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धार्मिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों पर देहरादून में राउंड टेबल डायलाॅग

 

देहरादून, 9 जनवरी : देहरादून स्थित ​वर्ल्ड इंटेग्रिटी सेंटर में सशस्त्र सैनिक एवं अर्धसैनिक बल समुदाय उत्तराखंड के विभिन्न वेटरन्स संगठनों तथा एसडीसी फाउंडेशन उत्तराखंड के संयुक्त तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण राउंड टेबल डायलॉग का आयोजन किया गया।

इस राउंड टेबल डायलाॅग का विषय *धार्मिक सद्भाव, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक समरसता* रहा। कार्यक्रम में देहरादून शहर के सैनिक एव अर्धसैनिक वेटरन्स, विभिन्न सामाजिक वर्गों, व्यवसायों, आयु समूहों, धर्मों तथा महिलाओं सहित प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की।

चर्चा का उद्देश्य समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच संवाद, आपसी समझ और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना रहा। ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त (पहाड़ी) डंगवाल और सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल विमर्श के सह-संयोजक थे।

कार्यक्रम में आईजी एस.एस. कोठियाल, मधुरलता अग्रवाल, अनिता नौटियाल, सुजाता पॉल मालिहा, कर्नल राजीव रावत, लेफ्टिनेंट कर्नल कैलाश चंद्र देवरानी, हवलदार निरंजन सिंह चौहान, सोलोमन दास, जितेंद्र सहरावत, डॉक्टर अपूर्व मवाई और दिनेश चंद्र उपस्थित रहे।

वक्ताओं ने कहा कि भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि संविधान, नैतिकता और सह-अस्तित्व पर आधारित एक विचार है। भारतीय संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देता है और देश की धर्मनिरपेक्ष भावना स्वतंत्रता के समय से ही इसकी मूल आत्मा रही है।

चर्चा के दौरान इस बात पर सहमति बनी कि आज के दौर में समस्या धर्म से नहीं बल्कि उसके राजनीतिक दुरुपयोग से हो रही है। धर्म का उद्देश्य मानवता, करुणा और आत्मसंयम है, लेकिन जब इसका उपयोग भय और नफरत फैलाने के लिए किया जाता है, तो समाज में विभाजन बढ़ता है।

राउंड टेबल डायलॉग में स्पष्ट किया गया कि यह बैठक किसी निष्कर्ष को थोपने या किसी आस्था पर निर्णय देने के लिए नहीं, बल्कि उन सामाजिक प्रश्नों पर संवाद स्थापित करने के लिए आयोजित की गई है, जिन पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं हो पाती। हिंदू धर्म और हिंदुत्व के अंतर पर भी विचार रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदू धर्म एक प्राचीन, उदार और प्रश्नशील परंपरा है, जबकि हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा है। इस अंतर को न समझना सामाजिक भ्रम और तनाव का कारण बन रहा है।

पूर्व सैनिक समुदाय की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि वर्दी किसी धर्म की नहीं, बल्कि संविधान की होती है। युद्धभूमि पर कोई हिंदू या मुस्लिम नहीं, बल्कि केवल भारतीय सैनिक होता है। इसलिए धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति का सैन्य मूल्यों से कोई मेल नहीं है।

मीडिया, नागरिक समाज और बौद्धिक वर्ग से भी आत्ममंथन करने का आह्वान किया गया। यह कहा गया कि समाज में संतुलन, विवेक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए सभी वर्गों को जिम्मेदारी निभानी होगी।

राउंड टेबल डायलॉग का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि गणराज्य आस्था से नहीं डरता, बल्कि आस्था के नाम पर विवेक के त्याग से डरता है। परिचर्चा के अंत में यह निर्णय लिया गया कि इस संवाद को आगे भी जारी रखा जाएगा और कार्यशालाओं व नागरिक सहभागिता के माध्यम से उत्तराखंड राज्य में वेटरन्स और समाज के बीच में सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक चेतना को मजबूत करने के और प्रयास किए जाएंगेे ।

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