ऐतिहासिक गौचर मेला पहुंचा अपने सबाब पर, उमड़ रहा मेलार्थियों का सैलाब

– गौचर से दिग्पाल गुसाईं –
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती के अवसर पर आरंभ हुआ गौचर औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेला अब अपने पाँचवें दिन पूरे शबाब पर है। मेले में उमड़ती भीड़ यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि जनता का गौचर मेले से लगाव आज भी उतना ही प्रबल है जितना पहले हुआ करता था।
सन 1943 में भारत–तिब्बत व्यापार के दौरान शुरू हुआ यह ऐतिहासिक मेला इस वर्ष अपनी 73वीं वर्षगांठ मना रहा है। हालांकि, विभिन्न कारणों—कभी उत्तरकाशी का विनाशकारी भूकंप, कभी उत्तराखंड आंदोलन, तो कभी राजनीतिक परिस्थितियाँ—के चलते यह मेला अब तक नौ बार स्थगित भी रहा है। लंबे अंतराल में इस मेले ने कई उतार–चढ़ाव देखे हैं।
शुरुआत के दिनों में मेले का उद्देश्य लोगों को आवश्यक घरेलू वस्तुएँ उपलब्ध कराना था और इसका संचालन सामाजिक कार्यकर्ता आपसी सहयोग से किया करते थे। इसके बाद मेले की जिम्मेदारी जिला पंचायत को मिली, और फिर जिला प्रशासन ने इसे अपने हाथ में लिया। तब विभिन्न समितियों के समन्वय से मेले का संचालन सुचारू रूप से होता था।
धनाभाव के कारण हर वर्ष सरकार से 10 से 25 लाख रुपये तक की मांग की जाती थी, लेकिन अधिकांश समय सहायता न के बराबर मिलती थी। इस समस्या के समाधान के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मेले को राजकीय मेला घोषित किया, जिसके बाद मेले का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।
हालांकि आज भी समितियाँ तो बनती हैं, पर उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता। मेले के संरक्षक गढ़वाल आयुक्त, अध्यक्ष जिलाधिकारी और मेलाधिकारी उप जिलाधिकारी होते हैं, लेकिन 73 वर्षों में संरक्षक का आगमन शायद ही एक–दो बार हुआ हो। लगातार अफसरों के तबादलों के चलते हर अधिकारी इस मेले को एक तरह की प्रयोगशाला की तरह संचालित करता रहा है।
स्थिति यह हो गई है कि स्थानीय कलाकार हाशिए पर चले गए हैं। अधिकारी अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक टीमों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे मेले की मूल सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो रही है। भले ही अब गौचर मेले की तर्ज पर कई स्थानों पर मेले आयोजित होने लगे हों, परंतु गौचर मेले जैसी विशिष्टता कहीं और देखने को नहीं मिलती।
फिर भी, इस बार की भारी भीड़ ने यह साबित कर दिया है कि जनता का इस ऐतिहासिक मेले से प्रेम अब भी बरकरार है। सरकारी कर्मचारियों को भी मेले में सम्मिलित होने का अवसर मिले, इसके लिए 18 नवंबर को अवकाश घोषित किया जाता है, जिससे मेले में भीड़ और बढ़ जाती है।
इस वर्ष आसपास के क्षेत्रों में अन्य मेले पहले ही संपन्न हो चुके हैं, इसलिए व्यापारी बड़ी संख्या में गौचर पहुँचे हैं। दुकानों और स्टॉलों की इतनी अधिक भीड़ है कि गौचर का विशाल मैदान भी छोटा प्रतीत हो रहा है। लोगों द्वारा की जा रही जोरदार खरीदारी ने व्यापारियों के चेहरों पर रौनक ला दी है और मेला प्रशासन भी इससे बेहद उत्साहित है।
