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भारत का संक्रमण काल : स्वतंत्रता से गणतंत्र तक के 894 दिन

सी. राजगोपालाचारी, भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल (1948 में पदभार ग्रहण), जो संक्रमण काल में ब्रिटिश प्रभाव से पूर्ण मुक्ति की ओर महत्वपूर्ण कदम दर्शाते हैं।

 

This article of senior journalist and writer  Jay Singh Rwat analyzes the crucial 894-day transition of India from a British Dominion (1947) to a Sovereign Republic (1950). It explains that accepting Dominion Status was a strategic masterstroke by the Indian leadership to ensure a seamless transfer of power, avoid a legal vacuum, and maintain administrative stability during the turbulence of Partition and the integration of Princely States. The narrative details the shift from the Government of India Act 1935 to the adoption of India’s own Constitution. It culminates on January 26, 1950, marking the formal abolition of the Governor-General’s post and the swearing-in of Dr. Rajendra Prasad as the first President. This milestone finalized the transfer of ultimate sovereignty from the British Crown to the citizens of India, transforming a former colony into the world’s largest democracy through a planned “administrative bridge.”–ADMIN

–जयसिंह रावत

भारत के संवैधानिक सफर की पूर्णता 26 जनवरी 1950 की सुबह हुई, जब सदियों के संघर्ष के बाद देश ने अपनी नियति का पूर्ण स्वामित्व प्राप्त किया। उस दिन सुबह 10:18 बजे भारत को एक ‘संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य’ घोषित किया गया और इसके ठीक छह मिनट बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। यह केवल एक शपथ ग्रहण समारोह नहीं था, बल्कि डोमिनियन के दर्जे से पूरी तरह मुक्त होने की एक महान घोषणा थी। इसी के साथ ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत गवर्नर-जनरल का पद स्थायी रूप से समाप्त हो गया और ‘भारत सरकार अधिनियम 1935’ के स्थान पर भारत का अपना संविधान सर्वोच्च विधि बन गया। राष्ट्रपति द्वारा तिरंगा फहराने और 21 तोपों की सलामी के साथ ही भारत राष्ट्रमंडल का ऐसा पहला देश बना जिसने ब्रिटिश ताज के प्रति निष्ठा की औपचारिकता को त्यागते हुए भी अपनी सदस्यता बरकरार रखी। यह दिन भारतीय शासन व्यवस्था के उस परिवर्तन का साक्षी बना जहाँ सत्ता का स्रोत ‘क्राउन’ के बजाय ‘भारत की जनता’ में निहित हो गया।

15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को जब भारत का भाग्य विधाता जागा, तो वह तकनीकी रूप से एक पूर्ण संप्रभु गणराज्य नहीं बल्कि ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के भीतर एक ‘डोमिनियन’ यानी अधिराज्य था। इतिहास के पन्नों में 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 के बीच का यह कालखंड आधुनिक भारत की नींव रखने वाला सबसे जटिल ‘संक्रमण काल’ माना जाता है। इस दौरान भारत ने न केवल अपनी सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को तोड़ा, बल्कि एक बिखरे हुए भूगोल को एक सुदृढ़ राष्ट्र-राज्य के रूप में ढालने का अभूतपूर्व प्रयास भी किया।

डोमिनियन स्टेटस की रणनीतिक विवशता

अक्सर यह सवाल उठता है कि जिस कांग्रेस ने 1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प लिया था, उसने आजादी के समय ‘डोमिनियन स्टेटस’ को क्यों स्वीकार किया। वास्तव में, यह निर्णय किसी वैचारिक समझौते के बजाय एक उच्च स्तरीय प्रशासनिक और कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा था। उस समय भारत का अपना संविधान तैयार नहीं था और देश को चलाने के लिए एक कानूनी ढांचे की तत्काल आवश्यकता थी। ‘डोमिनियन’ के दर्जे ने भारत को यह सुविधा दी कि वह ‘भारत सरकार अधिनियम 1935’ के मौजूदा ढांचे के भीतर तब तक शासन कर सके जब तक नया संविधान लागू न हो जाए। इससे सत्ता के हस्तांतरण में कानूनी शून्यता की स्थिति पैदा नहीं हुई और अंग्रेजों को बिना किसी देरी के विदा करने का एक सुगम संवैधानिक मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके अतिरिक्त, यह दर्जा उन 562 रियासतों के लिए भी एक मनोवैज्ञानिक पुल की तरह था, जो एक क्रांतिकारी गणतंत्र के बजाय परिचित ब्रिटिश संवैधानिक ढांचे के माध्यम से भारत में शामिल होने में अधिक सहज महसूस कर रही थीं।

सत्ता का केंद्र और गवर्नर-जनरल की भूमिका

इस संक्रमण काल के दौरान शासन की बागडोर ‘अस्थायी संविधान’ के रूप में कार्य कर रहे 1935 के अधिनियम के हाथों में थी, लेकिन इसकी आत्मा पूरी तरह भारतीय हो चुकी थी। गवर्नर-जनरल का पद अब ब्रिटिश हुकूमत का प्रतीक नहीं, बल्कि एक संवैधानिक प्रमुख का पद था, जो भारतीय मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य था। लॉर्ड माउंटबेटन का प्रथम गवर्नर-जनरल के रूप में बने रहना नेहरू और पटेल की एक सोची-समझी कूटनीति थी ताकि रियासतों के एकीकरण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके। जून 1948 में जब सी. राजगोपालाचारी ने यह पद संभाला, तो वह भारत के शीर्ष पद पर आसीन होने वाले पहले भारतीय बने, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अपने शासन के लिए किसी विदेशी शक्ति का मोहताज नहीं है।

अराजकता के बीच प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण

शासन के लिए यह दौर अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। एक तरफ विभाजन की विभीषिका से उपजा शरणार्थी संकट था, तो दूसरी तरफ सांप्रदायिक दंगों को शांत कर कानून व्यवस्था बहाल करने की चुनौती। शासन ने इसी दौरान ‘राहत एवं पुनर्वास मंत्रालय’ जैसे नए विभागों का सृजन किया और उस नौकरशाही को लोकतांत्रिक सांचे में ढालने का काम किया जो अब तक केवल ब्रिटिश हितों की सेवा करती आई थी। इसी कालखंड में भारत ने अपनी पहली औद्योगिक नीति (1948) के माध्यम से ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का मार्ग चुना और पंचवर्षीय योजनाओं की भूमिका तैयार की। सैन्य मोर्चे पर भी कमान का भारतीयकरण तेजी से हुआ और 1947 के कश्मीर युद्ध ने नवजात राष्ट्र को अपनी रक्षा प्राथमिकताओं और सामरिक स्वायत्तता के प्रति सचेत कर दिया।

संविधान सभा की दोहरी जिम्मेदारी

इस पूरे दौर की सबसे विशिष्ट संस्था ‘संविधान सभा’ थी, जो एक साथ दो मोर्चों पर कार्य कर रही थी। एक ओर यह डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में भविष्य के भारत का विस्तृत खाका तैयार कर रही थी, तो दूसरी ओर यह देश की पहली अंतरिम संसद के रूप में कार्यपालिका पर नियंत्रण रख रही थी। संविधान के निर्माण की प्रक्रिया और शासन की दैनिक चुनौतियां साथ-साथ चलती रहीं। 26 नवंबर 1949 को जब संविधान को अंगीकृत किया गया, तो नागरिकता और निर्वाचन जैसे कुछ प्रावधान तुरंत लागू कर दिए गए, जो इस बात का प्रमाण था कि भारत का शासन व्यवस्था अब पूरी तरह से अपने स्वयं के द्वारा रचित विधि विधान की ओर बढ़ने को तैयार है।

अधिराज्य से संप्रभु गणतंत्र का उदय

26 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा राष्ट्रपति पद की शपथ लेते ही भारत ने डोमिनियन का दर्जा आधिकारिक रूप से त्याग दिया। यह यात्रा केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं थी, बल्कि एक औपनिवेशिक ढांचे से निकलकर एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और संप्रभु राष्ट्र की आत्मा को उसके संवैधानिक शरीर में स्थापित करने की प्रक्रिया थी। इस संक्रमण काल की सफलता हमारे तत्कालीन नेतृत्व की परिपक्वता को दर्शाती है, जिन्होंने ‘डोमिनियन’ के अस्थायी दर्जे को एक प्रशासनिक पुल की तरह इस्तेमाल कर भारत को एक अखंड और सशक्त गणराज्य के रूप में विश्व पटल पर स्थापित किया।

 

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