस क्षेत्र में चल रहे प्रयासों की वर्तमान स्थिति पर गहन चर्चा की।

टीएमयू में जैन दर्शन की प्रासंगिकता टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और प्रसार में जैन दर्शन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन ने भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र के महत्व को रेखांकित किया। टिमिट-बीटीसी की प्रिंसिपल डॉ. कल्पना जैन ने टीएमयू में जैन अध्ययन की स्थापना और उसकी बढ़ती प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग की सीनियर फैकल्टी डॉ. रवि जैन ने जैन ज्ञान परंपरा के विकास पर जोर दिया। चीफ वॉर्डन श्री विपिन कुमार जैन ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

55 शोधार्थियों की भागीदारी गोलमेज संवाद में 55 जैन शोधार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिससे यह आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा और जैन दर्शन के अध्ययन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण साबित हुआ। यह कार्यक्रम न केवल प्राकृत भाषा के शोध को प्रोत्साहित करने में सहायक रहा, बल्कि जैन दर्शन की समृद्ध विरासत को आधुनिक संदर्भ में समझने का भी अवसर प्रदान किया।

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