प्रकाश-सक्रिय प्राकृतिक प्रोटीन: इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के भविष्य को नया रूप देने की तैयारी
The researchers discovered that these proteins naturally arrange themselves into thin, sheet-like structures. When UV light shines on them, tiny electrical charges begin to move across the protein surface. This happens because the proteins contain tyrosine, a natural amino acid that can release electrons when excited by light. As these electrons and protons move, the protein sheet produces an electrical signal—similar to how a miniature solar cell would operate. This light-driven effect relies on the protein’s internal order and does not require any synthetic additives or high-temperature manufacturing.

-ज्योति रावत-
एक ज्ञात बैक्टीरिया शैल (shell) प्रोटीन के भीतर खोजे गए नए सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) गुण, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यह तकनीक मोबाइल फोन और स्मार्ट वॉच से लेकर चिकित्सा उपकरणों और पर्यावरणीय सेंसर तक के भविष्य को बदल सकती है।
पारंपरिक सामग्रियों की सीमाएं और विकल्प
सिलिकॉन जैसी पारंपरिक सेमीकंडक्टर सामग्रियां तकनीक के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। वे कठोर होती हैं, उनके प्रसंस्करण के लिए उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और वे इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste) की समस्या को बढ़ाती हैं। इसलिए, आज टिकाऊ, लचीले और जैव-अनुकूल (biocompatible) इलेक्ट्रॉनिक्स की मांग बढ़ रही है।
INST मोहाली की महत्वपूर्ण खोज
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान, नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (INST), मोहाली के वैज्ञानिकों की एक टीम ने ‘सेल्फ-असेंबलिंग’ बैक्टीरियल शैल प्रोटीन पर शोध किया। उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या वे प्रोटीन, जो स्वाभाविक रूप से स्थिर और सपाट 2D शीट बनाते हैं, प्रकाश के प्रति संवेदनशील (photoactive) हो सकते हैं।
डॉ. शर्मिष्ठा सिन्हा के नेतृत्व में इस टीम ने पाया कि जब ये प्रोटीन पतली फिल्म या शीट के रूप में व्यवस्थित होते हैं, तो वे यूवी (UV) प्रकाश को सोख लेते हैं और बिना किसी बाहरी धातु, रंग या बिजली के स्रोत के विद्युत प्रवाह उत्पन्न करते हैं। यह ठीक वैसा ही काम करता है जैसा इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में उपयोग होने वाले सेमीकंडक्टर करते हैं।
यह कैसे काम करता है?
शोधकर्ताओं ने पाया कि इन प्रोटीनों में टायरोसिन (Tyrosine) नामक एक प्राकृतिक अमीनो एसिड होता है। जब इन पर यूवी प्रकाश पड़ता है, तो टायरोसिन उत्तेजित होकर इलेक्ट्रॉन छोड़ता है। जैसे ही ये इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन प्रोटीन की सतह पर चलते हैं, एक विद्युत संकेत उत्पन्न होता है—ठीक वैसे ही जैसे एक छोटा सौर सेल (Solar Cell) काम करता है। इस प्रक्रिया में किसी कृत्रिम सामग्री या उच्च तापमान वाले निर्माण की आवश्यकता नहीं होती।
भविष्य के उपयोग और लाभ
यह खोज वास्तविक दुनिया के लिए कई रोमांचक संभावनाएं खोलती है:
पहनने योग्य उपकरण: शरीर के अनुकूल होने के कारण, इसका उपयोग स्वास्थ्य मॉनिटर और त्वचा के लिए सुरक्षित यूवी-डिटेक्शन पैच बनाने में किया जा सकता है।
चिकित्सा प्रत्यारोपण: ऐसे सेंसर जो मानव शरीर के अंदर सुरक्षित रूप से काम कर सकें।
पर्यावरण अनुकूल: प्रदूषण का पता लगाने वाले ऐसे सेंसर जो उपयोग के बाद पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना स्वतः नष्ट (biodegradable) हो सकें।
वैज्ञानिक पुष्टि
रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के जर्नल ‘केमिकल साइंस‘ में प्रकाशित इस अध्ययन के लिए, INST की टीम ने उन्नत सूक्ष्मदर्शी (microscopes) और नियंत्रित विद्युत परीक्षणों का उपयोग किया। उन्होंने पुष्टि की कि यह सेमीकंडक्टर जैसा व्यवहार प्रोटीन की विशेष संरचना और उसके भीतर टायरोसिन की सटीक स्थिति पर निर्भर करता है।
‘बायो–प्रेरित इलेक्ट्रॉनिक्स‘
यह शोध ‘बायो–प्रेरित इलेक्ट्रॉनिक्स‘ की दिशा में एक बड़ा कदम है। प्रकृति के तंत्रों से सीखकर बनाई गई यह सामग्री न केवल कुशल है, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ भी है। यह कम लागत वाले डिटेक्टरों और सुरक्षित चिकित्सा उपकरणों के लिए एक नया रास्ता खोलती है।
