संगठन सृजन : उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस को जल्द मिल सकता है नया अध्यक्ष
किसका होगा राजतिलक, किसे मिलेगी वर्ष 2027 की कमान?
-दिनेश शास्त्री-
उत्तराखंड में नए सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रही कांग्रेस पार्टी एक बार फिर पूरे दम ख़म के साथ खड़ी होने की कोशिश में है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के हवाले से यह तैयारी मानी जा रही है। पिछले हफ्ते दिल्ली में हुई बैठकों का यही निष्कर्ष है। यह अलग बात है कि जब भी एकजुटता की बात आती है तो पार्टी के क्षत्रप अपने अपने हिस्से को पाने के लिए आपस में ही गला काट स्पर्धा तक पहुंच जाते हैं।
ऐसा कई बार देखा गया है और पृथक राज्य स्थापना के बाद इस प्रवृत्ति में तेजी आई है। उत्तर प्रदेश के जमाने में गिनती के नेता अग्रिम पंक्ति में होते थे लेकिन राज्य बनने के बाद एक बात तो हुई है कि पार्टी में कार्यकर्ताओं की बेशक कमी हुई हो लेकिन नेताओं की फौज बढ़ी है और उसी अनुपात में उनकी आकांक्षाओं की आवृत्ति भी बढ़ी है। देखा जाए तो यह पार्टी के लिए एक उपलब्धि की तरह है।
पिछले हफ्ते दिल्ली में हुई एक के बाद एक बैठकों अथवा कॉर्नर डिस्कशन में उत्तराखंड में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने पर “गंभीर विचार विमर्श” हुआ। कहने को तो 28 महानगर और जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को अंतिम रूप दिया गया लेकिन टुकड़ों टुकड़ों में राष्ट्रीय नेतृत्व से अलग अलग समूहों ने जो विचार विमर्श किया उसमें मुख्य जोर प्रदेश में नए अध्यक्ष की नियुक्ति पर रहा।
कांग्रेस के भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक जिला और महानगर अध्यक्षों की नियुक्ति अगले कुछ दिन में हो जाएगी। इसमें ज्यादा से ज्यादा हफ्ता दो हफ्ता लग सकता है। उसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की घोषणा होगी। संभव है इस महीने के अंत तक उत्तराखंड कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिल जाए। यह अलग बात है कि कांग्रेस के फैसले अक्सर देर से होते हैं। जब दूसरे प्रदेश हों या उत्तराखंड, जब भी प्रत्याशियों की घोषणा करनी होती है तो कांग्रेस गुणा भाग में ही लगी रहती है।
अभी पिछले दिनों आपने निकाय चुनाव में देखा होगा कि कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी तब घोषित किए थे, जब सत्तारूढ़ भाजपा बढ़त ले चुकी थी। उससे पहले विधानसभा चुनाव में भी कमोबेश यही तो हुआ था। कुछ सीटों पर प्रत्याशी घोषित करने के बाद कुछ सीटें रोक दी। यही आखिरकार कांग्रेस की कमजोरी साबित होती रही है। जब तक खाका ही साफ नहीं है तो फतह कैसे संभव है?
बहरहाल इस बार कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। कांग्रेस ने बाकायदा रोड मैप बना दिया है। यदि सब कुछ ठीक रहा तो बहुत संभव है इस बार पूरी प्रदेश कांग्रेस का कायाकल्प हो जाए। यह अलग बात है कि कांग्रेस में वर्षों से कब्जा जमाए गुटीय नेताओं को घर बिठाना तो संभव नहीं होगा लेकिन ज्यादातर चेहरों के बदले जाने की बात तैर रही है।
अगर आपको याद हो तो पिछले दिनों देहरादून के नवनिर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों के अभिनंदन समारोह में हरीश रावत ने नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की मौजूदगी में इशारा नहीं बल्कि स्पष्ट किया था कि प्रीतम सिंह को कांग्रेस की कमान सौंपी जानी चाहिए। वही बात दिल्ली की कॉर्नर मीटिंग में प्रमुखता से हुई।
प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष करण महरा से कांग्रेस के वर्तमान में शिखर पुरुष माने जा रहे हरीश रावत का आंकड़ा 36 का माना जाता है। कदाचित इसी वजह से हरदा ने महरा के स्थान पर प्रीतम की पैरवी करना ज्यादा मुफीद समझा। बेशक महरा और हरदा नजदीकी रिश्तेदार हैं लेकिन ये राजनीति ही है जो भाई को भाई से अलग करती आई है।
कांग्रेस के दिल्ली दरबार से हालांकि सटीक खबर बाहर आने का दावा कोई नहीं कर सकता लेकिन भरोसेमंद सूत्र मानते हैं कि प्रीतम ही एकमात्र ऐसे नेता बताए गए जिनके नाम पर किसी ने एतराज नहीं किया। यही एक कारण माना जा रहा है कि निर्विवाद रूप से प्रीतम का एक बार फिर राजतिलक कर दिया जाए। वैसे कांग्रेस में जब तक घोषणा न हो जाए तब तक कोई अनुमान व्यक्त करना सटीक नहीं माना जा सकता किंतु जो कुछ दिख रहा है और दिल्ली से छन कर जो कुछ आ रहा है, उससे यही उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि प्रीतम सिंह की ताजपोशी हो जाए।
प्रीतम 2027 में कितने कारगर होंगे, यह तो चुनाव परिणाम बताएगा लेकिन उनके लिए पर्याप्त बैटिंग हुई है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि इस बार उनकी ताजपोशी में संदेह नहीं होगा। 2027 के लिए उनके कंधे पर जुआ रख देना कांग्रेस का भविष्य तय करेगा। निसंदेह प्रीतम जैसे नेता प्रदेश में बहुत कम हैं जो विनम्र, सबके लिए उपलब्ध अथवा सर्वप्रिय हैं लेकिन उनके साथ सिर्फ एक ही समस्या है कि वे मात्र एक सीट के नेता हैं।
बेशक यह बात अन्य नेताओं के बारे में भी कही जा सकती है किंतु कुछ लोग हैं जो बड़े मतदाता वर्ग को एड्रेस करते हैं। गणेश गोदियाल उनमें एक हैं। बदरीनाथ विधानसभा उपचुनाव अगर कांग्रेस जीती थी तो वह गोदियाल का ही पराक्रम था मगर कांग्रेस ने उन्हें वो महत्व नहीं दिया जो उन्हें दिया जाना चाहिए था। इस लिहाज से देखा जाए तो वर्तमान में कांग्रेस में गोदियाल ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन पर कोई दाग नहीं है किंतु खांचों में बंटी पार्टी में उनकी पैरवी करने वाले बड़े नेता मौजूद नहीं हैं।
फिलहाल प्रीतम के सितारे मजबूत माने जा रहे हैं किंतु देखा जाए तो गोदियाल ही एकमात्र विकल्प हैं किंतु सब कुछ वैसा नहीं होता, जैसा दिखता है। फिलहाल तो नए अध्यक्ष की नियुक्ति का इंतजार है। आप भी देखिए, इस महीने के अंत तक बहुत कुछ नया कांग्रेस में दिख सकता है।
