उत्तराखंड में टिकाऊ खेती की दिशा तय: एग्रोइकोलॉजी रोडमैप पर राज्य स्तरीय मंथन

देहरादून | 22 जनवरी। हिमालयी क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने, जैव विविधता के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप खेती को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हिमालयन एग्रोइकोलॉजी इनिशिएटिव (HAI) के तहत उत्तराखंड का राज्य स्तरीय द्वितीय हितधारक परामर्श गुरुवार को देहरादून के जीएमएस रोड स्थित होटल सैफ्रन लीफ में आयोजित किया गया।
इस परामर्श में उत्तराखंड के लिए प्रस्तावित एग्रोइकोलॉजी रोडमैप और उससे जुड़ी नीति सिफारिशों पर गहन चर्चा की गई। कार्यक्रम में सरकारी विभागों, शोध संस्थानों, किसान संगठनों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की व्यापक भागीदारी रही।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं उत्तराखंड किसान आयोग के उपाध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह ने कहा कि एग्रोइकोलॉजी को किसानों की आय बढ़ाने, खेती की लागत कम करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से सीधे जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “संरक्षण के साथ उपयोग” की नीति अपनाकर ही भूमि, जल और जैव विविधता को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष एस.पी. सुबुधि (IFS) ने कहा कि एग्रोइकोलॉजी रोडमैप में जैव विविधता संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों की भूमिका को स्पष्ट रूप से शामिल करना समय की आवश्यकता है।
तकनीकी सत्र में डॉ. जे.सी. राणा, इंडियन कंट्री रिप्रेजेंटेटिव, एलायंस ऑफ बायोडायवर्सिटी इंटरनेशनल–CIAT ने उत्तराखंड के लिए एग्रोइकोलॉजी रोडमैप और नीति सिफारिशों पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने कृषि जैव विविधता संरक्षण, पोषण-संवेदनशील खेती, जलवायु-लचीली कृषि प्रणालियों और एग्रोइकोलॉजी को नीति स्तर पर मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस सुझाव रखे। उन्होंने जोर दिया कि यह रोडमैप सरकार, शोध संस्थानों, किसान संगठनों और नागरिक समाज के साझा प्रयासों से ही प्रभावी रूप से लागू हो सकेगा।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. विनोद कुमार भट्ट (HIA कंसल्टेंट, उत्तराखंड) के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि हिमालयी राज्यों में पारंपरिक कृषि प्रणालियों, स्थानीय बीजों और जैव विविधता आधारित खेती का संरक्षण एग्रोइकोलॉजी की मूल भावना है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर सकता है।
प्रस्तुति के बाद आयोजित समूह चर्चा सत्र में प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए और रोडमैप को ज़मीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए। नीति निर्माण, संस्थागत समन्वय और किसानों की सक्रिय भागीदारी को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।
इस परामर्श में बीज बचाओ आंदोलन के विजय जड़धारी, अपर निदेशक पंकज नैथानी, सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. वी.पी. उनियाल, डॉ. देवाशीष (PSI), पूर्व निदेशक उद्यान डॉ. बी.एस. नेगी, एच.एन. सेमवाल (UCOST), प्रो. बी.पी. नौटियाल (भरसार विश्वविद्यालय), डॉ. वाई.पी. सिंह (ICFRE), डॉ. विनोद कोठारी (हिमुथान), सुश्री बिनिता शाह, डॉ. अरुण जुग्रान, डॉ. आर.के. सिंह, बलेंद्र जोशी (FID) सहित अनेक वैज्ञानिकों, नीति विशेषज्ञों और किसानों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के समापन सत्र में सुश्री सोनल डिसूजा, एसोसिएट मैनेजर (एशिया), एलायंस ऑफ बायोडायवर्सिटी इंटरनेशनल–CIAT ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस परामर्श से प्राप्त सुझाव उत्तराखंड में एग्रोइकोलॉजी आधारित नीतियों और कार्यक्रमों को मजबूत आधार प्रदान करेंगे।
