पुस्तक समीक्षा : बदलते दौर से गुजरती जनजातियाँ
–त्रिलोचन भट्ट –
जयसिंह रावत की पुस्तक ‘बदलते दौर से गुजरती जनजातियाँ’ (The Tribes in Transition) उत्तराखंड के जनजातीय समाज के दस्तावेजीकरण में एक मील का पत्थर मानी जाती है। यह पुस्तक न केवल इतिहास बताती है, बल्कि आधुनिकता के प्रभाव से इन समुदायों में आ रहे बदलावों का भी विश्लेषण करती है।
इस पुस्तक के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:
1. आधुनिकता और संक्रमण काल
लेखक ने विस्तार से बताया है कि कैसे शिक्षा, सरकारी नौकरियों और बाहरी दुनिया के संपर्क से जनजातियों की पारंपरिक जीवनशैली बदल रही है।
- थारू और बोक्सा: तराई क्षेत्र में कृषि पद्धतियों और भूमि स्वामित्व में आए बदलावों का वर्णन।
- भोटिया: 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत के साथ व्यापार बंद होने से उनके सामाजिक-आर्थिक जीवन में आए बड़े बदलाव।
- जौनसारी: उनकी विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों का आधुनिक कानून और शिक्षा के साथ सामंजस्य।
2. लुप्त होती भाषा और संस्कृति
जयसिंह रावत ने इस ओर गंभीर चिंता जताई है कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा (जैसे जौनसारी, राजी या भोटिया बोलियाँ) को भूलकर हिंदी और अंग्रेजी की ओर बढ़ रही है। पारंपरिक लोक गीतों और नृत्य की जगह आधुनिक संगीत ले रहा है।
3. राजनैतिक और कानूनी अधिकार
पुस्तक में 1967 में इन पांच जातियों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिलने के बाद के परिदृश्य का विश्लेषण किया गया है। लेखक बताते हैं कि कैसे आरक्षण ने उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा, लेकिन साथ ही ‘अमीर और गरीब’ की एक नई खाई भी इन समुदायों के भीतर पैदा कर दी।
4. राजी (बनरावत) जनजाति का विशेष उल्लेख
लेखक ने पिथौरागढ़ की सबसे छोटी और आदिम जनजाति ‘राजी’ की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला है। वे कैसे गुफाओं और जंगलों से निकलकर अब स्थाई बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं और उनके अस्तित्व पर जो खतरा मंडरा रहा है, उसका गहरा विश्लेषण किया गया है।
5. शोध की प्रमाणिकता
यह पुस्तक जयसिंह रावत के वर्षों के क्षेत्रीय कार्य (Field Work) का परिणाम है। इसमें जनगणना के आंकड़ों के साथ-साथ व्यक्तिगत साक्षात्कारों और लोक कथाओं का भी सहारा लिया गया है।
मूल निवासियोंके बारे मे प्रमाणिक दस्तावेज
जयसिंह रावत की यह कृति उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो उत्तराखंड के ‘मूलाधार’ यानी यहाँ के मूल निवासियों के विकास, उनके संघर्ष और उनकी बदलती पहचान को समझना चाहते हैं। यह सिविल सेवा परीक्षाओं (UKPSC) की तैयारी करने वाले छात्रों और समाजशास्त्र के शोधकर्ताओं के लिए एक मानक पुस्तक है।
