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कानून ने बरी किया, लेकिन व्यवस्था ने फिर भी रखा कैद

24 साल बाद बरी, फिर भी जेल में बंद: ऐसा ही होता है जब आज़ादी काग़ज़ों में उलझ जाए

मैनपुरी, 21 जनवरी। नाम के लिए आज़ादी, हकीकत में जेल—यह पंक्ति उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के व्योति कटरा गांव निवासी 45 वर्षीय आज़ाद ख़ान की ज़िंदगी पर पूरी तरह सटीक बैठती है। डकैती के एक मामले में लगभग 24 वर्षों तक जेल में रहने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन बरी होने के एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद वे अब भी बरेली केंद्रीय जेल में बंद हैं।

हैरानी की बात यह है कि आज़ाद ख़ान के खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है, न कोई सजा शेष है और न ही उन्हें जेल में रखने का कोई कानूनी आधार मौजूद है। उनकी रिहाई केवल इसलिए अटकी हुई है क्योंकि हाईकोर्ट के बरी किए जाने के आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों तक अब तक नहीं पहुंच सकी है। यानी न्याय हो चुका है, लेकिन आज़ादी अब भी एक फाइल के पन्नों में फंसी हुई है।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई का नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की उस विडंबना का है, जहां अदालत से बरी होना भी तुरंत स्वतंत्रता की गारंटी नहीं बन पाता। 24 साल किसी भी इंसान के जीवन का सबसे कीमती हिस्सा होते हैं—परिवार, रोज़गार, सामाजिक पहचान—सब कुछ जेल की दीवारों के भीतर पीछे छूट जाता है। और जब अंततः अदालत कहती है कि व्यक्ति निर्दोष है, तब भी यदि वह जेल में ही बंद रहे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि न्याय वास्तव में किसे कहते हैं?
यह घटना बताती है कि भारत में न्याय सिर्फ अदालत के फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं, काग़ज़ी औपचारिकताएं और विभागों के बीच समन्वय की कमी भी उतनी ही निर्णायक भूमिका निभाती हैं। एक प्रमाणित प्रति का समय पर न पहुंचना किसी व्यक्ति की आज़ादी छीन सकता है—यह तथ्य अपने आप में व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
आज जब डिजिटल इंडिया, ई-कोर्ट और त्वरित न्याय की बातें की जाती हैं, तब आज़ाद ख़ान का मामला यह याद दिलाता है कि तकनीक और घोषणाओं के बावजूद जमीनी हकीकत अब भी फाइलों की रफ्तार पर टिकी है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि निर्दोष को जेल में रखने की कीमत कौन चुकाएगा? क्या उसके खोए हुए वर्षों की कोई भरपाई संभव है?
आज ज़रूरत इस बात की है कि अदालतों और जेल प्रशासन के बीच स्वचालित, त्वरित और जवाबदेह व्यवस्था बने, ताकि कोई भी व्यक्ति बरी होने के बाद एक दिन भी अतिरिक्त जेल में न रहे। वरना हर ऐसा मामला यही कहता रहेगा—
कानून ने बरी किया, लेकिन व्यवस्था ने अब भी कैद कर रखा है।

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