गण पर भारी पड़ता तंत्र…..

-अरुण श्रीवास्तव-
हर साल आज़ ही के दिन हमारे अपनों ने अपने लिए, अपनों के लिए एक संविधान बनाया था ताकि अपनों के लिए हासिल आज़ादी अपनों की हो पर यह कितनी अपनों के लिए रह गई है इसका आकलन करने के लिए आज़ से बेहतर शाय़द ही कोई दिन हो।
190 देशों की तरह हमारे पास भी एक संविधान है जो देश की आबादी की तरह ही सबसे बड़ा भी है। 190 देश के पास अपना संविधान है। इसे 25 भागों और 12 अनुसूचियों में विस्तारित किया गया है। हर पुस्तक की इसमें भी प्रस्तावना को स्थान दिया गया है पर संविधान मात्र एक पुस्तक नहीं जिसे किताबों में सीमित करने प्रस्तावना रहती है कि, “हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प करते हैं”। अफसोस की आज यह संकल्प बनकर रह गया है। देश की आजाद की लड़ाई में शामिल लोगों ने केंद्रीयकृत ढांचे के बजाय संघीय ढांचे के तहत देश को चलाने का निर्णय लिया था। इसीके तहत राज्यों को लगभग बराबरी के अधिकार दिए गए थे। विदेशी मामलो सैन्य शक्तियों आदि को छोड़कर लगभग सभी अधिकार केंद्र के सरकार के समान थे, पर धीरे-धीरे पूर्ववर्ती सरकारों ने राज्यों के अधिकार कुतरने शुरू कर दिए। राजनीतिक स्वार्थ के तहत केंद्र उन राज्यों के साथ अलग व्यवहार करता दीखता है जहां उसकी, उसके विचारधारा वाली सरकारें न हों। अब तो चुनावी रैलियों और सभाओं में केंद्रीय स्तर तक के मंत्री सत्ताधारी दल के पदाधिकारी आदि धड़ल्ले से कहने लगे हैं कि यदि आपके राज्य में भी “डबल इंजन” की सरकार होगी तो विकास कार्यों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी जो संविधान के तहत उपलब्ध कराये गये संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार है।
प्रहार तो केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही जनकल्याण योजनाओं का लाभ विपक्ष शासित सरकारों तक न पहुंचने देना भी है। जबकि गणतंत्र का वास्तविक अर्थ गण का तंत्र नहीं बल्कि गण की संप्रभुता है। जो केवल संख्या नहीं बल्कि सचेत नागरिक पैदा करना होना चाहिए पर आज़ जनता को सचेत नागरिक नहीं प्रजा बनाने में दिन रात एक करने में लगी हुई है।
केंद्र राज्य संबंधों में राज्यपाल की भूमिका को देखा जा सकता है। संवैधानिक व्यवस्था के तहत संसद कार्यपालिका के अधीन है व्यावहारिक में आज़ सब कुछ कार्यपालिका में समा गई है यहां तक कि संविधान की रक्षा करने वाली सुप्रीम कोर्ट भी। समय-समय पर राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठते रहे, चाहे केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा सहित अन्य विपक्षी दलों की। तमिलनाडु के राज्यपाल की भूमिका को लेकर है शक की सुई ठहर सी जाती है। कोलकाता के राज्यपाल रहे जगदीप धनखड़ और केरल के राज्यपाल रहे आरिफ मोहम्मद खान अपने कार्यकाल में लगातार विवादों के घेरे में रह चुके हैं। वैसे महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का दामन भी पाक साफ नहीं रहा। केरल के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों की भूमिका में “चोली दामन” के नाते को देखा जा सकता है। कारण लंबे समय से विपक्षी विचारधारा वामपंथी मोर्चे की सरकार रही है। समय-समय पर राज्यपालों पर विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्तियों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा हैं। विपक्षी दलों की सरकारें राज्यपाल को केंद्र का एजेंट यूं ही नहीं कहती रहीं। जनता द्वारा चुनी गई राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तावित विधेयकों को लटकाना लगभग सभी राज्यपाल के केंद्र के कृपा पात्र होने का आसान तरीका मानते रहे। ताजा उदाहरण तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि का है। इन तमिलनाडु सरकार का आरोप है कि उसके द्वारा पारित बिलों को सालों साल लटकाए रखते हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया, यही नहीं भारत के राष्ट्रपति की ओर टिप्पणी भी सार्वजनिक रूप से सामने आई और सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई लीपा पोती भी। पर सवाल अब भी कायम है कि, क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति जनता द्वारा चुनी गई सरकार द्वारा पारित विधेयकों को अनंत काल तक लटकाए रख सकते हैं क्या? इसी संदर्भ में नैनीताल हाईकोर्ट की एक टिप्पणी को भी देखा जा सकता है। अपनी टिप्पणी में तत्कालीन जज जोसेफ ने कहा कि राष्ट्रपति कोई भगवान नहीं होता गलती सबसे होती है। याद रहे संविधान में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। यानी राज्यपाल केंद्र सरकार के नहीं भारत के राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होते हैं। जिसकी नियुक्ति अनुच्छेद 153-162 के तहत राष्ट्रपति करते हैं। राज्यपाल का काम राष्ट्रपति के लिए होता है न कि केंद्र सरकार के। संविधान में ये कहीं नहीं लिखा कि राज्यपाल केंद्र सरकार का प्रतिनिधि है, पर व्यवहार में साफ़ दिखता है।
राज्यों में जनता दल द्वारा चुनी गई सरकारों को हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू करना अंतिम उपाय है, पर आजादी के बाद विभिन्न सरकारों ने संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग करते हुए 75 साल में 134 बार राष्ट्रपति शासन लगाया। सबसे अधिक 84 बार कांग्रेस की सरकार ने राष्ट्रपति तो 16 बार गैर कांग्रेसी गैर भाजपाई सरकार ने। अब ये अलग बात है कि इसमें भाजपा भी शामिल नहीं रही है। भाजपा शासित सरकार ने सात बार राष्ट्रपति शासन लगाया। ऐसा नहीं की दूसरी विचारधारा वाली सरकारों को हटाने में यह काफी उदार रही। आर्टिकल 356 का इस्तेमाल न कर करने के बजाय विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त के सहारे सरकारों को गिरती रही है। इसका बेहतर उदाहरण महाराष्ट्र में उद्धव सरकार को गिराकर एकनाथ शिंदे की सरकार बनवाना रहा है और बेहतर उदाहरण भी। मुस्लिम या पहली बार हुआ होगा कि रात के अंधेरे में सरकार गिरी और रात के अंधेरे में और सरकार बन भी गई।
लब्बोलुआब यह कि तंत्र को साधन होना चाहिए।
(लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं -एडमिन)
