धर्म/संस्कृति/ चारधाम यात्राब्लॉग

राजनीति के जंजाल में फंसी आस्था, 12 साल का इंतज़ार फिर अधर में

 

नंदा देवी राजजात यात्रा को 2027 तक टालने से आहत हुए भक्त


हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट-
थराली, 20 जनवरी। एक बार फिर आस्था और लोक मान्यताओं पर राजनीति के हावी होने का अवसर मिल गया है। पूरे 12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2026 में प्रस्तावित श्री नंदा देवी राजजात यात्रा का बेसब्री से इंतजार कर रहे देश–विदेश के नंदा भक्तों को उस समय गहरा आघात लगा, जब नंदा देवी राजजात समिति ने अचानक यात्रा को 2027 तक स्थगित करने की घोषणा कर दी। समिति ने तर्क दिया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पर्याप्त कार्य नहीं हो पाया है और नंदा नवमी 20 सितंबर को पड़ने के कारण यात्रा के होमकुंड पहुंचने तक ठंड बढ़ जाएगी, जिससे यात्रियों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
इस घोषणा ने न केवल उत्तराखंड, बल्कि देश और विदेश में बसे नंदा भक्तों की भावनाओं को आहत किया है। हैरानी की बात यह भी रही कि यात्रा स्थगन की घोषणा के साथ ही आयोजन समिति ने राज्य सरकार को भी कटघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे पिछले दो वर्षों से यात्रा को लेकर विभिन्न स्तरों पर की जा रही तैयारियों और शासन–प्रशासन की सक्रियता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। साथ ही, इससे यात्रा को लेकर जाने वाला संदेश भी सकारात्मक नहीं रहा।
यदि इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2000 में आयोजित श्री नंदा देवी राजजात यात्रा में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए यात्रा से जुड़ी सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की थीं। परिणामस्वरूप यह यात्रा न केवल भव्य रही, बल्कि देश–विदेश में इसकी व्यापक चर्चा हुई। उस दौरान भी ‘कांस्वा के राजा आगे बढ़ेंगे या नंदा देवी भगवती’ जैसे विवाद उठे, लेकिन कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो 280 किलोमीटर से अधिक लंबी यह कठिन यात्रा निर्विघ्न रूप से संपन्न हुई।
12 वर्षों की परंपरा के अनुसार राजजात यात्रा वर्ष 2012 में प्रस्तावित थी, किंतु ज्योतिषीय गणना के अनुसार उस वर्ष मलमास घोषित होने से यात्रा स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद 2013 में यात्रा का आयोजन प्रस्तावित हुआ, लेकिन उसी वर्ष उत्तराखंड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के कारण यह संभव नहीं हो सका। अंततः वर्ष 2014 में नंदा देवी की कृपा से राजजात यात्रा का आयोजन हुआ और यह सफलतापूर्वक संपन्न भी हुई। तभी यह घोषणा की गई थी कि अगली राजजात यात्रा 12 वर्षों बाद वर्ष 2026 में आयोजित की जाएगी।
इसी घोषणा के आधार पर पिछले दो वर्षों से राज्य सरकार और नंदा भक्त 2026 की राजजात यात्रा की तैयारियों में जुटे हुए थे। स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यात्रा को लेकर कई उच्चस्तरीय बैठकें कर अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक की थी। शासन स्तर पर चल रही लगातार तैयारियों को देखते हुए यह माना जा रहा था कि यात्रा तय समय पर ही होगी। राजजात समिति ने भी 23 जनवरी, बसंत पंचमी के अवसर पर यात्रा का कैलेंडर जारी करने की बात कही थी, जिससे नंदा भक्तों में जबरदस्त उत्साह दिखाई देने लगा था।
लेकिन बीते रविवार को कर्णप्रयाग में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजजात समिति द्वारा अचानक यह घोषणा कर दी गई कि 2026 के बजाय यात्रा 2027 में प्रस्तावित की जा रही है। समिति का तर्क था कि नंदा नवमी 20 सितंबर को पड़ने से उस समय उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ठंड काफी बढ़ जाती है और यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। इस घोषणा के बाद 2026 की यात्रा को लेकर उत्साहित भक्तों में गहरी निराशा फैल गई।
यात्रा स्थगन के बाद जिस तरह से नंदा भक्त सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी और पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं, उससे साफ जाहिर होता है कि यह फैसला उनकी आस्था पर गहरी चोट है। भक्तों का कहना है कि नंदा देवी की लोकजात (छोटी जात) और नंदा देवी राजजात (बड़ी जात) यात्राएं सदियों से अगस्त–सितंबर के महीनों में ही आयोजित होती रही हैं। ऐसे में यदि यात्रा 20 सितंबर के आसपास भी होमकुंड पहुंचती है, तो इसे असामान्य नहीं कहा जा सकता।
नंदा भक्तों का आरोप है कि धार्मिक यात्राओं में कहीं न कहीं राजनीति अपनी जमीन तलाश रही है और बिना ठोस कारण के 2026 की प्रस्तावित राजजात यात्रा को स्थगित किया जाना इसी ओर इशारा करता है। यात्रा स्थगन से किसे लाभ होगा और किसे हानि, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस निर्णय से आम नंदा देवी भक्तों की आस्था और भावनाएं गहराई से आहत हुई हैं।

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