पर्यावरणब्लॉग

जहाँ आप एक आकर्षक मछली देखते हैं, वहाँ इंजीनियर ऐलन ट्यूरिंग का गणित देखते हैं

कंप्यूटर मॉडल से वैज्ञानिकों ने बॉक्सफिश की त्वचा पर बनने वाली धारियों, धब्बों और षट्कोणीय आकृतियों का सटीक अनुकरण किया — प्राकृतिक अपूर्णताओं सहित।

-कैटरीना मिलर –

बॉक्सफिश (Boxfish) दशकों से वैज्ञानिकों और समुद्री जीवन के शौकीनों को मंत्रमुग्ध करती आ रही है। अपने डिब्बेनुमा आकार के बावजूद यह आश्चर्यजनक रूप से फुर्तीली तैराक होती है। इसके गोल-मटोल होंठ और चौकोर शरीर पर बनी रंगीन, आकर्षक डिज़ाइन — जैसे पीले रंग पर काले बिंदु या ग्रे पृष्ठभूमि पर नीली धारियाँ — इसे और भी अनोखा बनाते हैं।

कोलोराडो विश्वविद्यालय, बोल्डर के दो इंजीनियर — सियामक मिरफेंदरेस्की और अंकुर गुप्ता — विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया की एक प्रजाति ऑर्नेट बॉक्सफिश (Ornate Boxfish) की त्वचा पर बनी इन अद्भुत आकृतियों से प्रभावित हुए। उन्होंने पाया कि इस मछली की त्वचा पर बनने वाले धब्बों, धारियों और षट्कोणीय पैटर्नों को महान गणितज्ञ ऐलन ट्यूरिंग द्वारा विकसित दशकों पुराने गणितीय सिद्धांतों के माध्यम से समझाया और दोहराया जा सकता है।

इंजीनियरों ने हाल ही में एक नया गणितीय मॉडल प्रस्तुत किया है, जो ऑर्नेट बॉक्सफिश के पैटर्न को वास्तविकता के बेहद करीब दोहरा सकता है — यहाँ तक कि उन प्राकृतिक ‘अपूर्णताओं’ को भी दर्शाता है जो मछली की त्वचा पर स्वाभाविक रूप से दिखाई देती हैं।

डॉ. अंकुर गुप्ता के अनुसार, यह मॉडल (जिसका विवरण हाल ही में Matter नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ) वैज्ञानिकों को यह समझने के एक कदम और करीब ले जाता है कि प्रकृति में ऐसे जटिल पैटर्न मछलियों और अन्य जीवों की त्वचा पर किस तरह बनते हैं।

डॉ. गुप्ता लिखते हैं — “यह अध्ययन गणितीय मॉडलों और जैविक वास्तविकता की अपूर्ण लेकिन सुंदर सच्चाई के बीच की खाई को पाटने में मदद करता है।”
उनका कहना है कि भविष्य में यह ज्ञान कैमोफ्लाज (छलावरण) के लिए जैव-प्रेरित कपड़ों या सॉफ्ट रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में भी नई प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जहाँ मशीनें कठोर धातु की बजाय लचीली सामग्रियों जैसे सिलिकॉन से बनाई जाती हैं।

डॉ. गुप्ता का कार्य 1952 में ऐलन ट्यूरिंग द्वारा प्रकाशित सैद्धांतिक मॉडल का ही विस्तार है। ट्यूरिंग का मॉडल दो प्रक्रियाओं — विसरण (diffusion) और रासायनिक प्रतिक्रिया (chemical reaction) — के पारस्परिक प्रभाव पर आधारित था।
आम तौर पर विसरण का परिणाम किसी पदार्थ का समान रूप से फैल जाना होता है — जैसे यदि आप गर्म पानी में थोड़ी-सी स्याही डालें, तो वह अंततः पूरे पानी में एक समान रंग फैला देगी।
लेकिन ट्यूरिंग ने सिद्ध किया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में, विसरण और रासायनिक प्रतिक्रिया के संयोजन से कण स्वतः ही धारियाँ, बिंदु और अन्य आकृतियाँ बनाने लगते हैं — इन्हें ही ट्यूरिंग पैटर्न्स कहा गया।

ट्यूरिंग के गणितीय सिद्धांतों ने प्रकृति में बनने वाले अनेक पैटर्नों को समझने में मदद की — जैसे तेंदुए के धब्बे, सीपियों के घुमावदार निशान, या यहाँ तक कि मनुष्य की उंगलियों के निशान (fingerprints)। यह सिद्धांत रेत के टीलों की लहरदार आकृतियों से लेकर आकाशगंगाओं में पदार्थ के फैलाव तक, कई प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या में उपयोग किया गया है।

कंप्यूटर सिमुलेशन ने इन विसरण-प्रतिक्रिया प्रक्रियाओं के माध्यम से कई जैविक पैटर्नों की नकल की है, लेकिन डॉ. गुप्ता के अनुसार, ये परिणाम अक्सर बहुत “आदर्श” होते हैं — जिनमें प्रकृति की तरह असमान मोटाई, टूटी हुई रेखाएँ या दानेदार बनावट (graininess) नहीं दिखती।
उनकी टीम द्वारा विकसित सिमुलेशन, जो ऑर्नेट बॉक्सफिश की त्वचा पर रंगद्रव्य कोशिकाओं (pigment cells) के व्यवहार की नकल करता है, प्रारंभ में वास्तविक जीवन की तुलना में धुंधले और कम स्पष्ट पैटर्न बना रहा था।

डॉ. गुप्ता के शब्दों में — “विसरणीय प्रणाली, अपने स्वभाव से ही फैलाव वाली होती है। तो फिर धारियाँ इतनी स्पष्ट कैसे बनती हैं?”

2023 में उनकी टीम के एक छात्र ने यह रहस्य सुलझाया — उसने सिमुलेशन में diffusiophoresis नामक एक नई प्रक्रिया जोड़ी। इसमें कोशिकाएँ द्रव में एक-दूसरे के साथ समूह बनाकर गति करती हैं, जैसे धुलाई के दौरान साबुन के बुलबुले कपड़ों से गंदगी को खींचते हैं।

इस संशोधन से सिमुलेटेड बॉक्सफिश के पैटर्न अधिक तीक्ष्ण और स्पष्ट हो गए। वहीं, सियामक मिरफेंदरेस्की ने मॉडल में कोशिकाओं के आपसी टकराव को शामिल कर, प्राकृतिक अपूर्णताओं को जोड़ा। परिणामस्वरूप बने पैटर्नों में कहीं धारियाँ पतली तो कहीं मोटी थीं, कुछ जगहें टूटी हुई थीं, कुछ षट्कोण अधूरे या उभरे हुए दिखे — ठीक वैसे ही जैसे वास्तविक मछली की त्वचा पर दिखाई देते हैं।

डॉ. गुप्ता के अनुसार, इन अपूर्णताओं को मॉडल के माध्यम से समायोजित (tune) किया जा सकता है, पर यह अभी भी वास्तविकता का एक सरलीकृत संस्करण है, जो कोशिकाओं के जटिल पारस्परिक प्रभावों को पूरी तरह नहीं दर्शा पाता। ट्यूरिंग के मूल मॉडल की तरह इसमें भी रंगद्रव्य उत्पादन जैसे जैविक पहलुओं की पूरी जानकारी शामिल नहीं है।

फिर भी, ट्यूरिंग का यह सिद्धांत वैज्ञानिकों को वास्तविक दुनिया में पैटर्न निर्माण को नियंत्रित करने के लिए एक आधार प्रदान करता है। इसका उपयोग E. coli बैक्टीरिया में कृत्रिम पैटर्न बनाने, zebrafish की धारियों को पुनर्व्यवस्थित करने, अधिक प्रभावी खारे पानी के फिल्टर विकसित करने, और मानव बस्तियों के फैलाव के अध्ययन में भी किया जा चुका है।

डॉ. गुप्ता कहते हैं — “हम यह सीखते हैं कि जीवविज्ञान यह कैसे करता है, ताकि हम भी उसे दोहरा सकें।”
हालाँकि वे स्वीकार करते हैं कि यह अध्ययन उन्होंने मुख्यतः जिज्ञासा के लिए किया। वे जानना चाहते हैं कि प्रकृति किस प्रकार “अपनी अपूर्ण किंतु अद्वितीय सुंदरता” के ये पैटर्न रचती है, जो दशकों से वैज्ञानिकों को आकर्षित करते आ रहे हैं।


कैटरीना मिलर न्यूयॉर्क टाइम्स में विज्ञान संवाददाता हैं। वे शिकागो में रहती हैं और उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय से भौतिकी में पीएच.डी. प्राप्त की है।

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