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चिकित्सा का नोबेल: शरीर की ‘ब्रेक प्रणाली’ की खोज को सम्मान

 

-डा0 विनीता बल

-डा0 सत्यजीत रथ

हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) जितनी अद्भुत है, कभी-कभी उतनी ही खतरनाक भी साबित हो सकती है। कई बार ऐसा होता है कि यह प्रणाली बाहरी रोगाणुओं से रक्षा करने के बजाय खुद शरीर पर हमला करने लगती है। इस स्थिति को स्व-प्रतिरक्षी विकार (Autoimmune Disorder) कहा जाता है।

इससे यह स्पष्ट हुआ कि शरीर की प्रणाली में कुछ ऐसे तंत्र मौजूद होने चाहिए जो अनावश्यक या हानिकारक गतिविधियों को रोक सकें। इन्हीं तंत्रों की खोज करने वाले तीन वैज्ञानिकों को 2025 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है।

यह शोध 1990 के दशक के मध्य में शुरू हुआ, जब शिमोन सकागुची (Shimon Sakaguchi) और फियोना पॉवरी (Fiona Powrie) ने कुछ खास अवलोकन किए। टी लिम्फोसाइट्स (T lymphocytes) यानी टी कोशिकाएं शरीर की रोगप्रतिरोधक प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे ट्यूमर नष्ट करने और संक्रमण से लड़ने में सहायक होती हैं। लेकिन सकागुची और पॉवरी ने पाया कि जब टी लिम्फोसाइट्स के एक विशेष समूह को हटा दिया गया, तो शरीर में स्व-प्रतिरक्षी रोग विकसित हो गए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि टी कोशिकाओं में एक “नियामक” या “सप्रेसिव” (Regulatory) कार्य भी होता है।

कुछ वर्ष बाद, मैरी ब्रंकॉव (Mary Brunkow) और फ्रेड रैम्सडेल (Fred Ramsdell) ने यह सिद्ध किया कि एक आनुवंशिक (genetic) उत्पत्ति वाले स्व-प्रतिरक्षी रोग का कारण Foxp3 नामक जीन में उत्परिवर्तन (mutation) है। यह जीन मनुष्य और चूहे दोनों में पाया गया।

सकागुची ने इस क्षेत्र के एक अन्य प्रमुख वैज्ञानिक एलेक्ज़ेंडर रुडेंस्की (Alexander Rudensky) के साथ मिलकर इस पर और शोध किया और 2003 में यह सिद्ध किया कि Foxp3 जीन नियामक टी कोशिकाओं (Regulatory T Cells) के विकास और कार्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। Foxp3 एक ऐसे प्रोटीन को कोड करता है जो नियामक टी कोशिकाओं के लिए आवश्यक जीन को सक्रिय करता है। इस प्रोटीन के बिना ये कोशिकाएं या तो विकसित नहीं होतीं या फिर शरीर में हानिकारक प्रतिरक्षा गतिविधियों को रोकने में विफल रहती हैं।

इन वैज्ञानिकों ने मिलकर यह पाया कि शरीर में ऐसे तंत्र मौजूद हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली को अनियंत्रित होने से रोकते हैं। टी कोशिकाएं इस नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं—वे शरीर की “ब्रेक” प्रणाली की तरह काम करती हैं, जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को समय रहते रोक देती हैं ताकि शरीर के ऊतकों को क्षति न पहुंचे।

इस खोज के चलते दो प्रमुख क्षेत्रों में जीवन रक्षक उपचारों के रास्ते खुले हैं। स्व-प्रतिरक्षी रोगों, जैसे टाइप-1 डायबिटीज़ (Type-1 Diabetes) में वैज्ञानिक अब इस ब्रेक प्रणाली को सक्रिय करने के तरीके तलाश रहे हैं ताकि प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित रखा जा सके। वहीं कैंसर के उपचार में प्रयास किया जा रहा है कि टी कोशिकाओं की ब्रेक प्रणाली को कुछ समय के लिए हटाया जा सके, ताकि प्रतिरक्षा प्रणाली कैंसर कोशिकाओं पर पूरी तरह से हमला कर सके।

ब्रंकॉव, रैम्सडेल और सकागुची द्वारा किए गए इन आधारभूत शोधों की बदौलत आज, दो दशक बाद, हम ऐसे उपचारों के बारे में सोच सकते हैं जो कभी असंभव लगते थे।

इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि नोबेल समिति ने इस वर्ष इस त्रयी को सम्मानित करने का निर्णय लिया। उन्होंने उस प्रक्रिया की खोज की जो प्रकृति में संतुलन (homeostasis) बनाए रखने की सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली है—शरीर की “परफेक्ट ब्रेक” प्रणाली।

(लेखक राष्ट्रीय इम्यूनोलॉजी संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक हैं।)

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