पर्यावरणब्लॉग

मकड़ियों के जाल की रहस्यमयी सजावट: सुंदरता नहीं, विज्ञान की नई परिभाषा

–ज्योति रावत

मकड़ी को हम सामान्यतः एक डरावना या घिनौना जीव मानते हैं, लेकिन विज्ञान की दृष्टि से वह एक अद्भुत वास्तुकार है। उसका जाल सिर्फ शिकार फँसाने का उपकरण नहीं, बल्कि प्रकृति की सबसे जटिल इंजीनियरिंग में से एक है। अब वैज्ञानिकों ने मकड़ियों के इन जालों में बनी रहस्यमयी “सजावटों” को लेकर नया खुलासा किया है। इन सजावटों को वैज्ञानिक भाषा में ‘स्टैबिलिमेंटम’ (Stabilimentum) कहा जाता है—जो कभी तिरछी रेखाओं, कभी ‘X’ के आकार, तो कभी सफेद धब्बों के रूप में दिखती हैं।

लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि ये सजावटें जाल की खूबसूरती या स्थिरता बढ़ाने के लिए होती हैं, लेकिन हाल के शोध बताते हैं कि यह सिर्फ सौंदर्य या मजबूती का मामला नहीं है—इनका एक गहरा वैज्ञानिक उद्देश्य भी हो सकता है।

सिल्क से बनी ‘भाषा’

ऑर्ब-वेब यानी गोलाकार जाल बनाने वाली कुछ मकड़ियाँ दिन के समय इन सजावटों का उपयोग करती हैं। उदाहरण के लिए, Argiope keyserlingi या Argiope bruennichi जैसी प्रजातियाँ अपने जाल के केंद्र में सफेद सिल्क से “X” या “क्रॉस” जैसी आकृतियाँ बनाती हैं। ये पैटर्न पराबैंगनी (UV) किरणों को परावर्तित करते हैं—वही रोशनी जिसे कई कीट आकर्षक समझते हैं।

इसीलिए, कई वैज्ञानिकों ने पहले यह निष्कर्ष निकाला था कि शायद यह सजावट कीड़ों को आकर्षित करने का तरीका है। कुछ ने कहा कि यह पक्षियों या अन्य बड़े जीवों को चेतावनी देने के लिए होती हैं ताकि वे जाल से टकराकर उसे नष्ट न कर दें। लेकिन इन सभी धारणाओं पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

नया शोध, नया रहस्योद्घाटन

हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन, जिसका जिक्र द न्यूयॉर्क टाइम्स ने 29 अक्टूबर 2025 को किया, इस विवाद को एक नई दिशा देता है। शोधकर्ताओं ने इटली के द्वीप सार्डीनिया में पाई जाने वाली मकड़ी Argiope bruennichi के जालों का अध्ययन किया। उन्होंने सैकड़ों जालों को रिकॉर्ड किया और पाया कि लगभग आधे जालों में ऐसी सजावट मौजूद थी।

इसके बाद उन्होंने कंप्यूटर मॉडल के जरिए यह जांचा कि जब कोई कीड़ा जाल से टकराता है तो कंपन (vibrations) कैसे फैलते हैं—और सजावट की उपस्थिति या अनुपस्थिति से उस पर क्या फर्क पड़ता है। परिणाम चौंकाने वाले थे। जिन जालों में स्टैबिलिमेंटम मौजूद था, उनमें कंपन तेज़ी और अधिक सटीकता से मकड़ी तक पहुंच रहा था। इसका अर्थ यह हुआ कि ये सजावटें मकड़ी को “शिकार की खबर” देने में मदद करती हैं।

सजावट नहीं, सूचना का माध्यम

इस अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिकों के अनुसार, स्टैबिलिमेंटम को अब केवल “जाल की सजावट” नहीं, बल्कि “सूचना-प्रसार संरचना” के रूप में देखना चाहिए। जब कोई कीड़ा जाल पर फँसता है, तो उसका संघर्ष कंपन पैदा करता है। ये कंपन जाल की रेशेदार संरचना के माध्यम से मकड़ी तक पहुँचते हैं, जिससे वह तुरंत सक्रिय होकर शिकार को पकड़ लेती है।
सजावटें इन कंपन की दिशा और गति को बेहतर बना सकती हैं—जैसे किसी टेलीफोन लाइन में सिग्नल को एम्प्लीफाई करने वाला यंत्र।

दूसरे शब्दों में कहें, तो मकड़ी अपने जाल में सिर्फ कलाकारी नहीं कर रही होती, बल्कि वह एक “संचार तंत्र” बना रही होती है, जो उसे जिंदा रहने में मदद करता है।

विज्ञान और प्रकृति की साझी प्रेरणा

यह खोज केवल जीवविज्ञान के लिए नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग और तकनीक की दुनिया के लिए भी प्रेरणादायक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मकड़ियों के ये सूक्ष्म “वाइब्रेशन सिस्टम” इंसानी तकनीक को दिशा दे सकते हैं।
भविष्य में इसी सिद्धांत का उपयोग अल्ट्रासंवेदनशील कंपन-संवेदक (vibration sensors), सूक्ष्म ड्रोन-संवेदक, या संरचनात्मक सुरक्षा तकनीकों में किया जा सकता है। यानी प्रकृति के इस छोटे जीव ने मानव-विज्ञान को एक बड़ा विचार दे दिया है।

अभी भी अनसुलझे सवाल

हालाँकि इस अध्ययन ने एक नई रोशनी डाली है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कहानी अभी अधूरी है।
सभी मकड़ियों में स्टैबिलिमेंटम एक-सा नहीं होता। कुछ गोलाकार जालों में यह सफेद रेखाओं के रूप में होता है, तो कुछ में मरे हुए कीड़ों और पत्तों से बनी लकीरें होती हैं। कुछ प्रजातियाँ इसे शिकार को आकर्षित करने के लिए उपयोग करती हैं, तो कुछ शिकारी पक्षियों से बचाव के लिए।

शोधकर्ता यह भी स्वीकार करते हैं कि उनके मॉडल आदर्श परिस्थितियों में बनाए गए थे—जबकि असली जाल पेड़ों, हवा, बारिश और धूल के बीच बंधे रहते हैं। इसलिए आगे के प्रयोगों में प्राकृतिक परिस्थितियों को भी शामिल करना होगा।

प्रकृति के डिज़ाइन में छिपा संदेश

इस शोध का सबसे बड़ा संदेश यही है कि प्रकृति के किसी भी “सौंदर्य” में कोई न कोई उद्देश्य छिपा होता है। मकड़ी का जाल देखने में जितना सुंदर लगता है, उतना ही जटिल भी है। उसकी हर रेखा, हर सिल्क-लूप, और हर सजावट किसी न किसी कार्य के लिए बनी है।

मकड़ी ने यह कला लाखों वर्षों के विकास के दौरान सीखी है—जहाँ हर नई तरकीब ने उसे जीवित रहने की संभावना थोड़ी और बढ़ाई है। यही प्रकृति का नियम है: सौंदर्य, बुद्धिमत्ता और अस्तित्व एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

यह अध्ययन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिन चीजों को हम “सजावट” या “सौंदर्य-प्रदर्शन” मानते हैं, वे दरअसल जीवन के गहरे विज्ञान से जुड़ी होती हैं। मकड़ी के जाल की ये रहस्यमयी रेखाएँ न केवल कला हैं, बल्कि संचार का माध्यम भी हैं—एक मौन भाषा जो कंपन के ज़रिए संवाद करती है।

प्रकृति के इस नन्हे वास्तुकार ने हमें दिखाया है कि सुंदरता और उपयोगिता विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सूत्र में पिरोए हुए हैं।
शायद यही कारण है कि विज्ञान अब कह रहा है—मकड़ियाँ सिर्फ जाल नहीं बुनतीं, वे संदेश भी बुनती हैं।

(लेखिका विज्ञान शिक्षिका हैं  तथा उत्तराखंड हिमालय न्यूज़ पोर्टल से जुड़ी हुयी हैं -एडमिन)

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