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बिहार चुनाव 2025 का दूसरा चरण : अपराध और धनबल की गहराती जड़ें

Role of money and muscle power is evident from the fact that all major political parties in Bihar Assembly Elections 2025 Phase II have fielded 33% to 100% candidates who are crorepatis and 19% to 100 % candidates who have declared criminal cases against themselves. This close and alarming nexus between money power and muscle power has got so ingrained in our electoral system that the citizens are left hostage to the current situation.  Money and muscle power hurt the principles of ‘free and fair elections’, ‘participatory democracy’ and ‘level playing field’.  The present circumstances therefore demand an extensive deliberation by the voters so that sanctity of elections is not ridiculed by tenacious entry of tainted candidates and candidates with abnormal multiplication of assets.

-BY USHA RAWAT—
बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में लोकतंत्र की पवित्रता पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार दूसरे चरण में मैदान में उतरे 1302 उम्मीदवारों में से 1297 के हलफनामों के विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि 32 प्रतिशत उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, जबकि 43 प्रतिशत करोड़पति हैं। रिपोर्ट साफ़ करती है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बावजूद राजनीतिक दल पुराने तरीकों पर कायम हैं और अपराध तथा धनबल की पकड़ राजनीति पर बनी हुई है।

आपराधिक पृष्ठभूमि: लोकतंत्र पर गंभीर प्रश्न

ADR रिपोर्ट के अनुसार, 1297 उम्मीदवारों में से 415 (32%) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें से 341 (26%) पर हत्या, हत्या के प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आरोप दर्ज हैं। 19 उम्मीदवारों पर हत्या, 79 पर हत्या के प्रयास और 52 उम्मीदवारों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के आरोप हैं, जिनमें 3 पर बलात्कार जैसे जघन्य आरोप शामिल हैं।

राज्य की 122 विधानसभा सीटों में से 73 सीटें ऐसी हैं जिन्हें ‘रेड अलर्ट’ निर्वाचन क्षेत्र घोषित किया गया है। इसका अर्थ है कि इन सीटों पर कम से कम तीन या उससे अधिक उम्मीदवार आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं।

प्रमुख दल उम्मीदवार संख्या आपराधिक मामले (%) गंभीर मामले (%)
जन सुराज पार्टी 117 50% 44%
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) 37 68% 54%
CPI(ML)(L) 6 83% 67%
लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) 15 60% 60%
भाजपा 53 57% 42%
राजद 70 54% 39%
जदयू 44 32% 25%
आम आदमी पार्टी 39 31% 31%
बसपा 91 19% 13%
CPI 4 50% 50%
CPI(M) 1 100% 100%

सुप्रीम कोर्ट के 13 फरवरी 2020 के आदेश में कहा गया था कि राजनीतिक दलों को आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों के चयन का कारण बताना होगा। इसके बावजूद दलों ने “लोकप्रियता”, “सामाजिक सेवा” और “राजनीतिक साजिश” जैसे बहाने देकर इन आदेशों की अनदेखी की। ADR का कहना है कि यह लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है और अपराधियों के लिए सत्ता का रास्ता खुला रखता है।

धनबल का दबदबा और असमानता की तस्वीर

रिपोर्ट के अनुसार, दूसरे चरण के 43 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं। 562 उम्मीदवारों की घोषित संपत्ति करोड़ों में है। औसतन प्रति उम्मीदवार की संपत्ति 3.44 करोड़ रुपये आंकी गई है।

संपत्ति रेंज उम्मीदवार संख्या प्रतिशत
10 करोड़ से अधिक 98 7.6%
5–10 करोड़ 100 7.7%
1–5 करोड़ 364 28.1%
20 लाख–1 करोड़ 374 28.8%
20 लाख से कम 361 27.8%

दलवार आंकड़ों में जदयू 91%, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) 100%, राजद 84% और भाजपा 83% करोड़पति उम्मीदवारों के साथ शीर्ष पर हैं। सबसे अमीर उम्मीदवारों में विकासशील इंसान पार्टी के रण कौशल प्रताप सिंह (लौरिया) 368 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ पहले स्थान पर हैं। उनके बाद राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के नीतीश कुमार (गुरुआ) 250 करोड़ और जदयू की मनोरमा देवी (बेलागंज) 75 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ हैं।

इसके विपरीत, सबसे कम संपत्ति वाले उम्मीदवारों में मूलनिवासी समाज पार्टी के सुरेश राजवंशी (1,100 रुपये) और निर्दलीय पंकज कुमार राम (2,000 रुपये) शामिल हैं।

621 (48%) उम्मीदवारों पर कर्ज है, जिनमें जन सुराज पार्टी के निरज सिंह पर सबसे अधिक 18 करोड़ रुपये की देनदारी दर्ज है।

शिक्षा, आयु और लैंगिक असंतुलन

रिपोर्ट के अनुसार 48 प्रतिशत उम्मीदवार स्नातक या उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, जबकि 41 प्रतिशत ने केवल 5वीं से 12वीं तक की पढ़ाई की है। 9 उम्मीदवार अशिक्षित हैं। आयु वर्ग के लिहाज से 52 प्रतिशत उम्मीदवार 41 से 60 वर्ष की आयु के बीच हैं। वहीं, महिला उम्मीदवारों की संख्या मात्र 133 है, जो कुल का केवल 10 प्रतिशत है।

सुधार की पुकार: ADR की सिफारिशें

ADR ने चुनावी सुधार की दिशा में कई ठोस सुझाव दिए हैं। संस्था का मानना है कि हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में दोषी पाए गए व्यक्तियों को स्थायी रूप से अयोग्य ठहराया जाए। इसके अलावा, 5 वर्ष से अधिक सजा वाले मामलों में चार्जशीट दायर होते ही उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जाए। संगठन ने यह भी सिफारिश की है कि अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने वाली पार्टियों से टैक्स छूट वापस ली जाए और उन्हें सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाया जाए। NOTA (None of the Above) को सशक्त बनाने की भी मांग की गई है ताकि यदि किसी सीट पर NOTA को सर्वाधिक वोट मिलें तो वहां पुनः चुनाव हो और पुराने उम्मीदवार स्वतः अयोग्य माने जाएँ।

 लोकतंत्र की कसौटी पर खरे उतरें मतदाता

बिहार चुनाव 2025 का दूसरा चरण एक बार फिर यह दिखा रहा है कि राजनीति में अपराध और धनबल की पकड़ कितनी गहरी है। जब 19 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले हों और 43 प्रतिशत करोड़पति हों, तब “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव” का सिद्धांत कमजोर पड़ता दिखाई देता है। लोकतंत्र को बचाने के लिए मतदाताओं की जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है — ताकि अपराधी, भ्रष्ट और अत्यधिक धनवान उम्मीदवार जनता की आस्था का दुरुपयोग न कर सकें।

(स्रोत: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एवं बिहार इलेक्शन वॉच रिपोर्ट, 2025)

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