पंडित जवाहरलाल नेहरू: आधुनिक भारत के शिल्पकार और स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत

– सुरेंद्र कुमार–
देश के स्वाधीनता संग्राम आंदोलन के अग्रणी नेता, स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के शिल्पकार पंडित जवाहरलाल नेहरू जी की जयंती पर उन्हें सादर नमन।
बच्चों के प्रिय “चाचा नेहरू” की जयंती की स्मृति में मनाए जाने वाले बाल दिवस की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
भारतीय लोकतंत्र की मजबूत नींव रखने वाले, सर्वोत्तम संस्थाओं के निर्माता, सामाजिक न्याय और समानता के पुरोधा नेहरू जी का नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में सदा के लिए अंकित है। वे केवल भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति के एक सम्मानित नेता थे। विश्व के अनेक राष्ट्राध्यक्षों के साथ उनके गहरे संबंध और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि ने भारत को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया।

स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी के रूप में नेहरू
महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर नेहरू ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। इस संघर्ष के दौरान उन्होंने कुल नौ बार जेल यात्राएँ कीं और लगभग नौ वर्ष का समय विभिन्न जेलों में बिताया। इनमें देहरादून और अल्मोड़ा जेल भी शामिल हैं, जिनसे उनका विशेष ऐतिहासिक संबंध रहा है।
अल्मोड़ा जेल का गौरवशाली इतिहास
सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की यह जेल वर्ष 1872 में अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी। इस जेल में पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा अनेक स्वतंत्रता सेनानी रहे, जैसे — पंडित गोविंद बल्लभ पंत, खान अब्दुल गफ्फार खाँ, आचार्य नरेंद्र देव, बद्री दत्त पांडे, देवी दत्त पंत, हर गोविंद पंत, विक्टर मोहन जोशी, सैयद अली ज़हीर और दुर्गा सिंह रावत आदि।
नेहरू जी को यहाँ दो बार कैद किया गया। उनकी जेल यात्राएँ स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की जीवंत गाथाएँ हैं, जो आज भी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती हैं।

नेहरू की जेल यात्राएँ: संघर्ष की अमिट कथा
पहली गिरफ्तारी (1921):
प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत दौरे का कांग्रेस ने विरोध किया। इलाहाबाद में आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर को नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू गिरफ्तार हुए। उन्हें छह महीने की सजा और 100 रुपये जुर्माने का दंड दिया गया। जुर्माना न भरने पर उन्हें लखनऊ जेल भेजा गया।
दूसरी गिरफ्तारी (1922):
विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार आंदोलन के दौरान नेहरू को 18 महीने की सश्रम कारावास की सजा हुई। जेल जाते समय उन्होंने कहा —
“भारत को आज़ाद कराने की इस लड़ाई में शामिल होना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।”
तीसरी गिरफ्तारी (1923):
नाभा आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें मात्र 12 दिनों की सजा हुई। अपनी आत्मकथा में उन्होंने नाभा जेल की दयनीय स्थितियों का विस्तृत वर्णन किया है।
चौथी गिरफ्तारी (1930):
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 14 अप्रैल को उन्हें गिरफ्तार किया गया और 181 दिनों तक नैनी जेल में रखा गया।
पाँचवीं गिरफ्तारी (1930):
किसानों को कर न देने के आंदोलन में भाग लेने पर 100 दिनों की कैद हुई। इसी दौरान उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को प्रेरणादायक चिट्ठियाँ लिखीं, जो आगे चलकर “ग्लिम्पसेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री” के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
छठी गिरफ्तारी (1931):
लगान बंदी आंदोलन के कारण उन्हें दो वर्ष के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा दी गई। इस दौरान वे नैनी, बरेली और देहरादून जेलों में रहे।
सातवीं गिरफ्तारी (1934):
कोलकाता में दिए गए भाषणों को राजद्रोह माना गया। उन्हें अलीपुर, देहरादून और अल्मोड़ा जेलों में कुल 558 दिन रखा गया। उन्होंने कहा —
“अगर राजद्रोह का मतलब भारत की आज़ादी की माँग है, तो हाँ, मैंने राजद्रोह किया है।”
आठवीं गिरफ्तारी (1940):
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कांग्रेस वॉर कमिटी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भारत की स्वतंत्रता की मांग की। इस कारण उन्हें चार वर्ष की सजा हुई, पर वे 399 दिन बाद रिहा हुए।
नौवीं गिरफ्तारी (1942):
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और 1945 तक हिरासत में रखा गया। यह उनकी सबसे लंबी कैद थी — 1041 दिनों की।
विचारक, राष्ट्रनिर्माता और मानवतावादी
नेहरू केवल राजनेता नहीं, बल्कि एक चिंतक और द्रष्टा थे। उन्होंने आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाले संस्थान — आईआईटी, आईआईएम, भाखड़ा नांगल जैसी परियोजनाएँ और वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र स्थापित किए। वे मानते थे कि “भारत की आत्मा उसकी वैज्ञानिक चेतना और लोकतांत्रिक भावना में बसती है।”
उनका मानना था कि बच्चे राष्ट्र का भविष्य हैं, इसलिए उनकी जयंती बाल दिवस के रूप में मनाई जाती है। बच्चों से उनका विशेष लगाव और उनके प्रति अपनापन आज भी प्रेरणादायक है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत को स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि आधुनिक सोच और संस्थागत विकास का मार्ग भी दिया। उनके त्याग, दूरदृष्टि और लोकतांत्रिक आदर्श आज भी भारत की राजनीति और समाज के लिए दिशा-सूचक हैं।
आज उनकी जयंती पर हम सबका यही प्रण होना चाहिए कि हम उस भारत के निर्माण में योगदान दें जिसका सपना नेहरू ने देखा था — एक प्रगतिशील, वैज्ञानिक, समानतापूर्ण और लोकतांत्रिक भारत।
