बाघ भी चढ़ने लगे हिमालय की ऊंचाईयां ; अब तक यह इलाका गुलदार का है
बंगाल टाइगर पहली बार 10 हजार फीट पर दिखा: क्या बदल रहा है हिमालय का वन्य-परिदृश्य?
-उषा रावत –
बागेश्वर। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में सुन्दरढूंगा ग्लेशियर घाटी में लगभग 9,875 फीट की ऊंचाई पर एक बंगाल टाइगर का पहली बार पुष्टि किया गया दर्शन हुआ है। कैमरा ट्रैप में कैद हुई यह तस्वीर राज्य में अब तक की सबसे ऊंचाई वाली टाइगर साइटिंग है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और उत्तराखंड वन विभाग द्वारा हिमालयी पारिस्थितिकी और बर्फ से ढके ऊँचे इलाकों में जैव विविधता के संरक्षण पर चल रहे संयुक्त अध्ययन के दौरान यह तस्वीर रिकॉर्ड हुई।
उच्च हिमालय में बाघ की उपस्थिति: बदलती जलवायु का संकेत
डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) आदित्य राणा के अनुसार, इतनी ऊंचाई पर बाघ का मिलना इस बात का संकेत है कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण बाघ जैसे बड़े मांसाहारी जीव अब नए क्षेत्रों में अपनी मूवमेंट बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि—
“उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बाघ का मिलना दर्शाता है कि तेंदुआ, बाघ और हिम तेंदुए जैसे बड़े शिकारी अब अपने इलाकों में ओवरलैप कर रहे हैं। यह व्यवहार संभवतः मौसमीय बदलावों, तापमान में वृद्धि और आवासीय दबाव के कारण है।”
वन अधिकारियों ने बताया कि कैमरा ट्रैप में वयस्क बाघ घने सब-अल्पाइन जंगलों के बीच चलता दिखा, और उसके ताजा मल व स्थानीय जानकारी से भी उसकी उपस्थिति की पुष्टि हुई।
पहले भी मिलीं ऊँचाई पर उपस्थिति के संकेत
उत्तराखंड में इससे पहले भी ऊँचाई पर बाघ दिखने की सूचनाएँ मिल चुकी हैं—
- 2016 में अस्कोट मस्क डियर सैंक्चुअरी में 10,700 फीट पर
- 2019 में केदारनाथ वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में 11,155 फीट पर
हालांकि, बागेश्वर की यह साइटिंग अब तक की सबसे विश्वसनीय और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मानी जा रही है।
अन्य हिमालयी वन्यजीव भी दिखे
इसी अध्ययन के दौरान पिंडारी, कफनी और सुन्दरढूंगा घाटियों में लगाए गए 55 कैमरा ट्रैपों में—
- हिमालयन सेरो
- घोरल
- बार्किंग डियर
- सांभर
जैसे कई वन्यजीव भी ऊँचाई पर दर्ज किए गए। यह संकेत है कि हिमालय के ऊँचे जंगल अब वन्यजीवों का महत्वपूर्ण आवास बनते जा रहे हैं।
हाई-एल्टीट्यूड इकोसिस्टम की चुनौती
वन शोधकर्ता कपिल जोशी के अनुसार, “10,000 फीट की ऊँचाई वाले क्षेत्रों तक पहुँचना बेहद कठिन है। खड़ी ढलानों, कठोर मौसम और सीमित बुनियादी ढांचे के कारण यहाँ अध्ययन करना एक चुनौती है, लेकिन इसी वजह से यह शोध और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।”
जोशी बताते हैं कि राष्ट्रीय हरित भारत मिशन के तहत चल रहा यह दीर्घकालिक अध्ययन हिमालयी जैव विविधता के संरक्षण और भविष्य की वन्यजीव नीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
क्या हिमालय में स्थायी टाइगर हैबिटेट बन सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बाघ इस तरह ऊँचाई का रुख कर रहे हैं, तो आने वाले वर्षों में हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में भी स्थायी टाइगर पॉपुलेशन बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, इसके लिए जरूरी है—
- दीर्घकालिक वैज्ञानिक निगरानी
- समुदाय आधारित संरक्षण
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण
यह खोज हिमालय में बदलते वन्यजीव व्यवहार और तेजी से बदलते पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को समझने की दिशा में एक बड़ा वैज्ञानिक कदम मानी जा रही है।
