हिमालय की बर्फ के नीचे छुपा भयंकर खतरा
The Himalayas, India’s northern sentinel, cradle climate, water, biodiversity, and livelihoods for millions, yet they unleash deadly avalanches each winter, striking Jammu-Kashmir, Himachal, Uttarakhand, Sikkim, and Arunachal with ruthless force. Recent tragedies—like the 2025 Chamoli disaster burying BRO workers, 2022 Auli military camp burial, and 2023 Gulmarg fatalities—highlight escalating risks amid climate chaos: erratic snowfall, temperature spikes, winds, and unstable slopes fueling cataclysmic slides.

–जयसिंह रावत–
हिमालय केवल भारत की उत्तरी सीमा नहीं है, बल्कि यह देश की जलवायु, जल संसाधन, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की जीवन-व्यवस्था का आधार है। लेकिन यही हिमालय हर वर्ष सर्दियों के मौसम में एक ऐसे प्राकृतिक खतरे का सामना करता है, जो अचानक आता है और भारी तबाही छोड़ जाता है—हिमस्खलन। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे उच्च हिमालयी राज्यों में हिमस्खलन एक नियमित प्राकृतिक घटना है, जो मानव जीवन, सैन्य ठिकानों, सड़क नेटवर्क और संपत्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाती रही है।
पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी राज्यों में हिमस्खलन की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। जनवरी 2025 में उत्तराखंड के चमोली जनपद के माना पास क्षेत्र में हुए हिमस्खलन में सीमा सड़क संगठन (BRO) के कई मजदूर दब गए थे, जिनमें से कुछ की जान नहीं बचाई जा सकी। इससे पहले 2022 में उत्तराखंड के औली के निकट सेना के प्रशिक्षण शिविर पर हिमस्खलन गिरने से जवानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। फरवरी 2023 में जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग और द्रास सेक्टर में हुए हिमस्खलन में कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी प्रभावित हुए। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि बदलते मौसम और अनियंत्रित गतिविधियों के कारण हिमस्खलन का खतरा गंभीर होता जा रहा है।
बदलते जलवायु परिदृश्य में हिमस्खलन की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने की आशंका को देखते हुए अब इसे केवल “प्राकृतिक आपदा” मानकर छोड़ देने के बजाय वैज्ञानिक पूर्वानुमान, तकनीकी निगरानी और त्वरित चेतावनी की रणनीति अपनाई जा रही है। उद्देश्य स्पष्ट है—हिमस्खलन को रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय रहते चेतावनी देकर जान-माल की क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है।
हिमस्खलन मूल रूप से पर्वतीय ढलानों पर जमी बर्फ की अस्थिरता का परिणाम होता है। अत्यधिक हिमपात, तापमान में अचानक वृद्धि, तेज हवाएं, ढलान की बनावट और बर्फ की परतों के भीतर का घर्षण—ये सभी कारक मिलकर हिमस्खलन को जन्म देते हैं। हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण असामान्य हिमपात और तापमान के उतार-चढ़ाव ने इस खतरे को और जटिल बना दिया है।
भारत में हिमस्खलन पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली की रीढ़ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) है। डीआरडीओ के अंतर्गत कार्यरत रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (डीजीआरई), चंडीगढ़ को हिमस्खलन पूर्वानुमान और शमन प्रौद्योगिकी का नोडल संस्थान बनाया गया है। डीजीआरई भारतीय सेना के लिए दैनिक परिचालन हिमस्खलन पूर्वानुमान जारी करता है, क्योंकि देश की सीमाओं पर तैनात सैनिकों के लिए यह खतरा सीधे जीवन से जुड़ा है। इसके साथ ही यह संस्था उत्तर-पश्चिम हिमालयी बर्फीले क्षेत्रों में नागरिक आबादी के लिए भी नियमित चेतावनियां जारी करती है।
डीजीआरई की कार्यप्रणाली अत्यंत वैज्ञानिक और बहुस्तरीय है। इसमें हवाई और जमीनी टोही सर्वेक्षण, बर्फ की परतों की संरचना का अध्ययन, ढलानों की स्थिरता का विश्लेषण और मौसम संबंधी आंकड़ों का समन्वय शामिल है। हिमस्खलन की सटीक भविष्यवाणी के लिए सबसे जरूरी तत्व है—लगातार और विश्वसनीय डेटा। इसी उद्देश्य से हिमालयी क्षेत्रों में मौसम निगरानी का एक विस्तृत नेटवर्क खड़ा किया गया है।
डीजीआरई द्वारा स्थापित 72 हिम मौसम विज्ञान वेधशालाएं बर्फीले क्षेत्रों में लगातार निगरानी कर रही हैं। इसके अतिरिक्त दर्जनों स्वचालित मौसम स्टेशन हर घंटे तापमान, हिमपात, हवा की गति और अन्य जरूरी पैरामीटर दर्ज कर रहे हैं। इन वेधशालाओं से हर तीन घंटे में और स्वचालित स्टेशनों से हर घंटे प्राप्त होने वाला डेटा सीधे डीजीआरई तक पहुंचता है। इसी आधार पर विशेषज्ञों के विश्लेषण से कम से कम 24 घंटे पहले हिमस्खलन पूर्वानुमान तैयार किया जाता है।
हालांकि मौसम विभाग के पूर्वानुमान कई बार हस्य6 के विषय बनते रहे है, फिर भी वैज्ञानिक तरक्की के चलते अब भारतीय मौसम विभाग भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। इसके छह-छह घंटे में जारी किए जाने वाले मौसम अपडेट हिमालयी क्षेत्रों में स्थितिजन्य जागरूकता बढ़ाते हैं। इसके अलावा डॉपलर रडार की मदद से वर्षा और हिमपात के पैटर्न पर नजर रखी जा रही है, जिससे अचानक बदलते मौसम की जानकारी समय रहते मिल सके।
बीते कुछ वर्षों में हिमस्खलन पूर्वानुमान में तकनीक का इस्तेमाल अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। यह बात दीगर है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में फिर भी हादसे होते रहते है। डीजीआरई ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग आधारित मॉडल विकसित किए हैं, जो वर्षों के ऐतिहासिक आंकड़ों, मौजूदा मौसम और बर्फ की स्थिति को जोड़कर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करते हैं। बहु-स्तरीय सिमुलेशन और तीन-आयामी स्नोपैक मॉडलिंग के जरिए यह समझने की कोशिश की जा रही है कि बर्फ की कौन-सी परत कब और कैसे अस्थिर हो सकती है।
हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए डीजीआरई ने एक व्यापक हिमस्खलन आशंका मानचित्र भी विकसित किया है, जिसमें पूरे हिमालय क्षेत्र के संवेदनशील इलाकों को चिह्नित किया गया है। यह मानचित्र भारतीय सेना के लिए बर्फीले इलाकों में सुरक्षित आवाजाही का एक अहम उपकरण बन चुका है। इसके साथ ही जहां आवश्यकता होती है, वहां हिमस्खलन को नियंत्रित करने वाली इंजीनियरिंग संरचनाएं और कम भार की सुरक्षा दीवारें भी बनाई जा रही हैं।
तकनीकी प्रगति का सबसे बड़ा उदाहरण उत्तरी सिक्किम में स्थापित किया गया हिमस्खलन निगरानी रडार है। यह देश का पहला ऐसा रडार है, जो हिमस्खलन शुरू होने के मात्र तीन सेकंड के भीतर उसकी पहचान कर सकता है। इतनी तेज चेतावनी प्रणाली आपात स्थितियों में जीवन रक्षक साबित हो सकती है।
इसके साथ ही उपग्रह आधारित इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार तकनीक का इस्तेमाल कर पृथ्वी की सतह में होने वाले सूक्ष्म विरूपण को मापा जा रहा है। इससे न केवल हिमस्खलन, बल्कि भूस्खलन की चेतावनी भी पहले से अधिक सटीक बन रही है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र भी डीजीआरई को उच्च रिजॉल्यूशन मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है। शीतकाल के दौरान हिमपात और कुल अवक्षेपण से जुड़े मॉडल हिमस्खलन पूर्वानुमान को और अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।
हिमस्खलन प्रबंधन केवल पूर्वानुमान तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने वर्ष 2009 में भूस्खलन और हिमस्खलन प्रबंधन पर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनमें तैयारी, शमन और प्रारंभिक चेतावनी को केंद्र में रखा गया है। इसी क्रम में देशभर में कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल आधारित एकीकृत अलर्ट सिस्टम स्थापित किया गया है, जिसके जरिए एसएमएस, सेल ब्रॉडकास्ट, सायरन, इंटरनेट और उपग्रह संचार के माध्यम से आपदा चेतावनियां आम लोगों तक पहुंचाई जाती हैं।
आपदा के बाद राहत और बचाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हिमस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में अब ड्रोन आधारित तकनीकों से बर्फ में दबे लोगों की पहचान की जा रही है। हेलीकॉप्टरों की त्वरित तैनाती और राज्य व जिला स्तर पर चौबीसों घंटे सक्रिय नियंत्रण कक्ष बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बना रहे हैं।
कुल मिलाकर, हिमस्खलन एक ऐसी प्राकृतिक चुनौती है जिसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन विज्ञान, तकनीक और प्रशासनिक तैयारी के समन्वय से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हिमालय की सुरक्षा दरअसल वहां रहने वाले और काम करने वाले लोगों के जीवन की सुरक्षा है। बर्फ के नीचे छुपे खतरे को अनदेखा नहीं किया जा रहा, बल्कि उसे समझकर, आंककर और समय रहते चेतावनी देकर उससे निपटने की गंभीर कोशिश की जा सकती है। जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए सतर्कता और पूर्व तैयारी अत्यंत आवश्यक है। बर्फबारी वाले क्षेत्रों में मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए। सेना, बीआरओ और स्थानीय प्रशासन को जोखिम वाले इलाकों में आवाजाही सीमित करनी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य वैज्ञानिक सलाह के अनुसार हों और ढलानों पर अनियंत्रित खुदाई से बचा जाए। स्थानीय लोगों, पर्यटकों और मजदूरों को हिमस्खलन के संकेतों और बचाव तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। आधुनिक उपकरणों, अलर्ट सिस्टम और रेस्क्यू टीमों की समय पर तैनाती ही भविष्य में ऐसे हादसों से जान बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है।
(लेखक इस न्यूज़ पोर्टल के संपादक मंडल के मानद सदस्य हैं । तथ्य और विचार उनके निजी हैं -एडमिन)
