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हिमालय की गगनचुंबी चोटियां तरस रही हैं बर्फबारी के लिए

प्रकाश कपरुवाण की रिपोर्ट
ज्योतिर्मठ, 15 जनवरी। हिमालय पौष के महीने मे भी सूखे से कराह रहा है, बर्फ से बारह महीने लकदक रहने वाली हिमालय की गगनचुंबी चौटियों से बर्फ नदारत है, और वनाग्नि से पूरे पहाड़ो मे काली धुंद छाई है, लेकिन इन सबके बावजूद हिमालय व हिमालय के पर्यावरण के प्रति चिंतित दिखने वाले लोग क्या हिमालय को इस नई आफत से उबारने पर मंथन कर रहे हैं ?, या हिमालय को केवल संसाधनों के उपयोग तक ही सीमित समझा जा रहा है।

प्रकृति प्रकोप का दुस्प्रभाव ही है अगस्त सितंबर के बाद वारिश नहीं हुई और दिसंबर का महीना सूखा ही चला गया जो लगभग पिछले दस वर्षों मे पहली बार हुआ। अब आधी जनवरी भी बीत गई लेकिन अभी भी वारिश व बर्फबारी के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, और पौष के महीने मे ही पहाड़ के जंगल धदक रहे हैं।

वारिश व बर्फबारी के बिना सूखे की मार झेल रहे उत्तराखंड वासियों पर जंगली जानवरों के आक्रमण की आफत भी बनी हुई है, उत्तराखंड मे इस बार जंगली जानवरों के हमलों से मृतकों व घायलों के पिछले सभी रिकार्ड टूट गए।

सूखे की मार, जंगली जानवरों के आक्रमण व वनाग्नि से पूरा पहाड़ हैरान व परेशान है, लेकिन यह सब समस्या अचानक कैसे सामने आई और इन समस्याओं से उत्तराखंड वासियों को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है क्या इस पर गंभीर चिंतन हो रहा है ?।

उत्तराखंड के विंटर डेस्टिनेशन “औली” की ही बात करें तो दिसंबर- जनवरी महीनों मे बर्फ से ढकी रहने वाली औली आधी जनवरी बीतने के बाद भी बर्फ विहीन रेगिस्तान की तरह दिख रही है, 25दिसंबर से दो-तीन जनवरी तक बर्फबारी की उम्मीद मे पर्यटकों की आमद होने से घोड़े खच्चर संचालकों व पर्यटन व्यवसायियों को कुछ रोजगार तो मिला लेकिन अब पर्यटकों की संख्या कम होने से घोड़े खच्चर भी “घाम” ही ताप रहे हैं।

तो क्या प्रकृति के इस भयानक प्रकोप के पीछे सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग ही एक मात्र कारण है या प्रकृति के साथ छेड़ छाड़, अनियंत्रित निर्माण, अवैज्ञानिक दोहन व अंधा धुंद पेड़ो का कटान भी इन सबकी वजह हो सकती है, इन सब पर व्यापक मंथन किए जाने की जरुरत है जो हिमालय व हिमालय वासियों की सुरक्षा के लिए बेहद जरुरी है।

यदि ग्लोबल वार्मिंग के कारणों के इतर मानव जनित कारण हैं तो इस पर अवश्य सख्ती दिखानी होगी सिर्फ जल जंगल जमीन बचाने के नारों से यह संभव नहीं होगा, पर्यावरण व ग्ल्येशियर वैज्ञानिकों को धरातल पर हो रहे अवैज्ञानिक दोहन व अनियंत्रित निर्माणसे हो रहे नुकसान का आंकलन करना होगा अन्यथा पौष मास तो सूखे की भेंट चढ़ा कहीं जेष्ठ मास मे जल संकट से न जूझना पड़े।

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