कुमाऊं के सभी पांच नगर निगमों में नियमों की अनदेखी, समय पर नहीं हो रहीं बोर्ड बैठकें
काशीपुर, 16 जनवरी। कुमाऊं मंडल के सभी पांच नगर निगमों में नगर निगम अधिनियम के प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी सामने आई है। नियमों के अनुसार जहां वर्ष में न्यूनतम छह बोर्ड बैठकों का आयोजन किया जाना अनिवार्य है, वहीं कुमाऊं के किसी भी नगर निगम में यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। यह खुलासा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारियों से हुआ है।
काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नदीम उद्दीन द्वारा आरटीआई के माध्यम से कुमाऊं के सभी नगर निगमों से जानकारी मांगी गई थी। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार वर्ष 2025 में अधिकांश नगर निगमों में निर्धारित समयावधि के अनुसार बैठकें नहीं बुलाई गईं, जिससे निगमों के लोकतांत्रिक संचालन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार काशीपुर नगर निगम में वर्ष 2025 में केवल दो बोर्ड बैठकें आयोजित की गईं। पहली बैठक 5 फरवरी 2025 को महापौर दीपक बाली की अध्यक्षता में हुई, जिसमें 40 पार्षद उपस्थित रहे और तीन प्रस्ताव पारित किए गए। दूसरी बैठक 3 मार्च 2025 को आयोजित हुई, जिसमें 39 पार्षदों की उपस्थिति में 24 प्रस्ताव पारित हुए।
रुद्रपुर नगर निगम से प्राप्त सूचना के अनुसार कुल तीन बैठकें हुईं, लेकिन केवल दो बैठकों के कार्यवृत्त उपलब्ध कराए गए। 7 फरवरी 2025 को हुई बैठक में महापौर विकास शर्मा, दो विधायक और 40 पार्षद उपस्थित रहे, जिसमें एक ही प्रस्ताव पारित हुआ। 18 फरवरी 2025 की बैठक में 39 पार्षदों की उपस्थिति में एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया।
हल्द्वानी-काठगोदाम नगर निगम में 26 मार्च 2025 को महापौर गजराज बिष्ट की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें 56 पार्षद उपस्थित रहे और 11 विशेष प्रस्ताव पारित किए गए। अल्मोड़ा नगर निगम में वर्ष 2025 में तीन बोर्ड बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें क्रमशः 44, 63 और 43 प्रस्ताव पारित किए गए।
पिथौरागढ़ नगर निगम में कुल पांच बोर्ड बैठकें आयोजित हुईं, लेकिन वहां भी अधिनियम के अनुरूप न्यूनतम छह बैठकों का मानक पूरा नहीं हो सका।
सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने बताया कि नगर निगम अधिनियम की धारा 88 के अनुसार प्रत्येक वर्ष कम से कम छह बैठकें अनिवार्य हैं और बैठकों के बीच दो माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। नियमों की अनदेखी से नगर निगमों की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
