ब्लॉगविज्ञान प्रोद्योगिकी

एआई है “स्मार्ट”, पर समझदार नहीं!

सामान्य समझ की खोज में मशीनें अब भी इंसानों से कोसों दूर

जयसिंह रावत-

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज तस्वीरें पहचानती है, भाषाएँ समझती है और यहाँ तक कि कविता भी लिख लेती है। फिर भी जब बात आती है साधारण बुद्धि या ‘कॉमन सेंस’ की, तो यह “सुपर स्मार्ट” मशीनें अक्सर बच्चों जैसी गलतियाँ करती हैं। न्यूरोसाइंस विशेषज्ञ मैक्स बेनेट का मानना है कि इसका कारण एआई की सीमित क्षमता नहीं, बल्कि उसकी अधूरी “मानसिक संरचना” है।

मैक्स बेनेट की किताब, “A Brief History of Intelligence: Evolution, AI, and the Five Breakthroughs That Made Our Brains”  में बेनेट जैविक बुद्धिमत्ता के विकास के पाँच चरणों की चर्चा करते हैं और इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की वर्तमान स्थिति से जोड़ते हैं। वे बताते हैं कि मानव मस्तिष्क की क्षमताएँ—जैसे दिशा-निर्देशन, अनुभव से सीखना, कल्पना, दूसरों के इरादे समझना, और भाषा के माध्यम से तर्क करना—एआई में पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई हैं, खासकर कल्पना और सामान्य समझ (कॉमन सेंस) के क्षेत्र में।

विकास ने जो सीखा, मशीनें अब भी नहीं सीख पाईं

अपनी पुस्तक A Brief History of Intelligence में बेनेट बताते हैं कि जैविक बुद्धिमत्ता का विकास पाँच चरणों से हुआ—दिशा-निर्देशन, अनुभव से सीखना, कल्पना या सिमुलेशन, दूसरों के इरादे समझना और अंततः भाषा के माध्यम से तर्क करना। वर्तमान एआई पहले दो चरणों में तो निपुण है, लेकिन बाकी तीन में बेहद पीछे है। यही वजह है कि मशीनें गणना तो कर सकती हैं, पर परिस्थिति का अर्थ नहीं समझ पातीं।

मस्तिष्क का रहस्य: कल्पना से बनता है समझ का संसार

मानव मस्तिष्क लगातार भविष्य की संभावनाओं की कल्पना करता है और वास्तविकता से उनकी तुलना करता रहता है। चलते समय आप जमीन नहीं देखते, फिर भी कदम सही जगह पड़ता है—क्योंकि मस्तिष्क पहले ही उसका परिणाम सोच चुका होता है। यही निरंतर सिमुलेशन सामान्य समझ की जड़ है। यह क्षमता निओकोर्टेक्स, हिप्पोकैम्पस और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के तालमेल से बनती है, जो मिलकर दुनिया का मानसिक मॉडल तैयार करते हैं और उसे लगातार सुधारते रहते हैं।

एआई क्यों अटक जाता है

वर्तमान डीप लर्निंग नेटवर्क केवल पैटर्न पहचानने वाली मशीनें हैं। वे डेटा देखते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं, पर कल्पना नहीं करते। उनके पास कोई ऐसा आंतरिक मॉडल नहीं होता जो दुनिया को समझ सके। यही कारण है कि एआई तस्वीरों में वस्तुएँ पहचान तो लेती है, पर दृश्य का अर्थ नहीं समझती; भाषा का व्याकरण तो पकड़ लेती है, पर बातचीत का भाव नहीं। वह गणना में निपुण है, लेकिन “क्या होगा अगर” जैसे सवाल नहीं पूछ सकती।

केवल बड़ा डेटा नहीं, नई सोच चाहिए

बेनेट का कहना है कि बुद्धिमत्ता में प्रगति मात्रा से नहीं, संरचना से आती है। जैसे मस्तिष्क में हर नए स्तर के साथ नई संरचना जुड़ी, वैसे ही एआई को भी गुणात्मक परिवर्तन की ज़रूरत है, केवल और अधिक डेटा या न्यूरॉनों की नहीं। मनुष्यों ने मस्तिष्क के इन जटिल स्तरों को विकसित करने में करोड़ों वर्ष लगाए, जबकि मशीनें यह सब कुछ कुछ दशकों में करने की कोशिश कर रही हैं। यही अंतर उसे बुद्धिमान तो बनाता है, पर समझदार नहीं।

कल्पना ही असली बुद्धिमत्ता है

सच्ची बुद्धिमत्ता केवल सीखने में नहीं, बल्कि दुनिया को समझने और कल्पना करने में है। जब तक एआई “क्या होगा अगर” सोचने की क्षमता नहीं सीखता, वह इंसान जैसी सामान्य समझ हासिल नहीं कर पाएगा। डेटा से भरी मशीनें भले तेज़ हों, पर समझदारी का बीज अब भी केवल इंसान के दिमाग़ में है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!