राजा जगतदेव: बुक्सा जनजाति के गौरव और ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक
-उषा रावत-
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा कल 2 जनवरी को राजा जगतदेव की प्रतिमा का वर्चुअल अनावरण किया गया, जिसने तराई की प्राचीन बुक्सा जनजाति के गौरवशाली इतिहास को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। यह आयोजन केवल एक प्रतिमा का अनावरण नहीं, बल्कि उस वीर गाथा को सम्मान देना है जो सदियों से इस क्षेत्र की मिट्टी में रची-बसी है।

वीर जगतदेव: धारानगरी से तराई तक का सफर
राजा जगतदेव, जिन्हें लोककथाओं में ‘वीर जगदेव पंवार’ कहा जाता है, मालवा की प्रसिद्ध धारानगरी के परमार (पंवार) वंश के राजा उदयादित्य के पुत्र थे। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, पारिवारिक विवाद और षड्यंत्रों के कारण उन्होंने मालवा का त्याग किया और उत्तर भारत की ओर प्रस्थान किया। बुक्सा समुदाय स्वयं को उन्हीं का वंशज मानता है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक जयसिंह रावत, जिन्होंने उत्तराखंड की जनजातियों पर ‘उत्तराखंड की जनजातियां का इतिहास’ और ‘ बदलते दौर से गुजरती जनजातियां ‘ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, उनके शोध भी बुक्सा समुदाय के इस संबंध और उनके विशिष्ट सामाजिक ढांचे पर प्रकाश डालते हैं।
बुक्सा: उत्तराखंड की दूसरी ‘आदिम जाति’
उत्तराखंड की पाँच जनजातियों (थारू, जौनसारी, भोटिया, राजी और बुक्सा) में से बुक्सा का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।
- PVTG दर्जा: राजी जनजाति के बाद बुक्सा ही उत्तराखंड की वह दूसरी जाति है जिसे भारत सरकार द्वारा ‘आदिम जनजाति’ (Particularly Vulnerable Tribal Group) घोषित किया गया है। यह दर्जा उनकी विशिष्ट संस्कृति और उनके संरक्षण की आवश्यकता को दर्शाता है।
- बसावट: मुख्य रूप से ऊधमसिंह नगर के ‘बुक्सार’ क्षेत्र, नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल और देहरादून के कुछ हिस्सों में निवास करने वाली यह जनजाति आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।

सांस्कृतिक वैभव और ‘बिरादरी पंचायत’
बुक्सा जनजाति की संस्कृति में राजा जगतदेव का स्थान सर्वोपरि है। वे उन्हें न केवल अपना पूर्वज बल्कि एक देवता के रूप में पूजते हैं।
- धार्मिक विश्वास: ये लोग हिंदू धर्म के अनुयायी हैं और काशीपुर की चैती देवी (बाल सुंदरी) को अपनी कुलदेवी मानते हैं।
- सामाजिक व्यवस्था: बुक्सा समाज की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘बिरादरी पंचायत’ है। यह एक अत्यंत अनुशासित राजनीतिक और सामाजिक संगठन है, जिसका नेतृत्व ‘तख्त’, ‘मुन्सिफ’, ‘दरोगा’ और ‘सिपाही’ जैसे पदों द्वारा किया जाता है।
- खान-पान और भाषा: मछली और चावल इनका मुख्य भोजन है। इनकी भाषा पर कुमाऊँनी, गढ़वाली और हिंदी का प्रभाव दिखता है, जिसे ‘बुक्साड़ी’ भी कहा जाता है।
इतिहास का पुनर्जागरण
जयसिंह रावत की पुस्तकों के अनुसार, बुक्सा जनजाति ने तराई के दुर्गम इलाकों को कृषि योग्य बनाया और अपनी एक स्वतंत्र पहचान कायम रखी। राजा जगतदेव की प्रतिमा की स्थापना इसी ऐतिहासिक स्वाभिमान को मान्यता देने का एक प्रयास है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह कदम नई पीढ़ी को उनके उस इतिहास से जोड़ेगा जो मालवा के राजमहलों से शुरू होकर हिमालय की तलहटी तक फैला हुआ है।

