संचार साथी ऐप पर विवाद: अनिवार्य इंस्टॉलेशन से उठे गोपनीयता के सवाल
–उषा रावत/ज्योति रावत-
स्मार्टफोन आज निजी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं। इन्हीं के बीच केंद्र सरकार की ओर से सभी नए मोबाइल फोनों में ‘संचार साथी’ ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने के निर्देश ने उपभोक्ताओं और टेक कंपनियों दोनों के बीच नई बहस खड़ी कर दी है। सरकार का दावा है कि ऐप उपयोगी है और उपभोक्ता चाहें तो इसे बाद में हटाया जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी ऐप को अनिवार्य रूप से फोन में डालना तकनीकी स्वतंत्रता और गोपनीयता दोनों के लिए चिंताजनक है।
सरकार के अनुसार जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ यह ऐप चोरी हुए मोबाइल फोनों को ब्लॉक और ट्रैक करने के लिए बनाया गया था। अब तक ऐप 96 हजार से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है और इसके जरिए सरकार का दावा है कि यह 71 लाख से अधिक फोनों की शिकायतों में सहायक रहा है। इसके अलावा ऐप की मदद से 3.6 लाख से अधिक चोरी हुए मोबाइल लोकेट हुए और 36 हजार से अधिक फोनों की रिकवरी की गई है। इन आँकड़ों ने इसकी उपयोगिता को साबित तो किया है, लेकिन अनिवार्य इंस्टॉलेशन को नहीं।
तकनीकी विशेषज्ञों का तर्क है कि किसी भी ऐप को जबरन फोन के सॉफ्टवेयर में शामिल करना कई जोखिम पैदा करता है। प्री-इंस्टॉल्ड ऐप्स अक्सर बैकग्राउंड में ऐसी अनुमतियाँ ले लेते हैं जिनका उपयोगकर्ता को पता भी नहीं होता—जैसे लोकेशन, संपर्क सूची, कॉल लॉग और कभी-कभी संदेशों तक पहुँच। गोपनीयता विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अधिकार किसी भी ऐप को एक संभावित निगरानी उपकरण में बदल सकते हैं, चाहे उसकी मंशा अच्छी ही क्यों न हो।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP) सरकार को कुछ छूट तो देता है, लेकिन सहमति और डेटा उपयोग के बुनियादी सिद्धांतों से सरकार भी पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। यही कारण है कि तकनीकी कंपनियाँ इस आदेश का विरोध कर रही हैं। Apple जैसी कंपनियों का कहना है कि वे अपनी गोपनीयता नीतियों के अनुसार किसी भी बाहरी ऐप को जबरन सिस्टम में शामिल नहीं कर सकतीं, क्योंकि इससे फोन की सुरक्षा, प्रदर्शन और उपयोगकर्ता के अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है। इससे सरकार और कंपनियों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है, जिसका असर मोबाइल बाजार और उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा बढ़ाने के लिए सरकार के पास बेहतर विकल्प मौजूद थे। उदाहरण के लिए, पहले से काम कर रही Central Equipment Identity Register (CEIR) प्रणाली को मजबूत किया जा सकता था, जो चोरी हुए फोन को नेटवर्क स्तर पर ब्लॉक करती है। इसके अलावा IMEI-सिम मिसमैच जैसी गतिविधियों को पहचानने के लिए नेटवर्क-आधारित मॉडल भी विकसित हो सकते थे। इन तरीकों से सुरक्षा भी सुनिश्चित होती और उपयोगकर्ता की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहती।
दरअसल, समस्या ऐप के अस्तित्व में नहीं, बल्कि इसके थोपे जाने में है। सुरक्षा तभी स्वीकार्य होती है जब वह पारदर्शी, स्वैच्छिक और उपयोगकर्ता की सहमति पर आधारित हो। किसी भी प्री-इंस्टॉल्ड ऐप को हटाना सामान्य उपभोक्ता के लिए मुश्किल होता है, और उसकी पृष्ठभूमि में काम करने वाली अनुमतियों पर नियंत्रण लगभग असंभव।
‘संचार साथी’ एक उपयोगी ऐप हो सकता है, लेकिन इसे अनिवार्य रूप से फोन में डालना लोकतांत्रिक तकनीकी सिद्धांतों के विपरीत है। तकनीक नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी निजता और चयन के अधिकार को भी सुरक्षित रखनी चाहिए। सुरक्षा और गोपनीयता दोनों एक साथ चल सकती हैं—बस नीति में संतुलन और पारदर्शिता होनी चाहिए।
