ब्लॉग

रजत जयंती पर विशेष ; स्थाई राजधानी को तरसता उत्तराखंड

–अरुण श्रीवास्तव –
बस कुछ ही दिन और उत्तराखंड भी अपनी स्थापना के 25वां वर्ष मना रहा होगा। 25 साल कम नहीं होते नफ़ा नुकसान जानने के लिए। एक समय था जब 25 साल में दूसरी पीढ़ी भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेती थी। पर… 25 साल में उत्तराखंड में राजधानी अपना अस्तित्व दर्ज नहीं करा पाई। जबकि इसी के आगे-पीछे बिहार और मध्य प्रदेश से अलग होकर झारखंड और छत्तीसगढ़ भी राज्य बना। राज्य गठित बनने के साथ ही सब की तरह इसे भी अपनी विधानसभा मिली, अपना सचिवालय मिला, लोक सेवा आयोग सहित सभी विभागों के निदेशालय मिले। संभवतः इस राज्य ने अपने लिए कुछ कानून भी बनाए हों। कानून बनाए हों या ना बने हो़ यह बात अलग है पर ‘सामान नागरिक संहिता’ तो बना ही ली। अब यह बात अलग है कि अस्तित्व में आने के 25 साल बाद भी इस राज्य ने अपने लिए एक अदद स्थाई राजधानी तक नहीं बना पाई। कहने को तो इस प्रदेश में एक नहीं दो-दो राजधानियां हैं एक अस्तित्व में आने के साथ ही देहरादून में और दूसरी गैण-सैंण में।
25 साल पहले देहरादून अस्थाई राजधानी थी और 25 साल बाद भी अस्थाई राजधानी है कब तक रहेगी यह अतीत के गर्भ में है। इसी के साथ-साथ झारखण्ड और छत्तीसगढ़ भी देश के नक्शे पर राज्य की शक्ल अख्तियार किये। अस्तित्व में आने के साथ ही इन्हें अपनी-अपनी राजधानी मिली। मिली तो उत्तराखंड (तब के उत्तरांचल) को भी पर अस्थाई तौर पर।
अपने देश भारत में अधिकतर राज्य क्षेत्रीय असमानता की वज़ह से बने हालांकि कुछ की वज़हें धार्मिक रहीं। पर उत्तराखंड की परिस्थितियां भौगौलिक रूप से भिन्न रहीं इसलिए अलग राज्य की मांग पिछड़ापन दूर करना रहा। पिछड़ापन कितना दूर हुआ यह अलग बात है यहां बात स्थाई राजधानी को लेकर है। राजधानी का मतलब चौहद्दी मात्र नहीं है। राजधानी वह मुख्य शहर या स्थान होता है जहां अपनी सरकार का मुख्यालय/कार्यालय सभी विभागों के कार्यालय होते हैं। मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रि परिषद होती हैं अपनी विधानसभा अपना सचिवालय व न्यायालय भी होते हैं। इन सब होने के कारण या इसके पीछे की वजह सरकारी कामकाज करवाने में सुविधा हो और नियम कानून को बनाने और लागू करवाने में भी। यह सब अन्य राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी हो रहा है बावजूद इसके हाई कोर्ट और पब्लिक सर्विस कमीशन दो अलग-अलग जगहों पर हैं। अन्य राज्यों की तरह इसके पास स्थाई राजधानी नहीं है। हालांकि ऐसा भी नहीं की किसी सरकार ने स्थाई राजधानी की बात नहीं की यह जनता की आवाज नहीं सुनी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए नारायण दत्त तिवारी ने इस 1988-89 में राजधानी चयन आयोग की बात कही थी और गैण-सैंण का सुझाव भी दिया गया था। अलग राज्य बनने के बाद इसके पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने दीक्षित आयोग का गठन किया था। गैण सैण को स्थाई राजधानी बनाने की बात भी की गई थी।
पहले चुनी हुई सरकार के मुखिया नारायण दत्त तिवारी ने राजधानी का चयन करने के लिए
कुछ कदम उठाए थे
जो कि पर्याप्त नहीं थे। गठन तो अतंरिम सरकार के मुखिया नित्यानंद स्वामी ने भी किया था और उसके बाद भी के मुख्यमंत्रियों ने भी। लेकिन किसी ने भी धरातल पर उतारा नहीं बस दो-चार दिन के लिए ग्रीष्म कालीन सत्र सम्पन्न करा दिया। बावजूद इसके यहां की जनपक्षीय संगठन आए-दिन स्थाई राजधानी के लिए धरना-प्रदर्शन करती रहीं। अपनी आवाज़ ज्ञापन के माध्यम से उचित मंचों पर उठाती रहीं लेकिन आंदोलनकारियों की वज़ह से, बलिदान से पर्वतीय क्षेत्र की जनता को अपना अलग राज्य मिला पर भाजपा और कांग्रेस पार्टियों की सरकारों ने आंदोलनकारियों को हमेशा हांसिए पर डालतीं रहीं इन 25 वर्षों में कांग्रेस से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं रहा भाजपा के पास सत्ता और लंबे समय तक प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी दोनों दलों की सरकार रही लेकिन सबने स्थाई राजधानी को लेकर जनता को छला है। जिस तरह से हर चीज की एक प्रक्रिया होती है इस तरह से राज्य गठन की भी एक प्रक्रिया है। अंतरिम सरकार के बाद चुनी हुई सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वो अस्थाई राजधानी को स्थाई करने के लिए आयोग का गठन करें विधानसभा में इस संबंध में बकायदा प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजें। राज्य बनने के बाद दीक्षित आयोग ने 2008 में सरकार को रिपोर्ट सौंपी जिसमें धरातलीय दृष्टि से स्थाई राजधानी के लिए देहरादून को उपयुक्त माना गया था। 2012 विजय बहुगुणा कि सरकार ने पहाड़ी स्थल गैण सैण में कैबिनेट की बैठक की और विधानसभा भवन के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया न की स्थाई राजधानी के लिए इसी तरह 2014 में हरीश रावत सरकार के दौरान भी विधानसभा सत्र आयोजित हुआ उसके बाद कई मुख्यमंत्रियों के समय में रस्म अदायगी के लिए विधानसभा सत्र बुलाया गया। 2020 में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैण सैण को ‘ग्रीष्म राजधानी’ घोषित किया। पुष्कर धामी की वर्तमान सरकार ने भी राजधानी विकास से जुड़ी कुछ परियोजनाएं चलाईं लेकिन अब तक स्थाई राजधानी का पूर्णरूप से निर्णय किसी भी सरकार ने नहीं लिया जबकि 2025 में राज्य ने केंद्र से ‘विशेष राजधानी’ सहायता प्राप्त की। लेकिन किसी भी सरकार ने संविधानात्मक निर्णय नहीं लिया कि स्थाई राजधानी इसी स्थान पर होगी।
सनद रहे कि, उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने नवंबर 2011 में उत्तर प्रदेश को पांच भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव अपनी विधानसभा में पारित कराकर केंद्र सरकार को भेजा था। उस समय यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल था और मायावती अपने बूते सत्ता में आई थी। उत्तराखंड में भाजपा भी अपने बूते सत्ता में है और कांग्रेस भी थी पर दोनों का उद्देश्य सत्ता में रह कर मलाई चाटना भर है स्थाई राजधानी से कहां बने इसमें दिलचस्पी नहीं।
नौ नवंबर उत्तराखंड का स्थापना दिवस है जिसे वह बड़े ‘इवेंट’ के रूप में मना रहा है। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिये जा रहे हैं। नवंबर के पहले सप्ताह में महामहिम राष्ट्रपति तीन दिन के दौरे पर आईं। नौ नवंबर को पीएम मोदी आ रहे हैं। विधानसभा का विशेष सत्र का भी आयोजन हुआ। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहा है तो विपक्ष खामियों का रोना रो रहा है जो कि होता ही है पार्टियां चाहे सदन के अध्यक्ष के दाहिने वाली हों या बाएं वाली।

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून।
8218070103.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!