आपदा/दुर्घटनाब्लॉग

खूंखार वन्य जीवों से बचाव के लिए बनीं ‘अभय कवच’ बस्तियाँ

कतर्नियाघाट के मुहाने पर अब ‘अभय कवच’: उत्तर प्रदेश को मिला पहला प्रीडेटर-प्रूफ हाउस क्लस्टर

​बहराइच के कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य के करीब बसे गाँवों में अब रातें खौफ के साये में नहीं गुजरेंगी। वन्यजीव और मानव के बीच बढ़ते संघर्ष को विराम देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए उत्तर प्रदेश का पहला ‘प्रिडेटर-प्रूफ’ हाउस क्लस्टर लॉन्च किया गया है। यह अभिनव प्रयोग तराई के जंगलों में रहने वाले उन ग्रामीणों के लिए सुरक्षा की एक नई उम्मीद लेकर आया है, जो लंबे समय से बाघों और तेंदुओं की दहशत के बीच जीने को मजबूर थे। देहरादून से प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, निशंगड़ा रेंज के लोहरा गाँव को इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया है, जहाँ अब इंसानी बस्तियां एक अभेद्य घेरे में सुरक्षित होंगी।

दहशत के बीच सुरक्षा का आधुनिक घेरा

यह सुरक्षा प्रणाली केवल एक तार की बाड़ नहीं है, बल्कि तकनीक और सूझबूझ का एक मेल है। कतर्नियाघाट के घने जंगलों से सटे छह अतिसंवेदनशील घरों को एक समूह में जोड़कर उनके चारों ओर करीब 15 फीट ऊंची पीवीसी चेन मेश की दीवार खड़ी की गई है। इस बाड़ को बांस के मजबूत खंभों का सहारा दिया गया है, जो करीब 160 मीटर के दायरे में फैला हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य बाघ या तेंदुए जैसे शिकारी जानवरों को रिहायशी इलाकों में दाखिल होने से रोकना है, ताकि रात के अंधेरे में होने वाले जानलेवा हमलों पर अंकुश लगाया जा सके।

स्मार्ट तकनीक से सजे शिकारी-रोधी घर

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खूबी इसका स्मार्ट अलर्ट सिस्टम है। पूरे क्लस्टर को सौर ऊर्जा से संचालित मोशन-सेंसिंग लाइटों से लैस किया गया है। जैसे ही जंगल की ओर से कोई हिंसक जानवर बाड़ के करीब आता है, सेंसर उसकी गति को भांप लेते हैं और तेज रोशनी अपने आप जल उठती है। अचानक होने वाले इस प्रकाश से जानवर सकपका कर पीछे हट जाते हैं। इतना ही नहीं, सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए एक केंद्रीय हूटर प्रणाली भी लगाई गई है। क्लस्टर के हर घर के भीतर एक स्विच दिया गया है, जिसे किसी भी खतरे की आहट मिलते ही दबाया जा सकता है। एक बटन दबते ही पूरा गांव अलार्म की गूँज से सतर्क हो जाता है, जिससे जानवर और इंसान दोनों के बीच होने वाली सीधी भिड़ंत को टाला जा सकता है।

सहयोग और भविष्य की राह

वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और यूके के चेस्टर ज़ू के सहयोग से तैयार इस प्रोजेक्ट की कुल लागत लगभग डेढ़ लाख रुपये आई है। उत्तर प्रदेश वन विभाग और स्थानीय ग्राम पंचायत के साझा प्रयासों से तैयार यह ‘अभय कवच’ अब पूरे राज्य के लिए एक नजीर बन गया है। कतर्नियाघाट क्षेत्र में ऐसे करीब 500 क्लस्टर चिन्हित किए गए हैं जो सीधे तौर पर वन्यजीवों के खतरे की जद में हैं। लोहरा गाँव में मिली सफलता के बाद अब प्रशासन की योजना इस मॉडल को अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी विस्तार देने की है, ताकि जंगल और जीवन के बीच का संतुलन बना रहे और विकास के साथ सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।

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