क्या रुक-रुक कर उपवास उम्मीदों पर खरा उतरता है ?
रुक-रुक कर उपवास को वजन घटाने, लंबी उम्र और यहाँ तक कि कैंसर के कम जोखिम से जोड़ा गया है — कम से कम चूहों पर किए गए प्रयोगों में। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके वही फायदे इंसानों में भी देखने को मिलते हैं?
2013 में एक ब्रिटिश पत्रकार और एक डॉक्टर ने एक अपेक्षाकृत अनजान आहार पद्धति को दुनिया के सामने पेश किया। यह विचार बेहद सरल था: सप्ताह के दो दिन लगभग कुछ भी न खाएँ — यानी 600 कैलोरी से भी कम — और बाकी दिनों में सामान्य भोजन करें।
डॉ. माइकल मॉस्ले और मिमी स्पेंसर ने दावा किया कि यह तरीका, जिसे “द फास्ट डाइट” कहा गया, शरीर की चर्बी घटाने, टाइप-2 मधुमेह को नियंत्रित करने और उम्र से जुड़ी बीमारियों को टालने में मदद कर सकता है। शुरुआती अध्ययनों में चूहों पर इसके चौंकाने वाले लाभ दिखाई दिए, जिससे वैज्ञानिकों को उम्मीद जगी कि यह तरीका इंसानों के लिए भी फायदेमंद होगा।
यह रुक-रुक कर उपवास का पहला लोकप्रिय रूप नहीं था, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत चर्चित हो गया। आज इसके कई रूप मौजूद हैं, जैसे 16:8 डाइट और 5:2 डाइट। किताबें, मोबाइल ऐप, फिटनेस उपकरण और सप्लीमेंट तक इस पद्धति को बढ़ावा दे रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार, 2024 में लगभग 13 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने रुक-रुक कर उपवास को आज़माया।
रुक-रुक कर उपवास का मूल सिद्धांत यह है कि खाने और न खाने के समय को अलग-अलग किया जाए। 16:8 डाइट में व्यक्ति दिन के 16 घंटे उपवास करता है और केवल 8 घंटे भोजन करता है। इसके समर्थकों का कहना है कि यह पारंपरिक डाइट की तुलना में आसान है और इससे वजन तेजी से घटता है।
लेकिन हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों का नजरिया बदला है। जैसे-जैसे नए और बड़े अध्ययन सामने आए हैं, वैसे-वैसे रुक-रुक कर उपवास के दावों और वैज्ञानिक प्रमाणों के बीच अंतर स्पष्ट होता गया है।
शिकागो स्थित इलिनॉय विश्वविद्यालय की पोषण विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस्टा वराडी के अनुसार, “इसे जरूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।”
रुक–रुक कर उपवास की शुरुआत कहाँ से हुई?
इस सदी की शुरुआत से ही यह देखा गया कि जब जानवरों को थोड़े समय के लिए बहुत कम भोजन दिया जाता है, तो उनके स्वास्थ्य में असाधारण सुधार होता है। अगर चूहों को दिन में केवल चार या छह घंटे भोजन करने दिया जाए, तो वे लंबा जीवन जीते हैं और उन्हें मधुमेह, कैंसर या डिमेंशिया जैसी बीमारियाँ कम होती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना था कि उपवास के दौरान शरीर की शर्करा का स्तर गिरता है, जिससे कोशिकाएँ ऊर्जा के लिए वसा का उपयोग करने लगती हैं। इस दौरान कोशिकाएँ स्वयं की मरम्मत करती हैं और बेकार हिस्सों को नष्ट करती हैं। इस प्रक्रिया को ऑटोफैगी कहा जाता है।
हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि चूहों और इंसानों का मेटाबॉलिज़्म बहुत अलग होता है। इसलिए जो परिणाम जानवरों में दिखते हैं, वे इंसानों में उसी तरह लागू हों, यह ज़रूरी नहीं है।
क्या रुक–रुक कर उपवास से वजन घटता है?
सबसे बड़ा दावा यही किया जाता है कि रुक-रुक कर उपवास वजन घटाने का बेहतर तरीका है। जानवरों पर किए गए शुरुआती प्रयोगों में यह सच भी लगा, लेकिन इंसानों पर किए गए बड़े और विश्वसनीय अध्ययनों में यह बात साफ़ नहीं हो पाई।
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के प्रोफेसर जेम्स बेट्स के अनुसार, इंसानों में रुक-रुक कर उपवास से होने वाला वजन घटाव सामान्य कैलोरी-नियंत्रित डाइट से अधिक नहीं होता।
कुछ अध्ययनों में हल्का अतिरिक्त लाभ दिखा है, लेकिन वे अध्ययन छोटे और कम गुणवत्ता वाले थे। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश डाइट की तरह इससे भी औसतन 5 प्रतिशत से ज़्यादा वजन घटाना मुश्किल होता है।
इसके अलावा, यह दावा भी पूरी तरह सही नहीं पाया गया कि रुक-रुक कर उपवास को लंबे समय तक अपनाना आसान होता है। कई लोग कुछ समय बाद इससे भी ऊब जाते हैं।
मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
रुक-रुक कर उपवास से इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार, फैटी लिवर में कमी और कुछ मामलों में मधुमेह की दवाओं की आवश्यकता कम होने की बात सामने आई है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये फायदे किसी भी ऐसी डाइट से मिल सकते हैं जिससे वजन घटता है।
कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया कि उपवास के कुछ रूपों में मांसपेशियों का नुकसान ज़्यादा होता है, जिससे शरीर का मेटाबॉलिज़्म कमजोर हो सकता है।
मानसिक लाभ और एकाग्रता
कुछ लोग मानते हैं कि रुक-रुक कर उपवास से ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। हालाँकि, वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि छोटे और सामान्य उपवास तरीकों का दिमागी कार्यक्षमता पर कोई खास असर नहीं पड़ता। बहुत लंबे और कठोर उपवास में ही कुछ सीमित मानसिक लाभ देखे गए हैं, जो आम लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं हैं।
कैंसर और अन्य दावे
कैंसर के मामले में कुछ शुरुआती शोध यह संकेत देते हैं कि रुक-रुक कर उपवास से इलाज के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं, जिससे मरीज उपचार को बेहतर तरीके से जारी रख पाते हैं। हालाँकि, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि यह कैंसर को रोकता या ठीक करता है।
लंबी उम्र, बेहतर हृदय स्वास्थ्य और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से सुरक्षा जैसे दावों पर भी अभी ठोस प्रमाण नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे शोध की गुणवत्ता बेहतर होती जा रही है, वैसे-वैसे रुक-रुक कर उपवास के चमत्कारी लाभ कम दिखाई दे रहे हैं।
कोई जादुई उपाय नहीं
रुक-रुक कर उपवास कोई जादुई उपाय नहीं है। यह कुछ लोगों के लिए वजन नियंत्रित करने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन इसके फायदे सीमित हैं और सभी के लिए उपयुक्त नहीं हैं। किसी भी प्रकार का उपवास शुरू करने से पहले व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति, जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह को ध्यान में रखना चाहिए। ( With courtesy from the New York Times -Admin)
