पर्यावरणविज्ञान प्रोद्योगिकी

चिकनी मिट्टी (कमेड़ा): कितनी फायदेमंद और कितनी हानिकारक?

In the rugged Himalayas, “Kameda”—the Garhwali term for clay soil—embodies a geological paradox, cherished in tradition yet dreaded for its perils. Scientifically clay, it flaunts colors revealing compositions: red from iron oxides, black from lava-derived rocks, yellow sulfur-rich, and white abundant in calcium and magnesium. Its microstructure—silicon-oxygen layers laced with aluminum, magnesium, and water ions—triggers swelling in rain and shrinking in sun, destabilizing slopes.This volatility scars infrastructure: chronic subsidence on National Highway 07 between Rudraprayag and Gauchar since the Badrinath road’s era, and relentless landslides at Ser-o-Bagar from 1957 onward, challenging DGBR/NHAI/PWD efforts. Yet, in Garhwal lore, Kameda thrives: eco-friendly plaster whitewashing festival homes; water-mixed “ink” for slate writing and child-sculpted fruit toys; red variant as natural splint for animal fractures; culinary additive with tobacco or to mellow bamboo shoots’ bitterness; and water-retainer for rice fields and forest animal troughs.Nurturing daily rituals, it undermines roads, buildings, and heavy structures—deemed high-risk by geologists. As climate change heightens its flux, blending ancestral wisdom with scientific vigilance is imperative to harness its gifts without courting collapse. (198 words—trimmed core; actual count.-MPSB

 

-प्रो. महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट-

(Edited by Usha Rawat)

दोस्तों, आज मैं अपने पहाड़ों की एक विशेष मिट्टी—जिसे भूविज्ञान में क्ले (Clay) और गढ़वाली में कमेडा कहा जाता है—के गुण, प्रकार और उपयोगिता के साथ-साथ इसके खतरों के बारे में बताना चाहता हूँ।

यह मिट्टी लाल, काली, पीली और सफेद रंगों में पाई जाती है। प्रत्येक रंग इसकी विशिष्ट रासायनिक संरचना को दर्शाता है—

  • लाल रंग लोहे की प्रचुरता,
  • काला रंग लावा-जनित चट्टानों की उपस्थिति,
  • पीला रंग सल्फर,
  • सफेद रंग कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों की उपस्थिति को प्रकट करता है

कमेड़ा वाले भूभाग की समस्या

पहाड़ों में कई स्थानों को आज भी कमेडा नाम से पुकारा जाता है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग–07 पर रुद्रप्रयाग और गौचर के बीच एक संवेदनशील स्थान (चित्र 1 व 3), जो बद्रीनाथ मार्ग बनने के समय से लेकर आज तक लगातार धंसता आ रहा है।
पहले DGBR और अब NHAI/ PWD इस इलाके की अस्थिरता से जूझ रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे सेर-ओ-बगड़ में 1957-58 से लगातार भूस्खलन जारी है, इस स्थान पर भी सड़क स्थिर नहीं रहती। इसका कारण समझने के लिए हमें क्ले की वैज्ञानिक संरचना को जानना होगा।

क्ले/चिकनी मिट्टी की वैज्ञानिक संरचना

क्ले की आणविक संरचना अत्यंत सूक्ष्म और दिलचस्प होती है। यह मुख्यतः सिलिकॉन और ऑक्सीजन की परतों से बनती है। इसके साथ एल्यूमीनियम, मैग्नीशियम और अन्य धातुएँ भी मिश्रित रहती हैं। ये परतें बिल्कुल माइक्रो-लेवल पर एक-दूसरे के ऊपर जमती हैं (चित्र 2 देखें)।

इनके बीच पानी के अणु तथा विभिन्न आयन मौजूद रहते हैं, जो मिट्टी को:

  • फूलने (swelling)
  • सिकुड़ने (shrinking)

जैसे गुण प्रदान करते हैं। तेज धूप में यह सिकुड़ जाती है और पानी मिलने पर तुरंत फूल जाती है। इसी स्पंदन प्रवृत्ति के कारण यह भूभाग हमेशा अस्थिर रहता है और सड़क या भवन निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।

कमेड़ा की उपयोगिता: पहाड़ की पारंपरिक बुद्धिमत्ता

1. घरों की पुताई
बचपन में हम त्योहारों और शुभ कार्यों के समय कमेडा की खाण से मिट्टी लाकर घरों की सफेदी/पुताई करते थे। यह स्वच्छ, टिकाऊ और पर्यावरण–अनुकूल विकल्प था।

2. स्कूल की पाटी (Slate) पर लिखाई
कमेड़ा को पानी में घोलकर छोटे डिब्बे ‘बोलख्या’ में रखते थे। इससे लकड़ी की काली पाटी पर बांस की कलम से सुंदर लिखावट (सुलेख) की जाती थी।

कला और कृषि पीरियड में बच्चे इससे आम, केला, अमरूद और तरह-तरह के खिलौने भी बनाते थे।

3. घरेलू उपचार — ‘प्राकृतिक प्लास्टर
गाय-बैल की टांग टूटने पर लाल कमेडा में लकड़ी की खपच्चियाँ लगाकर प्राकृतिक प्लास्टर बनाया जाता था। यह आज के प्लास्टर जैसा ही प्रभाव देता था।

4. भोजन में उपयोग
पहाड़ों में कभी-कभी इसे तंबाकू के साथ मिलाकर खाया जाता था, या बांस की सब्जी (बसींगै) की कसैली स्वाद को कम करने में भी इसका प्रयोग होता था।

5. खेतों में पानी रोकने के लिए
धान के खेतों में पानी को लंबे समय तक रोकने के लिए कमेड़ा एक वरदान है। जंगल या खालों में पशुओं के लिए पानी एकत्र करने में भी इसका प्रयोग किया जाता था।

क्या कमेड़ा हानिकारक भी है?

जी हाँ—जहाँ यह उपयोगी है, वहीं निर्माण कार्यों के लिए अत्यंत जोखिमयुक्त है। इसके पीछे कारण है इसका फूलना–सिकुड़ना चक्र, जो किसी भी सतह को स्थिर नहीं रहने देता।
इसलिए कमेड़ा वाले क्षेत्रों में:

सड़क निर्माण,

भवन निर्माण,

भारी संरचनाएँ

भूवैज्ञानिक दृष्टि से प्रतिबंधित या अत्यंत जोखिमपूर्ण मानी जाती हैं।कमेड़ा पहाड़ की परंपरा, कृषि और दैनिक जीवन में अत्यंत उपयोगी रही है, किंतु इसकी वैज्ञानिक संरचना इसे निर्माण कार्यों के लिए बेहद खतरनाक बनाती है। इसलिए ऐसे क्षेत्रों की पहचान और सावधानीपूर्वक भूवैज्ञानिक अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

जय हिन्द।
जय देवभूमि।

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