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आवाज़ों के जुगनू’ हमारे सांस्कृतिक डीएनए का दस्तावेज़ है: हरीश भिमानी

 

नयी दिल्ली, 11 जनवरी ।  इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में ‘आवाज़ों के जुगनू’ पुस्तक का विमोचन और चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के मीडिया केंद्र ने ‘आवाज़ों के जुगनू: वॉयस मास्‍टर्स ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तक के विमोचन और चर्चा का सफल आयोजन किया। यह कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित आईजीएनसीए, जनपथ में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। वरिष्ठ प्रसारक और वॉइस एक्टर हरीश भिमानी मुख्य अतिथि थे। विशेष अतिथि वरिष्ठ प्रसारक, पूर्व दूरदर्शन समाचार वाचक और वॉइस एक्टर शम्मी नारंग थे जबकि विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध वॉइस एक्टर सोनल कौशल थी जो डोरेमोन और छोटा भीम जैसे लोकप्रिय एनिमेटेड किरदारों को अपनी आवाज़ देने के लिए जानी जाती है। इस अवसर पर पुस्तक की संकलक और संपादक डॉ. शेफाली चतुर्वेदी भी उपस्थित थी। आईजीएनसीए के मीडिया केंद्र के नियंत्रक श्री अनुराग पुनेथा ने अतिथियों का स्वागत किया और कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर एक क्यूआर कोड भी जारी किया गया जिसके माध्यम से श्रोता पुस्तक में शामिल सभी हस्तियों के साक्षात्कार देख सकते हैं।

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि कला का दायरा विशाल है। इसलिए, आईजीएनसीए ने ‘आवाज़ों के जुगनू’ नामक पुस्तक और ऑडियो प्रारूप के माध्यम से गैर-पारंपरिक कला विधा, यानी आवाज़ों की दुनिया से जुड़े कलाकारों की यात्राओं को दस्तावेज़ी करने की साहसिक पहल की है। उन्होंने घोषणा की कि पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित किया जाएगा और कहा कि यह तो केवल शुरुआत है, इस पहल को आगे और बढ़ाया जाएगा।

महाभारत में ‘समय’ को अपनी आवाज़ देने वाले श्री हरीश भिमानी ने कहा कि आवाज़ केवल संचार का माध्यम नहीं है बल्कि संस्कृति और संवेदनशीलता की वाहक है। उन्होंने मानव जीवन में आवाज़ के महत्ता बताते हुए और एक संस्कृत सुभाषित का उल्‍लेख किया और समझाया कि कोयल और कौआ दोनों काले रंग के होते हैं, फिर भी उनकी आवाज़ में अंतर होता है। उन्होंने ‘आवाज़ों के जुगनू’ को एक उल्लेखनीय पहल बताया और कहा कि यदि वे इसमें थोड़ा सा भी योगदान दे सके, तो वे इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक केवल पत्रों का संग्रह नहीं है बल्कि उस अदृश्य जीवन शक्ति को पकड़ने का प्रयास है जो सदियों से हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि ‘आवाज़ों के जुगनू’ हमारे सांस्कृतिक डीएनए का दस्तावेज है जो हमें याद दिलाता है कि भले ही शब्द मौन हो जाएं, उनकी गढ़ी हुई ध्वनि की गूंज सभ्यता की प्रतिध्वनि को जीवित रखती है।

दिल्ली मेट्रो की जानी-पहचानी आवाज, शम्मी नारंग ने भारतीय प्रसारण जगत में आवाज के कलाकारों की भूमिका के बारे में बात की और इस तरह के दस्तावेजीकरण प्रयासों के महत्व पर जोर दिया। अपने निजी अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आवाज की दुनिया में कैसे कदम रखा। सही उच्चारण और लहजे के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि अच्छी तरह बोलना जरूरी है, क्योंकि अच्छी तरह बोलने में कोई हर्ज नहीं है और अच्छी वाणी श्रोता पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। सोनल कौशल ने युवा पीढ़ी के लिए आवाज उद्योग में मौजूद संभावनाओं और चुनौतियों के बारे में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने अपने सफर के बारे में विस्तार से बताया और सभागार में मौजूद बच्चों को डोरेमोन और छोटा भीम के संवाद सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया, जिस पर उन्हें भरपूर तालियां मिली।

अपने स्वागत भाषण में श्री अनुराग पुनेथा ने कहा कि आवाज़ विश्वास पैदा करती है। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए एक प्रसारण का ज़िक्र किया, जब एक अभिनेता ने रेडियो नाटक के दौरान घोषणा की कि अमेरिका पर मंगल ग्रहवासी हमला कर रहे हैं। लोगों ने इस घोषणा पर विश्वास किया और सड़कों पर जमा हो गए। यह आवाज़ की शक्ति को दर्शाता है।

पुस्तक का परिचय देते हुए, इसकी संकलक और संपादक डॉ. शेफाली चतुर्वेदी ने बताया कि ‘आवाज़ों के जुगनू’ भारतीय गायन जगत की उन विशिष्ट और यादगार आवाज़ों का संग्रह है जिन्होंने रेडियो, दूरदर्शन, विज्ञापन, डबिंग, घोषणाओं और रंगमंच के माध्यम से भारतीय प्रसारण को समृद्ध किया है। यह पुस्तक इन कलाकारों के जीवन सफर, रचनात्मक संघर्षों और योगदानों को विस्तार से प्रस्तुत करती है।

समापन में, श्री अनुराग पुनेथा ने अतिथियों और उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया और ‘आवाज़ों के जुगनू’ पहल को आगे बढ़ाने के बारे में बात की। कार्यक्रम में जाने-माने रेडियो जॉकी (आरजे) नितिन खुराफती, सिमरन, जसलीन भल्ला, साइमा रहमान, साथ ही प्रख्यात प्रसारक राजेंद्र चुघ, राजीव कुमार शुक्ला, रिनी खन्ना, रमा पांडे, श्रीवर्धन त्रिवेदी और नरेंद्र जोशी भी उपस्थित थे। सिमरन, राजेंद्र चुघ, राजीव कुमार शुक्ला और नरेंद्र जोशी ने भी इस अवसर पर अपने विचार साझा किए। इसके अलावा, कला, मीडिया और संस्कृति से जुड़े विद्वानों, कलाकारों, छात्रों और श्रोताओं की भी अच्छी खासी उपस्थिति देखी गई। अपनी तरह के इस अनूठे कार्यक्रम ने भारतीय आवाज उद्योग के प्रति समझ और संवेदनशीलता को और गहरा किया।

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