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महिलाओं को नकद हस्तांतरण: 5 साल में 1 से 15 राज्यों तक पहुँचा यह चुनावी और कल्याणकारी मॉडल

-उषा रावत-

​पिछले पाँच वर्षों में भारत की कल्याणकारी राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। साल 2020 में जहाँ केवल एक राज्य (असम) महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण (Unconditional Cash Transfer – UCT) की योजना चला रहा था, वहीं आज यह संख्या बढ़कर 15 राज्यों तक पहुँच गई है।

​नकद हस्तांतरण की मुख्य बातें:

  • बजट में भारी उछाल: साल 2020 में इन योजनाओं पर खर्च होने वाली राशि करीब 1,600 करोड़ रुपये थी, जो 2025 तक बढ़कर 2.46 लाख करोड़ रुपये हो गई है। यह उछाल इतना बड़ा है कि अब यह देश के सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को टक्कर दे रहा है।
  • लाभार्थियों की संख्या: वित्त वर्ष 2026 तक, भारत की लगभग 13 करोड़ महिलाओं (देश की कुल महिला आबादी का करीब 20%) के बैंक खातों में सीधे पैसे पहुँचने का अनुमान है।
  • प्रमुख योजनाएं: विभिन्न राज्यों में ये योजनाएं अलग-अलग नामों से चल रही हैं, जैसे:
    • मध्य प्रदेश: लाड़ली बहना योजना (₹1,250 – ₹1,500 प्रतिमाह)
    • कर्नाटक: गृह लक्ष्मी योजना (₹2,000 प्रतिमाह)
    • तेलंगाना: महालक्ष्मी योजना (₹2,500 प्रतिमाह + फ्री बस यात्रा)
    • महाराष्ट्र: लाडकी बहिन योजना
    • दिल्ली, झारखंड, और तमिलनाडु में भी इसी तरह की मासिक सहायता दी जा रही है।

​इसका समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:

  1. महिलाओं की शक्ति में वृद्धि: रिपोर्ट के अनुसार, भले ही राशि कम हो (₹1,000 से ₹2,500 के बीच), लेकिन इससे महिलाओं की घर के भीतर खर्च करने की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता (Bargaining Power) बढ़ी है।
  2. खर्च की प्राथमिकताएं: शोध बताते हैं कि महिलाएँ इस पैसे का उपयोग मुख्य रूप से पोषण (भोजन), बच्चों की शिक्षा की फीस, स्वास्थ्य और बिजली/गैस के बिल भरने के लिए कर रही हैं।
  3. राज्यों के खजाने पर दबाव: कई राज्यों में इन योजनाओं का खर्च उनके सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 2-3% तक पहुँच गया है। इससे स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचों के लिए बजट कम होने की चिंता भी जताई गई है।

वोट बैंक मॉडल:

​”महिला के खाते में नकद” अब केवल एक चुनावी वादा नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का एक नया ‘वोट बैंक मॉडल’ बन गया है। राजनीतिक दल अब ‘सड़क-बिजली-पानी’ से आगे बढ़कर सीधे आर्थिक सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं।

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