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तमाखाणि कु अणश्यालू: हिमालय की प्राचीन धातु-संस्कृति की भूली-बिसरी विरासत

प्रो0 (डा0) महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट –

आज की नई पीढ़ी शायद ही “तमाखाणि कु अणश्यालू” जैसे शब्दों से परिचित हो। यह केवल एक स्थानीय शब्द नहीं, बल्कि गढ़वाल–हिमालय की उस प्राचीन तकनीकी और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें प्रकृति, खनिज और मानव कौशल का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। पहाड़ी बोलियों में ऐसे अनेक शब्द हैं, जिनका उच्चारण और देवनागरी में सही रूप देना भी आसान नहीं, लेकिन उनके भीतर छिपा ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।


दूधातोली पर्वत श्रेणी का नाम स्वयं अपने अर्थ में ही इस क्षेत्र की समृद्धि को समेटे हुए है। ‘दूधातोली’ का शाब्दिक अर्थ है—दूध रखने की बड़ी और गहरी तांबे की तौली। यह नाम इस पर्वत माला की प्राकृतिक संपन्नता को सटीक रूप से दर्शाता है। वन संपदा, जल स्रोत, उपजाऊ मिट्टी, कृषि उत्पाद और खनिज—इन सबका ऐसा दुर्लभ संयोजन पूरे हिमालय क्षेत्र में कम ही देखने को मिलता है।


दूधातोली क्षेत्र प्राचीन काल से खनिज संपदा का केंद्र रहा है। यहाँ तांबे के साथ-साथ लोहे की खाणें, मकानों की छतों में प्रयुक्त उच्च गुणवत्ता की पठाल, घराट और चक्की के भारी पाट, सिल–बट्टे तथा अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मांग रखने वाली सिलिका सैंड भी पाई जाती रही है। यही कारण है कि यह क्षेत्र केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि तकनीकी और औद्योगिक दृष्टि से भी ऐतिहासिक महत्व रखता है।

इसी परंपरा से जुड़ा है तमाखाणि कु अणश्यालू—एक विशेष प्रकार का जला हुआ, खोखला, बेलनाकार मिट्टी का मर्तबान, जिसे हमारे पूर्वज तांबा गलाने के लिए उपयोग में लाते थे। यह लाल मिट्टी या चिकनी क्ले से बना होता था और इसके एक ओर बारीक नलिका होती थी। इसी में तांबे के अयस्क को चूर कर भरकर भट्टी में पकाया जाता था। सैकड़ों ऐसे मर्तबान एक साथ कोयले की भट्टी में रखे जाते थे, ठीक वैसे ही जैसे आज ईंट-भट्टी में कच्ची ईंटें पकाई जाती हैं।

तांबा गलकर इन मर्तबानों की नलिकाओं से बाहर निकलता और एक बड़े पात्र में एकत्र किया जाता था। यह विधि विश्व की सबसे प्राचीन तांबा गलाने की तकनीकों में मानी जाती है, जिसका उल्लेख राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र में भी मिलता है। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि गढ़वाल नरेशों ने राजस्थान के अनुभवी तांबा काश्तकारों को धनपुर–पोखरी और खिर्शु–डोबरी जैसे क्षेत्रों में आमंत्रित किया था, जिन्होंने इसी तकनीक से गढ़वाल में तांबा और लोहा गलाने की परंपरा को आगे बढ़ाया।

गढ़वाली बोली में इसी मिट्टी के मर्तबान को तमाखाणि कु अणश्यालू कहा गया। यह शब्द केवल एक वस्तु का नाम नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक सोच और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक है, जो आधुनिक तकनीक से बहुत पहले हिमालयी समाज में मौजूद था।

आज जब हम विकास और तकनीक की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, तब ऐसी विरासत हमें यह याद दिलाती है कि हमारे पूर्वज भी विज्ञान, पर्यावरण संतुलन और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग में कितने समृद्ध थे। आवश्यक है कि इस तरह के शब्दों, वस्तुओं और ज्ञान को केवल स्मृति तक सीमित न रखें, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाएं, ताकि वे अपनी जड़ों और अपनी बौद्धिक धरोहर से जुड़ सकें।

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