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तुलसीदास और मीराबाई की मुलाकात का एक प्रसंग

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
तुलसीदास जी अपनी जवानी के दिनों अपनी पत्नी की बेरुखी से खिन्न थे ,यह किस्सा सबको मालूम है,वही गति मीराबाई की भी थी , दोनों एक ही नाव के सहयात्री जैसे थे।
एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से भेंट करने की इच्छा प्रकट की तो उन्हें पत्र भेजा कि मैं आपसे मिलना चाहती हूं, बताइए कब आ सकती हूं ? तब तुलसीदास जी ने बड़ा रुखा सा जबाब लिख भेजा कि मैं स्त्रियों से अब नहीं मिलता । मीराबाई ने भी फिर उसी शैली में करारा जबाब लिख भेजा कि मैं तो आपको भी स्त्री समझती थी क्योंकि मेरी नजर में *पुरूष* शब्द तो सिर्फ भगवान के लिए ही प्रयोग होता है, मेरी दृष्टि में तो पुरुष एक ही है और वह है भगवान श्रीकृष्ण. बाकी सब लिंग मात्र हैं।… तुलसीदास जी मीराबाई के इस उत्तर को पाकर बहुत शर्मिन्दा हुए फिर उन्होने क्षमा प्रार्थना के साथ मीराबाई को मिलने का निमंत्रण भेज दिया। होता है।
मीराबाई के इस उत्तर का संदर्भ संभवतः
श्रीमद्भागवत के इस मंगलाचरण से जुड़ा हुआ है। तुलसीदास जी तो विद्वान पुरुष थे उन्हें जरूर श्रीमद्भागवत की यह स्तुति याद आ गई होगी जो
वेद व्यास जी के पुत्र शुकदेव ने श्रीकृष्ण के प्रति की थी-
नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे
सदुद्‍भवस्थाननिरोधलीलया ।
गृहीतशक्तित्रितयाय देहिनां
अंतर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने ॥ ”
“उन पुरुषोत्तम भगवान के चरण कमलों में मैं कोटि कोटि प्रणाम करता हूं…..
श उपरोक्त स्तुति में *पुरुष* शब्द का प्रयोग हुआ है जिसमें स्त्रीलिंग और पुलिंग दोनों शामिल हैं । मेरे विचार से यह वैदिक शब्द अंग्रेजी का PERSON शब्द का पर्यायवाची भी है । कानून की भाषा में PERSON स्त्री-पुरुष पुरुष दोनों के लिए प्रयुक्त होता है । वेद में पुरुष शब्द आत्मा के लिए प्रयोग हुआ है । …
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