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गुमशुदा बच्चे, गुम होता भविष्य: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और भारत की हकीकत

The Supreme Court has expressed deep concern over the disappearance of a child every eight minutes in India and has sought an immediate solution to this grave problem. The country’s top court voiced this concern during the hearing of a public interest litigation filed by an NGO. The Supreme Court’s concern is a warning that cannot be ignored, for doing so would amount to compromising the nation’s future. A missing child is not just a case file—it is an entire future snatched away from us. This concern is not only that of the court; it also emerges from the latest report of the National Crime Records Bureau (NCRB) and various national and international surveys, which portray the disappearance of children in India as a problem akin to an epidemic.

 

जयसिंह रावत

सुप्रीम कोर्ट ने भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चे की गुमशुदगी पर गहरी चिन्ता प्रकट करने के साथ ही तत्काल इस गंभीर समस्या का समाधान चाहा है। देश की शीर्ष अदालत ने यह चिन्ता एक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान प्रकट की है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता एक ऐसी चेतावनी है जिसे अनसुना करना राष्ट्र के भविष्य से समझौता करने जैसा है। एक गुमशुदा बच्चा सिर्फ एक केस नहीं बल्कि एक पूरा भविष्य है, जो हमसे छीन लिया जाता है। यह चिंता न केवल अदालत की है, बल्कि नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय सर्वेक्षणों से भी उभरती है, जो भारत में बच्चों की गुमशुदगी को एक महामारी जैसी समस्या के रूप में चित्रित करते हैं।

वास्तव में बच्चों की गुमशुदगी न केवल परिवारों को तोड़ देती है, बल्कि मानव तस्करी, बाल श्रम, यौन शोषण और जबरन विवाह जैसी सामाजिक बुराइयों का द्वार भी खोलती है। एनसीआरबी की ‘‘भारत में अपराध 2023’’ रिपोर्ट के अनुसार, देश में 2023 में 91,296 बच्चों के गुम होने की शिकायत दर्ज की गई, जो 2022 के 83,350 मामलों से 9.5 प्रतिशत अधिक है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि औसतन प्रति घंटे 10 से अधिक बच्चे गुम हो रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के ‘‘हर आठ मिनट’’ वाले दावे से मेल खाता है। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि इनमें 71.4 प्रतिशत लड़कियां हैं, जो लिंगआधारित असमानता और यौन शोषण के खतरे को रेखांकित करती है। गुमशुदा बच्चे न केवल शारीरिक शोषण का शिकार होते हैं, बल्कि उनके परिवार टूट जाते हैं। एनसीपीसीआर के डैशबोर्ड से पता चलता है कि 60 प्रतिशत बच्चे पुनर्वास के बाद मानसिक चिकित्सा की जरूरत रखते हैं। समाज स्तर पर, यह लिंग असंतुलन बढ़ाता है, लड़कियों की अधिक संख्या से बाल विवाह और ट्रैफिकिंग बढ़ती है।

एनसीआरबी के आंकड़ों का राज्यवार विश्लेषण करें तो उत्तर प्रदेश सबसे आगे नजर आता है, जहां 2023 में 25,000 से अधिक मामले दर्ज हुए। उसके बाद बिहार (18,000़), पश्चिम बंगाल (15,000़) और महाराष्ट्र आते हैं। शहरी केंद्रों जैसे दिल्लीएनसीआर में अनट्रेस्ड मामलों का प्रतिशत 50 प्रतिशत से अधिक है, जहां झुग्गी-झोपड़ियां और प्रवासी मजदूरों की आबादी तस्करों के लिए आसान निशाना बनाती है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल गुमशुदा बच्चों में से लगभग 74 प्रतिशत को बरामद किया जाता है, लेकिन शेष 26 प्रतिशत, यानी करीब 24,000 बच्चे, गुम ही रह जाते हैं। ये बच्चे अक्सर मानव तस्करी के नेटवर्क में फंस जाते हैं, जहां वे बाल श्रम, घरेलू दासता या वेश्यावृत्ति में धकेल दिए जाते हैं।

एनसीआरबी का ‘ट्रैक-चाइल्ड’ पोर्टल 2023 में 80 प्रतिशत मामलों में सहायक सिद्ध हुआ, लेकिन इसमें डेटा एंट्री में देरी और स्थानीय पुलिस की उदासीनता बड़ी बाधाएं बनी रहीं। कोविड-19 महामारी के बाद यह समस्या और गहराई, क्योंकि आर्थिक संकट ने गरीब परिवारों को प्रवास के लिए मजबूर कर दिया। रिपोर्ट में कुल अपराधों के संदर्भ में बच्चों के खिलाफ अपराध 9.2 प्रतिशत बढ़कर 1,77,335 हो गए, जिसमें गुमशुदगी एक प्रमुख घटक माना गया। इन आंकड़ों के अलावा भी विभिन्न अन्य सर्वेक्षण इस समस्या की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करते हैं। यूनिसेफ इंडिया की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन’ में वैश्विक स्तर पर 48.8 मिलियन बच्चों के विस्थापन का जिक्र है, जिसमें भारत का बड़ा हिस्सा है।रिपोर्ट के अनुसार, संघर्ष और हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में 52 मिलियन से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जो गुमशुदगी का प्राथमिक कारण बनता है। भारत में, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और शिक्षा की कमी के चलते 40 प्रतिशत गुमशुदा बच्चे मानव तस्करी के शिकार होते हैं, खासकर नेपाल और बांग्लादेश सीमाओं पर। यूनिसेफ ने अनुमान लगाया है कि 2024 में 1.5 से 2 लाख बच्चे गुम हुए, जिनमें 30 प्रतिशत सीमा-पार तस्करी से जुड़े। संगठन ने डिजिटल ट्रैकिंग ऐप्स और स्कूल-आधारित अलर्ट सिस्टम की सिफारिश की है, ताकि प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मजबूत हो।

बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) का 2025 का सर्वेक्षण (जो 10 राज्यों में 5,000 से अधिक मामलों पर आधारित है) और भी चौंकाने वाले आंकड़े पेश करता है। संगठन के अनुसार, 70 प्रतिशत गुमशुदा बच्चे बाल श्रम या जबरन विवाह में धकेल दिए जाते हैं, और 2024-25 में मामलों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बीबीए के पुराने अध्ययन (2008-2010) में 1,17,480 बच्चों के गुम होने का उल्लेख है, लेकिन नवीनतम डेटा ऑनलाइन ग्रूमिंग को नया खतरा बताता है। इसी तरह सेव द चिल्ड्रन इंडिया की 2024 रिपोर्ट ‘स्टोलेन फ्यूचर्स’ में गुमशुदगी को ‘चोरी हुआ भविष्य’ करार दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में 91,296 गुमशुदा बच्चों में 25 प्रतिशत यौन शोषण से जुड़े थे। कोविड के बाद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से 15 प्रतिशत मामले बढ़े, जहां बच्चे वर्चुअल ग्रूमिंग के शिकार होते हैं। संगठन ने पीओसीएसओ एक्ट को मजबूत करने और एनजीओ-सरकार साझेदारी की वकालत की है।

नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) का 2025 डैशबोर्ड रीयल-टाइम ट्रैकिंग उपलब्ध करता है अब भी ‘खोया-पाया’ और ’ट्रैक द मिसिंग चाइल्ड’ पोर्टल्स पर 50,000 से अधिक सक्रिय अनट्रेस्ड मामले दर्ज हैं। डैशबोर्ड के अनुसार, गुमशुदा पाए जाने पर 60 प्रतिशत बच्चे पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) से ग्रस्त होते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा करता है। एनसीपीसीआर ने ‘वात्सल्य’ पोर्टल लॉन्च किया है, जो मिसिंग और वल्नरेबल बच्चों की डेटाबेस रखता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर जागरूकता की कमी बाधा है।

गुमशुदगी के पीछे आर्थिक असमानता, प्रवास, शिक्षा की कमी और डिजिटल खतरे प्रमुख माने जा रहे हैं। ग्रामीण भारत में गरीबी परिवारों को मजबूर करती है, जबकि शहरीकरण तस्करों को अवसर देता है।कारणों का विश्लेषण करें तो, मानव तस्करी सबसे बड़ा खतरा है। एनसीआरबी के अनुसार, 45,000 मामले तस्करी से जुड़े हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट सीमा क्षेत्रों में नेपाल-बांग्लादेश रूट को हाइलाइट करती है। बीबीए का सर्वे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को नया आयाम देता है, जहां फेक प्रोफाइल्स से बच्चे लुभाए जाते हैं। सेव द चिल्ड्रन ने संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों (जैसे मणिपुर, कश्मीर) में विस्थापन को जोड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुरूप, केंद्र को ‘‘बाल सुरक्षा पोर्टल’’ लॉन्च करना चाहिए, जो एआई-आधारित ट्रैकिंग पर आधारित हो यूनिसेफ की सलाह पर स्कूलों में अलर्ट सिस्टम लागू हों। बीबीए ने पुलिस प्रशिक्षण पर जोर दिया है, जबकि सेव द चिल्ड्रन ने पीओसीएसओ को सख्ती से लागू करने की मांग की। एनसीपीसीआर का ‘ई-बाल निदान’ प्लेटफॉर्म शिकायत पंजीकरण को आसान बनाए। राज्य सरकारें ‘ट्रैक-चाइल्ड’ को अनिवार्य करें और एनजीओ के साथ साझेदारी बढ़ाएं।

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