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भारत की सुरंगें: ज़मीन के नीचे अभियांत्रिकी के अद्भुत चमत्कार

A new generation of tunnels is preparing to take shape. These forthcoming projects promise to redefine how the nation moves and connects. The following upcoming projects highlight the scale of progress underway. Tunnels in India represent more than infrastructure development; they reflect the nation’s determination to overcome geographical challenges. By cutting through mountains and terrain that once limited connectivity, tunnels have enabled year-round transportation. They have also improved access to remote regions and strengthened links between communities. From strategic Himalayan tunnels to urban metro networks, these projects are transforming how India moves people, goods, and resources. Built using modern engineering and innovative planning, tunnels play a vital role in economic growth, national security, and regional development. They are shaping a more connected and resilient country.

 

-A PIB FEATURE-

भारत में सुरंगें केवल अवसंरचना विकास तक सीमित नहीं हैं; वे भौगोलिक चुनौतियों पर विजय प्राप्त करने के राष्ट्र के संकल्प को भी प्रतिबिंबित करती हैं। उन पर्वतों और भूभागों को भेदकर, जो कभी संपर्क में बाधा हुआ करते थे, सुरंगों ने वर्ष भर परिवहन को संभव बनाया है। इन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँच में सुधार किया है और समुदायों के बीच संपर्क को सुदृढ़ किया है। रणनीतिक हिमालयी सुरंगों से लेकर शहरी मेट्रो नेटवर्क तक, ये परियोजनाएँ भारत में लोगों, वस्तुओं और संसाधनों की आवाजाही के तरीकों और संभावनाओं में बदलाव ला रही हैं। आधुनिक अभियांत्रिकी और नवोन्मेषी नियोजन के माध्यम से निर्मित सुरंगें आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे एक अधिक कनेक्‍टेड और सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण कर रही हैं।

भारत में सुरंग निर्माण के तीव्र विकास को राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार के साथ-साथ रणनीतिक सीमा अवसंरचना, मेट्रो रेल के विस्‍तार, बुलेट ट्रेन गलियारों तथा दूरस्थ क्षेत्रों में सभी मौसमों में संपर्क सुनिश्चित करने हेतु की जा रही पहलों से बल मिल रहा है। अवसंरचना विस्तार के साथ-साथ, सुरंग निर्माण, निर्माण क्षेत्र के सबसे तीव्र गति से बढ़ते क्षेत्रों में से एक बन गया है।

सुरंग अवसंरचना क्यों हमेशा से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है

सुरंगें भारत के विकासात्मक मानचित्र को तेज़ी से नया रूप दे रही हैं, जो पारंपरिक परिवहन मार्गों का अधिक स्‍मार्ट, सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प प्रदान करती हैं। इनका प्रभाव केवल अभियांत्रिकी तक सीमित नहीं है। ये क्षेत्रीय विकास को गति देती हैं, रणनीतिक तैयारियों को सुदृढ़ करती हैं और करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन को बेहतर बनाती हैं।

भारत की विकसित होती सुरंग प्रौद्योगिकी

पिछले एक दशक में भारत की सुरंग निर्माण क्षमता में व्यापक परिवर्तन आया है। यह पारंपरिक ड्रिल-एवं-विस्फोट विधियों से आगे बढ़कर परिष्कृत और उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच चुकी है। इसके परिणामस्वरूप भूमिगत निर्माण कार्य पहले की तुलना में अधिक तेज़, सुरक्षित और जटिल हो गया है। वर्तमान समय की परियोजनाएँ उन्नत भूवैज्ञानिक मानचित्रण और रिअल टाइम मॉनिटरिंग प्रणालियों पर निर्भर करती हैं, जिससे अभियंता कठोर परिस्थितियों में भी अधिक लंबी और अधिक गहरी सुरंगों का निर्माण करने में सक्षम हो रहे हैं।

आधुनिक भारतीय सुरंगें उच्च-प्रौद्योगिकी, सुरक्षा-संवर्धित गलियारों के रूप में डिज़ाइन की गई हैं, जिनमें अभियांत्रिकी प्रणालीयुक्त वेंटिलेशन, आपातकालीन निकास मार्ग, अग्नि दमन यंत्र, एलईडी प्रकाश व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी और केंद्रीकृत सुरंग नियंत्रण कक्ष शामिल हैं। इस आधुनिकीकरण ने संचालन की विश्वसनीयता और आपदा से निपटने की तैयारी, दोनों में ही महत्वपूर्ण सुधार किया है।

भारत की सुरंग क्रांति को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ

  • सुरंग खोदने वाली मशीनें (टीबीएम) मेट्रो नेटवर्क और लंबी रेल/सड़क सुरंगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त, टीबीएम उच्च सटीकता, कम कंपन और घनी आबादी वाले तथा भूवैज्ञानिक रूप से जटिल क्षेत्रों में अधिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  • नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि (एनएटीएम) हिमालय में व्यापक रूप से अपनाई गई नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि अभियंताओं को रिअल टाइम में उत्खनन समर्थन को अनुकूलित करने की सुविधा देती है, जिससे यह परिवर्तनशील और नाजुक शिला संरचनाओं के लिए आदर्श है।
  • एकीकृत सुरंग नियंत्रण प्रणाली (आईटीसीएस) आधुनिक सड़क सुरंगों के लिए महत्वपूर्ण, आईटीसीएस वेंटिलेशन नियंत्रण, आगजनी का पता लगाने, संचार नेटवर्क, सीसीटीवी और आपातकालीन प्रबंधन को एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म में संयोजित करता है, जिससे चौबीसों घंटे सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

आधुनिक अवसंरचना को परिभाषित करती  भारत की ऐतिहासिक सुरंगें

भारत की विस्‍तृत होती अवसंरचना ने कई अद्भुत सुरंगों का निर्माण किया है, जो देश में लोगों और वस्तुओं के आवागमन के तरीकों को पुन:परिभाषित करती हैं। प्रत्येक सुरंग व्यापक स्तर पर नवाचार और समस्या-समाधान की सफलता का प्रतीक है।

अटल सुरंग

बर्फ़ से ढकी पीर पंजाल पर्वतश्रेणियों के नीचे स्थित अटल सुरंग 9.02 किमी लंबी है, जो रोहतांग दर्रे को बायपास करते हुए अत्‍यधिक ऊँचाई वाला मार्ग प्रदान करती है। इसके निर्माण ने संपर्क व्यवस्था में क्रांति ला दी है, जिससे मनाली और लाहौल‑स्पीति की दूरस्थ घाटियों के बीच सभी मौसमों में निर्बाध यात्रा संभव हो गई है। इस सुरंग का रणनीतिक महत्व इसलिए भी है कि यह कठिन पर्वतीय परिस्थितियों में नागरिकों और रक्षा बलों, दोनों के लिए सुरक्षित और विश्वसनीय पहुँच सुनिश्चित करती है। इसे वर्ष 2022 में वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स यूके द्वारा 10,000 फीट से ऊपर स्थित विश्व की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग के रूप में आधिकारिक मान्यता दी गई।

इस सुरंग ने मनाली–सरचू की दूरी 46 कि.मी. कम कर दी है और यात्रा में लगने वाले समय को चार से पांच घंटे घटा दिया है। कठोर हिमालयी परिस्थितियों में निर्मित, जहाँ सर्दियों का तापमान 25°C तक गिरता था और सुरंग के अंदर कभी-कभी 45°C तक पहुँच जाता था, इसके निर्माण में असाधारण धैर्य और कौशल की आवश्यकता थी। अभियंताओं के सामने नाजुक भूवैज्ञानिक संरचना, कभी-कभी सुरंग में जलभराव कर देने वाले सेरी नाले का रिसाव, भारी ओवरबर्डन और तीव्र हिमपात जैसी चुनौतियां थीं, जिन्‍हें बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) के समर्पित कर्मयोगियों ने सफलतापूर्वक पार किया।

ज़ेड–मोड़/सोनमर्ग सुरंग

सोनमर्ग सुरंग, समुद्र तल से 8,650 फीट से अधिक की अत्‍यधिक ऊँचाई पर पर्वतों को भेदते हुए बनाई गई 12 कि.मी. लंबी एक अभियांत्रिकी उपलब्धि है, जो जम्मू और कश्मीर में यात्रा व्यवस्था को रूपांतरित करने के लिए तैयार है। इसका निर्माण ₹2,700 करोड़ की लागत से किया गया है। इसमें 6.4 कि.मी. लंबी मुख्य सुरंग, एक निकास सुरंग तथा आधुनिक संपर्क सड़कें शामिल हैं, जो श्रीनगर और सोनमर्ग के सुनहरे घास के मैदानों के बीच, तथा आगे लद्दाख की ओर, सभी मौसमों में निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करती हैं। अब हिमस्खलन, भूस्खलन या भारी हिमपात इस क्षेत्र को अलग-थलग नहीं कर पाएंगे। यह सुरंग मार्ग को खुला रखती है, प्रमुख अस्पतालों तक पहुँच में सुधार करती है और आवश्यक आपूर्ति की उपलब्धता सुनिश्चित करती है। कठिन हिमालयी भूगर्भिकी के लिए नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि (एनएटीएम) का उपयोग करके निर्मित यह सुरंग एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि है। इसमें उन्नत प्रणालियों जैसे पब्लिक एड्रेस सिस्टम, इलेक्ट्रिकल फायर सिग्नलिंग सिस्टम, रेडियो री-ब्रॉडकास्ट सिस्टम (एफएम), डायनॅमिक रोड इन्फ़ॉर्मेशन पैनल (डीआरआईपी) आदि के साथ एकीकृत सुरंग प्रबंधन प्रणाली (आईटीएमएस) भी स्थापित की गई है। इसे प्रति घंटे लगभग 1,000 वाहनों को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है। आने वाली ज़ोजिला सुरंग (2028) के साथ इस मार्ग के संयोजित होने पर यात्रा दूरी 49 कि.मी. से घटकर 43 कि.मी. हो जाएगी और गति 30 किमी/घंटा से बढ़कर 70 किमी/घंटा हो जाएगी, जिससे रक्षा रसद की आवाजाही, शीतकालीन पर्यटन, साहसिक खेल और इन पर्वतों में रहने वाले लोगों की आजीविका को बढ़ावा मिलेगा।

सेला सुरंग

सेला सुरंग, जिसे इटानगर, अरुणाचल प्रदेश में विकसित भारत विकसित उत्तर पूर्व कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र को समर्पित किया गया था, 13,000 फुट की ऊँचाई पर तेज़पुर–तवांग मार्ग पर बीआरओ द्वारा निर्मित की गई है। इस सुरंग का निर्माण ₹825 करोड़ की लागत से किया गया है। यह सभी मौसमों में संपर्क सुनिश्चित करती है और सशस्त्र बलों के लिए अत्यधिक रणनीतिक महत्व रखती है, साथ ही सीमा क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देती है। नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि (एनएटीएम) का उपयोग करके निर्मित, यह सुरंग यह सशक्त संदेश देती है कि दृढ़ता और क्षेत्रीय प्रतिबद्धता दूरस्थ पर्वतीय समुदायों के भविष्य को नया आकार दे सकती है।

 

बनिहाल–क़ाज़ीगुंड सड़क सुरंग

बनिहाल–क़ाज़ीगुंड सड़क सुरंग, जिसका निर्माण ₹3,100 करोड़ से अधिक की लागत से किया गया है, 8.45 किमी लंबी ट्विन-ट्यूब सुरंग है जिसे जम्मू और कश्मीर के बीच संपर्क में महत्‍वपूर्ण सुधार लाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस सुरंग ने बनिहाल और काज़ीगुंड के बीच सड़क दूरी को 16 कि.मी. कम कर दिया है और यात्रा में लगने वाले समय को लगभग ढाई घंटे घटा दिया है। दो अलग-अलग सुरंगों, प्रत्येक दिशा के यातायात के लिए एक सुरंग, के निर्माण के साथ इसे हर 500 मीटर पर क्रॉस मार्गों से जोड़ा गया है, जिससे रख-रखाव और आपातकालीन निकासी में सुविधा हो। इससे सभी मौसमों में सड़क संपर्क सुनिश्चित हो गया है, जिससे पहुँच मजबूत हुई है और दोनों क्षेत्रों के बीच निकटता बढ़ी है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सुरंग

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सुरंग, जिसे पहले जम्मू और कश्मीर में चेनानी–नाशरी सुरंग के नाम से जाना जाता था, कि.मी. लंबी ट्विन-ट्यूब सुरंग है, जो उधमपुर और रामबन को जोड़ती है और सभी मौसमों में चालू रहती है। लगभग 1,200 मीटर की ऊँचाई पर कठिन हिमालयी भूभाग में निर्मित, इस सुरंग ने 41 कि.मी. लंबी पर्वतीय सड़क को बाइपास करते हुए, जम्मू और श्रीनगर के बीच यात्रा में लगने वाले समय को लगभग दो घंटे कम कर दिया है। इस सुरंग में उन्नत वेंटिलेशन, सुरक्षा और स्‍मार्ट यातायात प्रणालियाँ हैं, जिन्हें न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के साथ पूरी तरह एकीकृत नियंत्रण तंत्र के माध्यम से संचालित किया जाता है, साथ ही सुरक्षा उपायों को भी बढ़ाया गया है। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया पहलों के अनुरूप विकसित इस परियोजना ने स्थानीय लोगों के कौशल में सुधार किया और उन्हें सुरंग निर्माण में शामिल किया। इस परियोजना ने 2,000 से अधिक स्थानीय कर्मचारियों के लिए रोजगार सृजित किया, जिनमें लगभग 94 प्रतिशत श्रमिक जम्मू और कश्मीर से थे।

यूएसबीआरएल परियोजना के अंतर्गत टी–50 सुरंग

टी–50 सुरंग, जो जम्मू और कश्मीर में खारी और सुम्बर को जोड़ती है, 12.77 कि.मी. लंबी एक इंजीनियरिंग उपलब्धि है और उधमपुर–श्रीनगर–बरामुल्ला रेल लिंक (यूएसबीआरएल) परियोजना के अंतर्गत निर्मित भारत की सबसे लंबी परिवहन सुरंगों में से एक मानी जाती है, कश्मीर घाटी और देश के अन्य हिस्सों के बीच एक महत्वपूर्ण रेल जीवनरेखा का कार्य करती है। नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि (एनएटीएम) का उपयोग करके निर्मित इस सुरंग ने क्वार्ट्ज़ाइट और ग्नाइस से लेकर फिलाइट तक के चुनौतीपूर्ण भूविज्ञान को भेदते हुए, इस सुरंग निर्माण में अभियंताओं ने उच्च जल प्रवेश, भूस्खलन, शिअर जोन और संयुक्त ज्वालामुखीय चट्टानों जैसी कठिन परिस्थितियों को पार किया। इस सुरंग में मुख्य सुरंग के साथ एक समानांतर आपातकालीन सुरंग भी है, जो सुरक्षा के लिए हर 375 मीटर पर जुड़ी हुई है। प्रत्येक 50 मीटर पर स्थापित सीसीटीवी कैमरों और केंद्रीय नियंत्रण कक्ष से निगरानी के साथ टी–50 सुरंग को सुरक्षित और निर्बाध रेल संचालन के लिए डिज़ाइन किया गया है।

भारत की सुरंग परियोजनाओं की अगली लहर

कोलकाता की अंडरवॉटर मेट्रो सुरंग

साल 2024 में, भारत ने कोलकाता में अपनी पहली अंडरवॉटर मेट्रो सुरंग के शुभारंभ के साथ एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की, जो हुगली नदी के नीचे एस्पलेनाड और हावड़ा मैदान को जोड़ती है। यह इंजीनियरिंग उपलब्धि न केवल देश की बढ़ती तकनीकी और अवसंरचनात्मक क्षमताओं को दर्शाती है, बल्कि भारत के सबसे व्यस्त महानगरीय क्षेत्रों में शहरी आवागमन की नई परिभाषा भी प्रस्तुत करती है।

सुरंगों की नई पीढ़ी आकार लेने को तैयार है। ये आगामी परियोजनाएँ देश में आवागमन और संपर्क के तरीके को नया रूप देने का वादा करती हैं। निम्नलिखित आने वाली परियोजनाएँ प्रगति के पैमाने को उजागर करती हैं।

ज़ोजिला सुरंग

 

जोजिला सुरंग भारत की अवसंरचना में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में उभर रही है, जो कुछ सबसे चुनौतीपूर्ण हिमालयी चट्टानों को भेदते हुए लद्दाख और देश के अन्य हिस्सों के बीच एक भरोसेमंद, सभी मौसमों में चालू रहने वाला संपर्क स्थापित करती है। लगभग 12 किलोमीटर पहले ही पूरा हो चुका है, और इस परियोजना में उन्नत सुरक्षा उपाय और एक सेमी-ट्रांस्‍वर्स वेंटिलेशन सिस्टम शामिल है, जो पर्वतों के अंदर स्थिर वायु प्रवाह बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है। परियोजना में स्मार्ट सुरंग (एससीएडीए) प्रणाली शामिल है, जिसे नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि (एनएटीएम) का उपयोग करके निर्मित किया गया है। इसमें सीसीटीवी निगरानी, रेडियो नियंत्रण, निर्बाध विद्युत आपूर्ति और वेंटिलेशन सिस्टम जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इस परियोजना में आधुनिक तकनीक के उपयोग के चलते सरकार की ₹5,000 करोड़ से अधिक की बचत हुई है।  पूरी हो जाने पर यह महत्वाकांक्षी परियोजना भारत की सबसे लंबी सड़क सुरंग और एशिया की सबसे लंबी द्विदिशात्मक सुरंग बन जाएगी, जिससे इसका राष्ट्रीय महत्व और भी बढ़ जाएगा। 11,578 फीट की ऊँचाई पर स्थित और 30 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली यह परियोजना 2028 तक पूर्ण होने के लिए तैयार है। श्रीनगर–कारगिल–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में, यह क्षेत्र में नागरिक और सैन्य गतिशीलता, दोनों को बढ़ावा देने का वादा करती है।

मुंबई–अहमदाबाद उच्च‑गति रेल सुरंग
भारत का मुंबई–अहमदाबाद उच्च‑गति रेल गलियारा अपनी 4.8 किमी लंबी जलमग्न सुरंग खंड में सफलता प्राप्त कर भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण छलांग ले चुका है। यह देश के पहले बुलेट ट्रेन मार्ग की प्रमुख विशेषता को परिभाषित करता है। घन्सोली और शिलफाटा, दोनों सिरों से एक साथ खोदी गई इस सुरंग ने असाधारण चुनौतियाँ पेश कीं। सटीकता के साथ मिलने से पहले टीमों ने कठिन जलमग्न भूभाग को पार किया, जिसे भारत के अभियांत्रिकी इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सराहा गया। परियोजना में उन्नत नई ऑस्ट्रियाई सुरंग निर्माण विधि (एनएटीएम) का उपयोग किया गया है, जिसे व्यापक सुरक्षा उपायों से समर्थित किया गया है। यह सुरंग एकल‑ट्यूब तकनीक के साथ डिज़ाइन की गई है, जिसमें दो उच्च‑गति ट्रेनें समा सकती हैं, और यह अत्याधुनिक रेल निर्माण में अग्रणी है तथा भारत की अगली पीढ़ी की परिवहन अवसंरचना में नवाचार को दर्शाती है।

ऋषिकेश–कर्णप्रयाग नई रेल लाइन परियोजना की सुरंगें

उत्तराखंड में ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल लाइन भारतीय हिमालय में एक महत्वपूर्ण सुरंग निर्माण परियोजना है। लगभग 125 कि.मी. लंबी इस रेल लाइन का मार्ग भूवैज्ञानिक रूप से कुछ सबसे जटिल और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जिसके कारण यह परियोजना मुख्य रूप से सुरंग-आधारित है। इसमें 16 मुख्य लाइन सुरंगें शामिल हैं, जिनकी कुल लंबाई लगभग 105 कि.मी. है, और 12 समानांतर आपातकालीन सुरंगें हैं, जिनकी कुल लंबाई लगभग 98 कि.मी. है। कुल 213 कि.मी. की परियोजना में से 199 कि.मी. सुरंग का निर्माण पूरा हो चुका है। इस परियोजना की एक प्रमुख तकनीकी उपलब्धि यह है कि भारतीय रेलवे में पहली बार हिमालयी भूविज्ञान में सुरंग खोदने वाली मशीन (टीबीएम) का उपयोग किया गया। यह 14.8 कि.मी. लंबी टी–8 सुरंग के लिए प्रयुक्त हुई, जहाँ एक सफल ब्रेकथ्रू हासिल किया गया। उन्नत सुरंग निर्माण तकनीकें और सतत् निगरानी प्रणालियां अपनाई गई, जिससे सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करते हुए पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम किया जा सके। यह ऋषिकेश–कर्णप्रयाग सुरंगों को भारत में उच्च-ऊँचाई वाली रेलवे सुरंग निर्माण का एक प्रेरक उदाहरण बनाती हैं।

अंधेरे में रोशनी की एक किरण

भारत की सुरंग अवसंरचना स्मार्ट और अधिक सुदृढ़ विकास की दिशा में स्पष्ट परिवर्तन को दर्शाती है। ये परियोजनाएँ कनेक्टिविटी की लंबे समय से मौजूद चुनौतियों का समाधान करती हैं, साथ ही आर्थिक विकास और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का समर्थन भी करती हैं। प्रौद्योगिकी और निर्माण में हुई प्रगति ने जटिल भूभाग में सुरक्षित निर्माण करने की भारत की क्षमता को मजबूत किया है। जैसे-जैसे नई सुरंगें परिचालन में आती जाएंगी, वे आवाजाही, विश्वसनीयता और क्षेत्रीय एकीकरण में सुधार जारी रखेंगी। ये सभी मिलकर एक ऐसे भविष्य का संकेत देते हैं, जहाँ भौगोलिक स्थितियाँ अब प्रगति में कोई बाधा उत्‍पन्‍न नहीं कर सकतीं।

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