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गौचर मेला : 73वीं वर्षगांठ में इतिहास, विकास और उपेक्षा की कहानी दिग्पाल गुसाईं, गौचर से

– गौचर से दिग्पाल गुसाईं –

गौचर का प्रसिद्ध औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेला अपनी 73वीं वर्षगांठ मना रहा है। एक समय यह मेला मंडल का सबसे बड़ा विकास उत्सव माना जाता था। सात दशक पहले यह व्यापार मेला यहां की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक था, लेकिन आज मेले में बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव के कारण इसकी पौराणिक सांस्कृतिक पहचान पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।

इतिहास से आधुनिकता तक का सफर

जनपद चमोली के विशाल मैदान में लगने वाला यह मेला अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सीमांत क्षेत्र की व्यापारिक परंपरा का द्योतक है। अंग्रेजी शासन में कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ जनपद स्थित जौलजीबी में इसी तरह का मेला भारत–तिब्बत व्यापार के लिए आयोजित किया जाता था।

इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 1943 में गढ़वाल के प्रख्यात पत्रकार स्व. गोविंद प्रसाद नौटियाल, नाथू सिंह पाल, जमन सिंह सयाना, पान सिंह बंपाल, भोपाल सिंह राणा आदि नेताओं के एक शिष्टमंडल ने तत्कालीन जिलाधिकारी आर. डी. बर्नीडी से गौचर में ऐसा ही मेला आयोजित करने का आग्रह किया। तब से 1947 तक यह मेला 1 से 7 नवंबर तक आयोजित होता रहा।

स्वतंत्रता के बाद 1947 में मेले की तिथि बदलकर इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस 14 नवंबर से 20 नवंबर के बीच आयोजित किया जाने लगा। उस समय भोटिया जनजाति के लोग तिब्बत से ऊन, नमक, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य सामान लेकर आते थे तथा बदले में यहां से गुड़, बेस और वन औषधियाँ ले जाते थे। इसी कारण इसे भोटिया मेला भी कहा जाता था।

तिब्बत व्यापार बंद होने के बाद बदला स्वरूप

1960 में चमोली के अलग जनपद बनने और भारत-तिब्बत व्यापार पर प्रतिबंध लगने के बाद मेले का चरित्र पूरी तरह बदल गया। अब मेले को विकास के आयामों से जोड़ते हुए इसमें सरकारी विभागों की प्रदर्शनी, जन-जागरूकता कार्यक्रम, खेलकूद और सांस्कृतिक आयोजन जोड़े गए। प्रदर्शनी को तब औद्योगिक विकास प्रदर्शनी का नाम दिया गया। स्थानीय बोली में इसे ‘नुमाइश’ कहा जाता था।

कास्तकार अपने उत्पादों के साथ मेले में पहुंचते और प्रगतिशील किसान के रूप में अपनी पहचान बनाने का प्रयास करते। उन्हें प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कार भी दिए जाते। पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए पशु प्रदर्शनी भी होती थी, जिसमें श्रेष्ठ पशु रखने वाले पशुपालकों को सम्मानित किया जाता था।

लेकिन अब स्थिति विपरीत है—कास्तकार लगभग हाशिये पर धकेल दिए गए हैं। उद्यान विभाग को गांव-गांव जाकर प्रदर्शनी के लिए सामग्री जुटानी पड़ती है। पशु प्रदर्शनी और पत्रकार वार्ता—दोनों कार्यक्रम बंद कर दिए गए हैं, जबकि कभी ये मेला आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे।

प्रशासनिक प्रयोगशाला बनता मेले का रूप

25 हजार रुपये में शुरू हुआ यह मेला अब एक करोड़ से अधिक बजट में संचालित होता है, फिर भी यह लोगों के मन मस्तिष्क पर पहले जैसी छाप छोड़ने में विफल रहा है।

प्रारंभिक वर्षों में इसका संचालन जिला पंचायत करती थी। 1990 में स्थानीय निकायों के गठन के बाद कुछ समय तक नगर पंचायत गौचर ने भी इसकी जिम्मेदारी संभाली। लेकिन जबसे मेले को प्रशासन के हवाले किया गया, तब से इसका स्वरूप लगातार प्रयोगशाला जैसा होता गया।

विभिन्न कारणों से नौ बार स्थगित होने के बाद इस बार मेला 73वीं वर्षगांठ मना रहा है। कुछ वर्ष पहले इसे गौचर फेस्टिवल का नाम दिया गया था, जिसे लेकर लोगों ने आपत्ति जताई, मगर इसकी अनसुनी कर दी गई। अब पुनः इसका मूल स्वरूप लौटाते हुए इसे राजकीय औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेला नाम दिया गया है।

इस वर्ष के आयोजन और तैयारियाँ

इस बार मेला जिलाधिकारी गौरव कुमार की अध्यक्षता में आयोजित किया जा रहा है। मेले के बेहतर संचालन के लिए उप जिलाधिकारी सोहन सिंह रांगड़ और तहसीलदार सुधा डोभाल लगातार मेला मैदान में डटे हुए हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मेले का शुभारंभ करेंगे। प्रशासन का प्रयास है कि इस बार मेला अपने पारंपरिक स्वरूप के साथ-साथ आधुनिक व्यवस्थाओं को भी मजबूती प्रदान करे।

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