कालीमठ की मां कालीमाई की पदयात्रा खांखरा पहुंची
- भक्तों को दिया आशीर्वाद, 13 जनवरी को देवप्रयाग संगम स्नान के बाद होगी वापसी
- 15 वर्ष बाद आयोजित हो रहा है यह ऐतिहासिक धार्मिक अनुष्ठान
श्रीनगर, 10 जनवरी। सिद्धपीठ कालीमठ की आराध्य देवी मां कालीमाई की डोली देवप्रयाग में संगम स्नान हेतु निकाली गई ऐतिहासिक पदयात्रा के तहत शनिवार को खांखरा पहुंची। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पारंपरिक विधि-विधान के साथ देवडोली को अर्घ्य अर्पित किया, अपनी मनोकामनाएं मांगीं और देवी से आशीर्वाद प्राप्त किया। डोली का रात्रि प्रवास खांखरा में रहा, जबकि पदयात्रा रविवार को धारीदेवी होते हुए श्रीकोट–श्रीनगर पहुंचेगी।
कालीमठ पंचगांई देवरा यात्रा समिति के अध्यक्ष लखपत सिंह राणा ने देवभूमि की जनता से आगामी कार्यक्रमों में अधिकाधिक संख्या में सहभागिता का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह पदयात्रा आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
भगवती कालीमाई कालीमठ वाली की यह ऐतिहासिक देवरा पदयात्रा 7 दिसंबर से आरंभ हुई थी, जो लगभग 15 वर्ष बाद पुनः आयोजित की जा रही है। यात्रा के दौरान जिन गांवों, कस्बों और नगरों से डोली गुजर रही है, वहां श्रद्धालु पारंपरिक अर्घ्य, ढोल-दमाऊ, रणसिंघा और भक्तिगीतों के साथ भव्य स्वागत कर रहे हैं।
गांव-गांव पहुंची माता की डोली
श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति एवं ऊखीमठ के मार्गदर्शन में, कालीमाई पंचगांई समिति, कालीमठ द्वारा आयोजित इस पदयात्रा के दौरान माता की डोली कालीमठ, कविल्ठा, कोटमा, खोनू, चिल्लोंड, जाल मल्ला, चौमासी, जाल तल्ला, रूच्छ महादेव, स्यांसूगढ़, ब्यूंखी, कुणजेठी एवं बेडुला सहित अनेक गांवों में घर-घर जाकर श्रद्धालुओं को दर्शन देती रही।
इसके पश्चात यात्रा मनसूना, गैड गडगू, चुन्नी, मंगोली, ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर, चन्द्रापुरी, अगस्त्यमुनि और तिलवाड़ा (रुद्रप्रयाग) होते हुए खांखरा पहुंची। मार्ग में श्रद्धालु जौ, तिल, चावल, अन्न, मौसमी फल और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ मां की आराधना कर रहे हैं।
13 जनवरी को देवप्रयाग संगम स्नान
समिति के अनुसार पदयात्रा 13 जनवरी को देवप्रयाग पहुंचेगी, जहां अलकनंदा-भागीरथी संगम में विधिवत स्नान के बाद माता की डोली की वापसी होगी।
समिति अध्यक्ष लखपत सिंह राणा ने यात्रा की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह पदयात्रा केवल कालीमठ या पंचगांई क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि समूची देवभूमि की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
वहीं, समिति के महामंत्री सुरेशानंद गौड़ ने कहा कि इस पदयात्रा ने न केवल आध्यात्मिक चेतना को सुदृढ़ किया है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक संवाद और सांस्कृतिक एकता को भी नई ऊर्जा प्रदान की है। यात्रा में बड़ी संख्या में हक-हकूकधारी और भक्तजन सक्रिय सहभागिता कर रहे हैं।
