भूकंप के बाद हिमस्खलन: उत्तराखंड के लिए एक अदृश्य और गंभीर खतरा
THE HIMALAYAS ARE AMONG THE WORLD’S YOUNGEST AND MOST ACTIVE MOUNTAIN SYSTEMS, MAKING UTTARAKHAND HIGHLY VULNERABLE TO CASCADING DISASTERS. EARTHQUAKES, LANDSLIDES, AND CLOUDBURSTS OFTEN TRIGGER ONE ANOTHER. A RECENT STUDY IN THE IMD JOURNAL ‘MAUSAM’ HIGHLIGHTS A PREVIOUSLY OVERLOOKED DANGER: DELAYED AVALANCHES OCCURRING 38–76 HOURS AFTER MODERATE-INTENSITY EARTHQUAKES. THESE QUAKES CREATE MICRO-CRACKS IN SNOW LAYERS THAT SLOWLY SPREAD, DESTABILIZING SLOPES OVER TIME. SURPRISINGLY, MODERATE TREMORS (BELOW 5.0 MAGNITUDE) ARE MORE LIKELY TO TRIGGER AVALANCHES THAN STRONGER ONES. INTENSE SHOCKS MAY COMPACT SNOW, WHILE MODERATE VIBRATIONS FORM HIDDEN FRACTURES THAT EVENTUALLY LEAD TO COLLAPSE.

— जयसिंह रावत
हिमालय केवल गगनचुंबी शिखर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर सबसे सक्रिय और युवा पर्वत तंत्रों में से एक है। उत्तराखंड इस तंत्र का सबसे संवेदनशील हिस्सा है, जहाँ भूकंप, भूस्खलन और बादल फटना जैसी आपदाएँ अक्सर एक-दूसरे की पूरक बन जाती हैं। हाल ही में हुए वैज्ञानिक शोधों ने एक ऐसे खतरे की ओर इशारा किया है जिसे अब तक नजरअंदाज किया जाता रहा है—भूकंप के कई घंटों या दिनों बाद होने वाले ‘विलंबित हिमस्खलन’ (Delayed Avalanches)। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की पत्रिका ‘मौसम’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मध्यम तीव्रता के भूकंप हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ की परतों को आंतरिक रूप से खोखला कर देते हैं, जिसका प्रभाव तुरंत नहीं बल्कि 38 से 76 घंटे बाद तक बना रहता है।
यह निष्कर्ष उत्तराखंड के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि राज्य के चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे जिले भूकंपीय ज़ोन IV और V में स्थित हैं। अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 5.0 मैग्नीट्यूड से अधिक के शक्तिशाली भूकंपों की तुलना में मध्यम तीव्रता के झटके अधिक हिमस्खलन ट्रिगर करते हैं। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण यह है कि जहाँ बहुत तेज़ झटके कभी-कभी बर्फ की परतों को सघन कर देते हैं, वहीं मध्यम झटके उनके बीच सूक्ष्म दरारें पैदा करते हैं। ये दरारें धीरे-धीरे फैलती हैं और अंततः पूरी ढलान को अस्थिर कर देती हैं। उत्तराखंड में ऐसे मध्यम भूकंप बार-बार आते हैं, जिन्हें अक्सर “सामान्य” मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि यही लापरवाही भविष्य में बड़ी आपदाओं की नींव रख रही है।
उत्तराखंड की भौगोलिक बनावट इस खतरे को और अधिक जटिल बनाती है। यहाँ की बर्फ की परतें अलग-अलग समय पर गिरने के कारण भिन्न-भिन्न घनत्व की होती हैं, जो खड़ी ढलानों और टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल के कारण पहले से ही संवेदनशील हैं। यदि हम हालिया डेटा पर नजर डालें, तो उत्तराखंड में भूकंपीय गतिविधियों में निरंतरता देखी गई है। साल 2023 में ही पिथौरागढ़ और जोशीमठ क्षेत्र में 3.5 से 4.8 तीव्रता के कई झटके महसूस किए गए, जबकि उत्तरकाशी में भी भूकंपीय सक्रियता दर्ज की गई। इससे पहले 2021 और 2022 के दौरान चमोली और बागेश्वर के सीमांत इलाकों में भी मध्यम तीव्रता के झटके आए थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन झटकों ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों की बर्फ की संरचना पर गहरा प्रभाव डाला है, जो कि किसी भी समय बड़े हिमस्खलन का कारण बन सकते हैं।
फरवरी 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा आपदा ने सिद्ध किया था कि हिमालय के ऊपरी हिस्से में होने वाली एक छोटी सी हलचल नीचे की घाटियों को नेस्तनाबूद कर सकती है। नया अध्ययन इसी कड़ी में चेतावनी देता है कि भूकंप केवल जमीन हिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऊपरी हिमालय की बर्फ को एक “टाइम बम” में बदल देता है। वर्तमान में उत्तराखंड और पूरे हिमालयी क्षेत्र में हिमस्खलन की पूर्व चेतावनी प्रणाली अत्यंत सीमित है। इस नए शोध के प्रकाश में यह अनिवार्य हो गया है कि भूकंप आने के बाद कम से कम 72 घंटों तक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में विशेष अलर्ट जारी किया जाए। साथ ही, हिम-अध्ययन संस्थानों और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सीमांत बस्तियों और सैन्य चौकियों को इस ‘विलंबित खतरे’ के प्रति शिक्षित करना होगा।
