*कर्तव्य पथ” या *कर्तव्य मार्ग* कुछ भी कह लें पर कर्तव्य के प्रति सत्य निष्ठा होनी चाहिए

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा –
राजधानी दिल्ली के *राजपथ* का नाम 2022 में *कर्तव्य पथ* कर दिया गया,सन 1947 से पहले इसको किंग्स वे कहते थे। यह राष्ट्रपति भवन से विजय चौक होकर इण्डिया गेट तक जाता है| इसके दोनों ओर घास के सुन्दर मैदान हैं और एक झील भी साथ- साथ चलती है, जो इसकी सुन्दरता बढ़ाते हैं।
इस पथ के नामकरण के पीछे मुख्य उद्देश्य तो यही रहा होगा कि इस पर रोज आवागमन करने वाले लोक सेवक *कर्तव्य निष्ट* होने चाहिए और यदि वे अपने कर्तव्यों का पालन ठीक से नहीं करेंगे तो लोग उनको *कर्तव्य नष्ट* या कर्तव्य भ्रष्ट भी कह सकते हैं।
वैसे इस संदर्भ में भर्तृहरि के नीति शतक की यह टिप्पणी काबिले-तारीफ है जिसमें वह कहते हैं कि “सेवा धर्म: परमगहनो योगिनामप्यगम्य:।।” यही बात फिर तुलसीदास जी ने भी दोहराई कि “सब तें सेवक धरमु कठोरा॥-” इसलिए सेवक इस टिप्पणी का प्रयोग अपनी सफाई में भी पेश करदें तो क्या आश्चर्य है, यदि उनसे कभी कोई गलती हो जाय, खैर यह तो यूं ही मजाक की बात ठहरी, लोक सेवक कृपया अन्यथा न लें।
इस प्रसंग में मुझे अपने स्कूल के दिनों में ऐसेम्बली प्रेयर में गवाई जाती यह प्रार्थना याद आ रही है, जो मोटे अर्थों में कर्तव्य की सही परिभाषा हो सकती है। इस गीत के रचनाकार के बारे कोई पुख्ता प्रामाणिक स्रोत उपलब्ध नहीं है परन्तु बहुमत के अनुसार इसके रचनाकार का नाम मुरारीलाल शर्मा *बालबन्धु* बताया जाता है। उसकी कुछ पंक्तियां देखने योग्य है –
“वह शक्ति हमें दो दयानिधे,
कर्तव्य मार्ग पर डट जावें।
पर सेवा पर उपकार में हम,
जग जीवन सफल बना जावें। …
छल दम्भ द्वेष पाखण्ड झूठ-
अन्याय से निशि दिन दूर रहें।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना,
सुचि प्रेम सुधारस बरसावें।
निज आन मान मर्यादा का,
प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे… “
