उत्तराखंड से पलायन: ऐतिहासिक दृष्टिकोण
देवेंद्र के. बुडाकोटी
उत्तराखंड से पलायन कोई नई समस्या नहीं है। इसका अध्ययन 1970 के दशक से चल रहा है, पर यह मुद्दा वास्तव में तब जोर पकड़ा जब 1990 के दशक में राज्य आंदोलन ने इसे जन-जन की चिंता बना दिया। 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य बना, तब लगा था कि अब पलायन रुकेगा, लेकिन बीस साल बाद भी यह उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है। राज्य सरकार ने पलायन आयोग तक गठित किया, पर कोविड-19 के दौरान गांव लौटे हजारों प्रवासियों को पहाड़ में टिकाने के ज्यादातर प्रयास असफल ही रहे। इससे एक बात फिर साबित हुई कि पहाड़ में रोजगार और सुविधाओं के बिना लोगों को रोकना बेहद मुश्किल है।
उत्तराखंड के युवाओं का बाहर जाना दरअसल 200 साल से भी पुराना है। इसका पहला संगठित रूप 1815 में दिखा, जब गोरखाओं की हार के बाद ब्रिटिश शासन ने गोरखा रेजिमेंट में स्थानीय युवाओं की भर्ती शुरू की। इसके साथ ही असम मिलिट्री पुलिस (बाद में असम राइफल्स), कोलकाता आर्म्ड पुलिस, ढाका और बर्मी पुलिस में भी पहाड़ी नौजवान जाने लगे। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में उत्तराखंड के सैनिक यूरोप, उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया तक लड़े। कुछ ने सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भी सेवा दी।
सेना के अलावा वन विभाग (1880 के दशक में स्थापित) ने वन रक्षकों की भर्ती की, जिन्हें लोग “पैट्रोल” कहते थे। पटवारी और कानूनगो भी कई इलाकों में पुलिसिंग का काम करते रहे। ये सब स्थानीय युवाओं को घर से दूर, पर नियमित रोजगार देने वाले शुरुआती रास्ते थे।
स्वतंत्रता से पहले ही उत्तराखंड के लोग दिल्ली, लाहौर, शिमला, क्वेटा और कराची जैसे शहरों में पहुंचने लगे थे। वहां उन्होंने अपनी सभाएं बनानी शुरू कीं। दिल्ली की गढ़वाल सभा सबसे पहले 1923 में शिमला में प दर्ज हुई (तब शिमला गर्मियों की राजधानी थी), फिर 1941 में दिल्ली में प दर्ज हुई और 1958 में गढ़वाल भवन की नींव पड़ी। लाहौर और क्वेटा में भी 1923 में सर्व गढ़वाल हितैषिणी सभा बनी। इन संस्थाओं ने प्रवासियों को एकजात रखने और आपसी सहायता का मजबूत ढांचा दिया।
1911 में जब राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित हुई, तो उत्तराखंड के लोग निचले स्तर की सिविल सेवा, घरेलू नौकरियों और छोटे-मोटे कामों से दिल्ली में बसने लगे। कई लोग अशिक्षित थे, पर मेहनत से ऊपर उठे। आज यही समुदाय देश के बड़े-बड़े शहरों से लेकर लंदन, न्यूयॉर्क, सिडनी और दुबई तक फैला हुआ है और वहां उत्तराखंडी संघ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी पहचान को जीवित रखे हुए हैं।
पर इस लंबी प्रवासन परंपरा का दूसरा पक्ष भी है। गांव खाली हो रहे हैं। सैकड़ों गांवों में ताले लटक रहे हैं, घर जर्जर हो चुके हैं और “भूतिया गांव” शब्द अब कोई अतिशयोक्ति नहीं रहा।
इस समस्या का व्यावहारिक हल चाहिए। इसके लिए कृषि को लाभकारी बनाने हेतु चकबंदी (भूमि एकत्रीकरण) जरूरी है। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाकर वहां प्रशासनिक गतिविधियां शुरू की जाएं, तो पहाड़ के बीचोबीच रोजगार के नए केंद्र बन सकते हैं। जब तक पहाड़ में ही सम्मानजनक आजीविका के अवसर नहीं बनेंगे, पलायन का यह ऐतिहासिक सिलसिला रुकने वाला नहीं है।
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लेखक समाजशास्त्री हैं और विकास क्षेत्र में चार दशकों से अधिक का अनुभव रखते हैं।–Admin

