आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद का संगम: अल्जाइमर के विरुद्ध शोध में बड़ी सफलता

A groundbreaking study led by researchers at the Bose Institute, Kolkata, has unveiled a dual-pronged strategy to combat Alzheimer’s disease (AD), offering a glimmer of hope for millions worldwide. By combining cutting-edge synthetic chemistry with the ancient insights of Ayurveda, the team has discovered a more effective way to dismantle the toxic proteins responsible for neurodegeneration.

–ज्योति रावत –
कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं के एक हालिया अध्ययन ने न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों (जैसे अल्जाइमर और डिमेंशिया) के उपचार में एक क्रांतिकारी राह दिखाई है। प्रोफेसर अनिरबन भुनिया और उनकी टीम ने इस जटिल बीमारी से लड़ने के लिए आधुनिक रसायन विज्ञान और प्राचीन आयुर्वेद को एक साथ लाकर एक “मल्टी-प्रोन्ग्ड” (बहुआयामी) दृष्टिकोण पेश किया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि LG WE (लसुनाद्य घृत जल अर्क) एमिलॉयड प्रोटीन के ‘ओलिगोमर्स’ (शुरुआती जहरीले गुच्छे) को ही खत्म कर देता है। इसका मतलब है कि अगर हम अपनी जीवनशैली में इन प्राकृतिक तत्वों को पहले से शामिल रखें, तो हम भविष्य में होने वाले नुकसान से बच सकते हैं।
मस्तिष्क का ‘दुश्मन’: एमिलॉयड बीटा
अल्जाइमर रोग का मुख्य कारण मस्तिष्क में एमिलॉयड-बीटा (Aβ) नामक प्रोटीन का जमा होना है। ये प्रोटीन आपस में जुड़कर जहरीले गुच्छे (fibrils) बना लेते हैं, जो याददाश्त और मस्तिष्क की कार्यक्षमता को नष्ट कर देते हैं। इस समस्या को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग रणनीतियों पर काम किया:
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सिंथेटिक विधि: प्रयोगशाला में छोटे पेप्टाइड्स (अणु) तैयार किए गए ताकि प्रोटीन को इकट्ठा होने से रोका जा सके।
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आयुर्वेदिक विधि: पारंपरिक औषधि ‘लसुनाद्य घृत’ (LG) का परीक्षण किया गया, जिसका उपयोग प्राचीन काल से मानसिक विकारों के इलाज में होता आया है।
शोध के चौंकाने वाले परिणाम
प्रतिष्ठित जर्नल बायोकेमिस्ट्री (ACS) में प्रकाशित यह शोध बताता है कि प्राकृतिक उपचार आधुनिक सिंथेटिक दवाओं को कड़ी टक्कर दे रहे हैं:
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जहरीले गुच्छों का खात्मा: शोध में पाया गया कि ‘लसुनाद्य घृत’ (LG) का जल अर्क न केवल एमिलॉयड प्रोटीन को बनने से रोकता है, बल्कि यह पहले से मौजूद जहरीले गुच्छों को छोटे, सुरक्षित और गैर-विषाक्त टुकड़ों में तोड़ने में भी माहिर है।
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नेचुरल बनाम केमिकल: हालांकि लैब में बने पेप्टाइड्स प्रभावी थे, लेकिन आयुर्वेदिक यौगिक एमिलॉयड को विघटित करने में अधिक शक्तिशाली साबित हुए।
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प्रारंभिक चरण में सुरक्षा: यह अर्क बीमारी के शुरुआती चरणों में ही प्रोटीन के जहरीलेपन को रोकने की क्षमता रखता है।
विशेषज्ञों का साझा प्रयास
यह सफलता किसी एक संस्थान की नहीं, बल्कि भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थानों के सामूहिक परिश्रम का परिणाम है:
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बोस इंस्टीट्यूट, कोलकाता
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साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स (SINP), कोलकाता
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IIT-गुवाहाटी
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राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज और अस्पताल, लखनऊ विश्वविद्यालय (प्रोफेसर डॉ. संजीव रस्तोगी के नेतृत्व में)
भविष्य की राह: आशा की नई किरण
यह शोध केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि अल्जाइमर से जूझ रहे करोड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की एक किरण है। यह साबित करता है कि:
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भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में आधुनिक लाइलाज बीमारियों का समाधान छिपा हो सकता है।
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प्राकृतिक उपचारों के माध्यम से डिमेंशिया के रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
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भविष्य में ऐसी दवाएं विकसित की जा सकती हैं जो प्रभावी होने के साथ-साथ सुरक्षित और कम विषाक्त हों।
“प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक तकनीक का यह मिलन चिकित्सा जगत में एक नए युग की शुरुआत कर सकता है।”
यहाँ कुछ सरल और प्रभावी सुझाव दिए गए हैं जो शोध के निष्कर्षों और सामान्य स्वास्थ्य ज्ञान पर आधारित हैं:
1. आहार में ‘आयुर्वेदिक’ तत्वों को शामिल करें
शोध में ‘लसुनाद्य घृत’ का जिक्र है, जिसका मुख्य आधार लहसुन (Garlic) और घी है।
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लहसुन: इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं।
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घी (सीमित मात्रा में): आयुर्वेद में घी को ‘मेध्य’ (बुद्धि बढ़ाने वाला) माना गया है, जो नसों को पोषण देता है।
2. मस्तिष्क के ‘प्रोटीन क्लीनिंग’ पर ध्यान दें
अल्जाइमर तब होता है जब मस्तिष्क खुद की सफाई ठीक से नहीं कर पाता। इसे बेहतर करने के लिए:
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गहरी नींद (Deep Sleep): सोते समय हमारे मस्तिष्क का ‘ग्लाइम्फैटिक सिस्टम’ सक्रिय होता है, जो एमिलॉयड जैसे जहरीले प्रोटीन को बाहर निकालता है।
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हल्दी का उपयोग: हल्दी में मौजूद ‘करक्यूमिन’ एमिलॉयड गुच्छों को बनने से रोकने में सहायक माना गया है।
3. ‘मल्टी-प्रोन्ग्ड’ जीवनशैली अपनाएं
वैज्ञानिकों ने जैसे दोहरी रणनीति अपनाई, आप भी अपनी दिनचर्या में दो चीज़ें जोड़ें:
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मानसिक कसरत: पहेलियाँ सुलझाना, नई भाषा सीखना या कोई वाद्य यंत्र (Musical Instrument) बजाना न्यूरॉन्स के बीच के संपर्क को मजबूत रखता है।
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शारीरिक गतिविधि: रोज़ाना 30 मिनट की पैदल सैर मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ाती है।
4. तनाव प्रबंधन (Stress Management)
‘लसुनाद्य घृत’ का उपयोग पहले अवसाद (Depression) के लिए होता था। तनाव मस्तिष्क में सूजन (Inflammation) पैदा करता है, जो अल्जाइमर का जोखिम बढ़ाता है। योग और प्राणायाम इसमें काफी मददगार हो सकते हैं।
